वह पुराना बंगला
मल्हार एक फ्रीलांस फोटोग्राफर था, जिसे पुरानी इमारतों और सन्नाटों को कैमरे में कैद करने का जुनून था। इसी जुनून के चलते वह हिमाचल के एक दूरदराज गाँव 'अंधेरी घाटी' पहुँचा। वहां एक पुरानी हवेली थी जिसके बारे में मशहूर था कि वह "सायों का बसेरा" है।
गाँव वालों ने उसे चेतावनी दी थी:
"बेटा, सूरज ढलने के बाद उस हवेली की दीवारों पर अपनी परछाईं मत देखना। वहां परछाइयाँ शरीर से अलग होकर चलने लगती हैं।"
मल्हार इन बातों को अंधविश्वास मानता था। उसने हवेली के भारी लकड़ी के दरवाजे को धक्का दिया। चरमराती हुई आवाज के साथ दरवाजा खुला और अंदर से सड़ी हुई लकड़ियों और धूल की गंध आई।
अजीब शुरुआत
मल्हार ने अपना कैमरा निकाला और फोटो लेना शुरू किया। तभी उसे महसूस हुआ कि हॉल के कोने में कोई खड़ा है। उसने टॉर्च जलाई, लेकिन वहां कोई नहीं था। उसने एक फोटो खींची। जब उसने कैमरे की स्क्रीन पर फोटो देखी, तो उसके पसीने छूट गए।
फोटो में मल्हार की अपनी परछाईं फर्श पर नहीं थी, बल्कि दीवार पर एक काली आकृति के रूप में खड़ी थी, और उस आकृति के हाथ में एक खंजर था।
रहस्य गहराता है
मल्हार ने पीछे मुड़कर देखा, दीवार खाली थी। लेकिन जैसे ही उसने फिर से कैमरे की ओर देखा, उसे लगा कि कमरे का तापमान अचानक गिर गया है। उसे अपने कान के पास किसी के सांस लेने की आवाज सुनाई दी—"तुम यहाँ क्यों आए?"
वह आवाज किसी इंसान की नहीं, बल्कि एक भारी गूँज जैसी थी। मल्हार भागकर बाहर निकलना चाहता था, लेकिन उसने देखा कि मुख्य दरवाजा अब वहां था ही नहीं, सिर्फ एक सपाट दीवार थी।
मल्हार का दिल सीने को चीरकर बाहर आने को बेताब था। जहाँ कुछ मिनट पहले दरवाज़ा था, वहां अब सिर्फ पत्थर की ठंडी और खुरदरी दीवार थी। उसने पागलों की तरह दीवार को टटोला, अपने नाखूनों से उसे खुरचने की कोशिश की, लेकिन वहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था।
हवेली की चुप्पी अब उसे चुभने लगी थी। अचानक, उसे ऊपर की मंजिल से किसी के चलने की आहट सुनाई दी। ठप... ठप... ठप...
परछाईं का खेल
मल्हार ने हिम्मत जुटाई और अपनी टॉर्च की रोशनी सीढ़ियों की ओर घुमाई। जैसे ही टॉर्च का प्रकाश सीढ़ियों पर पड़ा, उसने देखा कि सीढ़ियों पर कोई इंसान नहीं था, लेकिन एक काली परछाईं ऊपर की ओर जा रही थी। वह परछाईं हूबहू मल्हार जैसी दिख रही थी—वही जैकेट, वही कैमरा बैग, और वही चलने का अंदाज़।
हैरानी की बात यह थी कि उस परछाईं को बनाने वाला कोई शरीर वहां मौजूद नहीं था।
मल्हार ने कांपते हुए अपनी टॉर्च नीचे अपने पैरों की ओर की। फर्श पर रोशनी पड़ी, लेकिन वहां कुछ नहीं था। मल्हार की अपनी परछाईं गायब थी।
"यह नामुमकिन है..." मल्हार बुदबुदाया। भौतिक विज्ञान के नियम यहाँ दम तोड़ रहे थे। बिना शरीर के छाया और बिना छाया के शरीर—हवेली ने उसे दो हिस्सों में बाँट दिया था।
ऊपरी मंजिल का रहस्य
डर के बावजूद, जिज्ञासा और जीवित रहने की चाह ने उसे सीढ़ियों की ओर धकेला। उसे लगा कि अगर वह उस साये को पकड़ सका, तो शायद उसे अपनी परछाईं वापस मिल जाए।
ऊपर के गलियारे में पुरानी पेंटिंग्स टंगी थीं। जैसे-जैसे मल्हार आगे बढ़ रहा था, उन पेंटिंग्स में बने चेहरों की आँखें उसे ही देख रही थीं। वह एक बड़े कमरे के सामने रुका जिसका दरवाजा आधा खुला था। अंदर से एक मद्धम सी नीली रोशनी आ रही थी।
उसने अंदर कदम रखा। कमरा धूल से भरा था, लेकिन बीचों-बीच एक बहुत बड़ा आदमकद आइना (Mirror) रखा था। आइने के सामने वही साया खड़ा था—मल्हार का साया।
मल्हार आइने के पास पहुँचा। आइने में मल्हार का चेहरा तो दिख रहा था, लेकिन आइने के अंदर वाला 'मल्हार' हिल नहीं रहा था। वह स्थिर खड़ा उसे घूर रहा था।
अचानक, आइने के अंदर वाले साये ने अपना हाथ उठाया और आइने की सतह पर अंदर से मारा। ठक!
पूरा आइना थरथरा उठा। साये के चेहरे पर एक डरावनी मुस्कान उभरी और उसने बोलना शुरू किया। उसकी आवाज ऐसी थी जैसे दो पत्थर आपस में रगड़ रहे हों।
"तुमने सोचा था कि तुम सिर्फ यादें कैद करने आए हो? यहाँ तो रूहें कैद होती हैं, मल्हार।"
मल्हार पीछे हटा, "तुम क्या चाहते हो?"
साये ने आइने से अपना हाथ बाहर निकाला—एक धुआँ जैसा काला हाथ जो धीरे-धीरे हाड़-मांस के हाथ में तब्दील हो रहा था। "मुझे तुम्हारा शरीर चाहिए, और तुम्हें यह अंधेरा।"
इसके आगे क्या हुआ जन ने के लिए part-2 देखिए, क्या लगता है आपको मल्हार क्या करेगा आगे।