शाम की हल्की सुनहरी रोशनी उस छोटी-सी बस्ती की गलियों में बिखरी हुई थी, जहाँ हर घर अपनी अलग कहानी कहता था—संघर्ष, उम्मीद और अधूरे सपनों की।
उसी बस्ती के एक कोने में था काव्या का घर…
अठारह साल की मृगा ,एक साधारण-सी लड़की, लेकिन हालात ने उसे वक्त से पहले ही समझदार बना दिया था। वह अपने घर की सबसे बड़ी बेटी थी, उसके पिता बाबूलाल अब इस दुनिया में नहीं थे—लंबी बीमारी ने उन्हें छीन लिया था। पीछे रह गई थीं उसकी माँ सरोज और दो छोटी बहनें
पायल (कक्षा 8) – समझदार और शांत स्वभाव की
चंचल (कक्षा 6) – थोड़ी शरारती लेकिन दिल की साफ और हँसमुख
उनका शहर के बस्ती की गलियों में एक
छोटा-सा दो कमरों का घर… जो सपनों का घर है , अब जिम्मेदारियों का घर बन चुका था।
सरोज कई सालों से एक बड़े घर में काम करती थी—वही उनके परिवार की एकमात्र आय का साधन था। लेकिन अब उनकी तबीयत बिगड़ने लगी थी।
मृगा… आज तू चली जा मेरे जगह…” सरोज ने थकी हुई आवाज़ में कहा।
मृगा तुरंत बोल पड़ी-“माँ… मुझे अच्छा नहीं लगता किसी के घर काम करना…
उसकी आँखों में आत्मसम्मान साफ झलक रही थी।
सरोज ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा
“बेटी… कभी-कभी हालात के आगे झुकना पड़ता है… तेरी बहनों के लिए…और घर खर्च के लिए , किसी के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है मेहनत कर पेट पालना ही समझदारी है!!
मृगा चुप हो गई… और आखिरकार उसने हामी भर दी ,वो इस साल फाइनल की पढ़ाई कर चुकी थी आगे पढ़ने के लिए पैसे जरूरी थी उसके और बहनों के लिए..
अगली सुबह…
साधारण-सा सलवार सूट पहने, बिना किसी सजावट के भी अपनी सादगी में खूबसूरत लगती मृगा उस बड़े बंगले के सामने खड़ी थी छोटे से बैग में अपने जरूरी कपड़ों को लिए!!
यह बंगला था मिसेज नंदिनी कपूर का,
नंदिनी कपूर सिर्फ एक अमीर घर की मालकिन ही नहीं थीं, बल्कि एक सफल बिजनेस वुमन भी थीं, उनका अपना बड़ा ब्यूटी प्रोडक्ट्स का बिजनेस था—“NK Glow Cosmetics”, जो शहर में तेजी से नाम कमा रहा था, वह घर और बिजनेस—दोनों को बहुत अच्छे से संभालती थीं। अक्सर फोन कॉल्स, मीटिंग्स और नए प्रोडक्ट्स की चर्चा में व्यस्त रहती थीं।
उनके पति राजीव कपूर एक शांत स्वभाव के व्यक्ति थे, जो बिजनेस को दोनों संभालते थे।
उनके दो बच्चे थे -इशिका कपूर (बड़ी बेटी) – जिम्मेदार, समझदार, और अपने माता-पिता के बिजनेस में हाथ बँटाती उसकी सगाई हो चुकी थी कुनाल मल्होत्रा से, जो खुद भी एक स्टाइलिश और मॉडर्न लड़का था ।
रिहान कपूर (छोटा बेटा) – बिल्कुल बचपन से बिगड़ैल स्वभाव का, उसे इसलिए दूर पढ़ाई के लिए भेज दिया गया था फिर भी नहीं सुधरा ,हाल ही में विदेश से पढ़ाई पूरी करके लौटा था , हैंडसम, स्मार्ट होने के कारण उसे लड़कियां भी भाव देती थी ,रिहान दोस्तों के साथ पार्टी, घूमना-फिरना… वही उसकी जिंदगी थी, घर वाले उसे रोकने में असमर्थ थे।
गेट खुला… और मृगा अंदर गई।
नंदिनी कपूर ने उसे ऊपर से नीचे तक देखी -“तुम सरोज की बेटी मृगा हो ?”
“जी…”
“तुम्हारी माँ की तबीयत ठीक नहीं होती तब तक तुम काम को संभालोगी,
काम ठीक से कर लेती हो?”
“जी…”
“ठीक है, फिर आज से तुम काम में लग जाओ ,मुझे काम में कोई लापरवाही नहीं चाहिए… और हाँ, कभी-कभी ही छुट्टी मिलेगी घर जाने की समझी?” जाओ अंदर ,मीना हेड कुक है उसके साथ तुम अस्सिटेंट रहोगी , घर के साफ सफाई के लिए बीजू और मालती है (बीजू और मालती पति-पत्नी है)
“जी मैडम…”
मृगा ने चुपचाप काम शुरू कर दिया।
बंगले की चमक-दमक, बड़े-बड़े कमरे, और हर चीज़ की भव्यता उसे एक पल के लिए अजीब लगी… लेकिन उसने जल्दी ही खुद को संभाल लिया।
वो सुबह से शाम तक मेहनत करती , खासकर नंदिनी और इशिका के कमरे में जो ज़रूरत होती वो दे आती…
उसकी सादगी ही उसकी पहचान थी ,ना ज्यादा सजना, ना दिखावा… फिर भी उसकी खूबसूरती किसी से छुपी नहीं थी।
एक सप्ताह बीत गए…
नंदिनी कपूर अब उससे खुश रहने लगी थीं।
“मृगा, तुम काम बहुत अच्छे से करती हो… भरोसा किया जा सकता है तुम पर,” उन्होंने एक दिन कहा।
मृगा ने बस हल्की-सी मुस्कान दी,
लेकिन इस घर में एक नजर ऐसी भी थी… जो अब धीरे-धीरे उस पर टिकने लगी थी।
रिहान कपूर…
पहले तो उसने मृगा को बस एक काम करने वाली लड़की की तरह देखा फिर देखते देखते उसकी सुंदर कद काठी पर वो फिसलने लगा एक दिन शाम को, जब मृगा काम कर रही थी, रिहान उसके सामने आकर खड़ा हो गया..
“तुम नई हो ना?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा,
मृगा थोड़ा चौंकी—“जी…”
“नाम?”
“मृ…मृगा”
“हूँ… सिंपल… लेकिन अच्छा है,” उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
मृगा ने नजरें झुका लीं और जल्दी से वहाँ से निकल गई , क्योंकि उसके मुंह से अल्कोहल की बदबू आ रही थी और आंखें ललचाई हुई थी ,उस रात मृगा को अजीब-सी बेचैनी हुई…
वो समझ नहीं पा रही थी कि ये नई दुनिया… उसके लिए क्या लेकर आई है।
एक तरफ उसकी मजबूरी थी…
और दूसरी तरफ… एक अनजाना एहसास, जहाँ किस्मत, इज़्ज़त और दिल—तीनों का इम्तिहान होने वाला था।
सुबह की हल्की धूप पूरे बंगले में फैल चुकी थी…
हर चीज़ अपनी जगह पर सजी हुई थी—जैसे यहाँ सब कुछ बिल्कुल परफेक्ट हो।
लेकिन हर चमक के पीछे सच्चाई भी होती है… और हर मुस्कान के पीछे इरादे।
मृगा किचन में काम कर रही थी , नाश्ता की तैयारी में जुटी थी , मीना थोड़ी लेट आती थी पर मृगा को तैयारी करने जल्दी आने का आदेश था ...उसके हाथ तो काम में लगे थे ,वो कल रात की घटना उसके मन से निकल गयी थी,
तभी पीछे से एक हल्की-सी आवाज़ आई—
“इतनी सुबह से काम… तुम थकती नहीं हो क्या?”
मृगा ने बिना पलटे ही पहचान लिया—रिहान कपूर।
उसने खुद को संभालते हुए जवाब दिया—
“काम करने के लिए सुबह शाम नहीं होता।
रिहान मुस्कुराया… और किचन काउंटर पर टिक गया ,आज वो बिल्कुल नॉर्मल था—साफ-सुथरे कपड़े, चेहरे पर हल्की मुस्कान… जैसे कल रात कुछ हुआ ही ना हो, लेकिन उसके अंदर… कुछ और ही चल रहा था।
“तुम यहाँ कब से काम कर रही हो?” उसने casually पूछा।
“एक सप्ताह हो गई है…” मृगा ने छोटा-सा जवाब दिया , उसकी तरफ देखकर
नजरें झुका लीं—
"तुम बहुत खूबसूरत हो मृगा बिल्कुल वन की मृगा की तरह जो निश्छल रहती है , और उस मृगा और तुममें एक कॉमन है जैसे वो शेर से डरती है वैसे ही तुम भी डरती हो ... लेकिन मैं शेर नहीं हुं एक इंसान हुं तुम्हारी तरह ..
रिहान सिर्फ बात करने के लिए वहाँ नहीं खड़ा था,उसके इरादे साफ नहीं थे,
वो जानबूझकर मृगा के करीब आना चाहता था… उससे दोस्ती करना चाहता था… लेकिन उस दोस्ती के पीछे उसकी सोच उतनी साफ नहीं थी , उसने उसे कुछ दिनों से मृगा को सिर से पांव तक देख रहा था वो मृगा को पाने की चाहत रखने लगा ,मृगा
की सादगी, उसकी मासूमियत—ये सब रिहान के लिए एक नया “चैलेंज” बन चुका था।
“दोस्ती करोगी?” अचानक रिहान ने पूछा।
मृगा चौंक गई..उसने हैरानी से उसकी तरफ देखी - “क्या…?”
रिहान हल्का-सा हँसा—
“डरो मत… बस दोस्ती… मैं इतना भी बुरा नहीं हूँ।”
मृगा के दिल में फिर वही डर उठ गया,
उसने साफ शब्दों में कहा—“मुझे काम से मतलब है… दोस्ती से नहीं।
उसकी आवाज़ धीमी थी… लेकिन ठहराव था उसमें।
रिहान कुछ पल के लिए चुप हो गया…
फिर उसके चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आई -जैसे उसे चुनौती मिल गई हो,
“ठीक है… अभी नहीं… लेकिन एक दिन तुम खुद दोस्ती करोगी,” उसने धीरे से कहा।
मृगा ने कोई जवाब नहीं दिया,
वो बस अपने काम में लग गई।
लेकिन रिहान का ध्यान पूरी तरह उस पर टिक चुका था।
किचन के बाहर सैंडिल की आवाज आई तो रिहान फ्रिजर से पानी के बोतल निकल कर लें जाने लगा ताकि किसी को शक ना हो
रिहान अपने कमरे में बैठा था,
उसके हाथ में फोन था, लेकिन ध्यान कहीं और ,उसने खिड़की से बाहर देखा… जहाँ लॉन में मृगा काम कर रही थी,
उसकी आँखों में अब सिर्फ जिज्ञासा नहीं थी…इरादा था ..“देखते हैं… कब तक दूर भागती हो…” उसने हल्की मुस्कान के साथ खुद से कहा।
डिनर का समय था और रात नौ बजे थे जब
नंदिनी कपूर अपने पति राजीव कपूर और इशिका के साथ डायनिंग टेबल पर बैठे इशिका की शादी की बात कर रही थी ...
नंदिनी कपूर बोली ," कुनाल के पैरेंट्स ने शादी की डेट फिक्स कर दिया है पंद्रह दिन का टाइम दिया है शादी की तैयारी करने वैसे कुनाल के पैरेंट्स शादी के लिए होटल बुक कर देंगे बाकी हमें करना है...
राजीव कपूर ने कहा," ठीक है ,इशिका और तुम शॉपिंग पर ध्यान देना कुछ दिन के लिए रिहान को ऑफिस भेज देना वैसे भी सारा दिन तो दोस्तों के बीच रहता है!!
इशिका बीच में बोली," राइट डैड , रिहान अब बच्चा नहीं है छब्बीस साल का हो चुका है उसे इस उम्र में बिजनेस में आ जाना चाहिए !!
जारी है.....