अध्याय :4
जीवन की मशाल और संघर्ष का संकल्प
मानव जीवन एक ऐसी सरिता के समान है जो निरंतरप्रवाहित होती रहती है। इस मार्ग में कई बार बड़े-बड़े पत्थर और चट्टानेंरुकावट बनकर खड़ी हो जाती हैं, किंतु क्या कभी पत्थरों की बंदिश सेबहती हुई नदियां रुकी हैं? कदापि नहीं। नदी अपना रास्ता स्वयं बनाती हैऔर उन्हीं चट्टानों को चीरते हुए आगे बढ़ जाती है। ठीक उसी प्रकार, हमारेजीवन में भी कठिनाइयों के पत्थर आते हैं, परंतु असली विजेता वही है जोउन हालातों की धमकियों के आगे अपनी नज़र नहीं झुकाता। जीवन काअर्थ केवल सांसें लेना नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में अपने आत्म-सम्मानऔर संकल्प को बनाए रखना है।
अक्सर लोग भाग्य और किस्मत का रोना रोते हैं, परंतु सत्य तो यह है किकिस्मत के हर पन्ने पर हमें अपनी मेहनत से किस्मत लिखवानी पड़ती है। सफलता किसी थाली में परोसी हुई वस्तु नहीं है, बल्कि इसे अपने पुरुषार्थसे प्राप्त करना होता है। जिस व्यक्ति के भीतर एक मशाल जैसा जज़्बाहोता है, वही अंधेरी रातों में भी प्रेरणा का दीप जला पाता है। यह जज़्बाही है जो इंसान को थकने नहीं देता और अगर वह गिर भी जाए, तो उसेदोबारा खड़े होने की शक्ति देता है। जीवन में हर बार गिरकर फिर सेवापस आना ही असली पराक्रम है।
वक़्त बड़ा बलवान होता है और कभी-कभी इसकी चोटें हमारे सुंदर सपनोंको छीन लेती हैं। ऐसा लगता है मानो राहों में बिछे कांटे हमारे पैरों कोछलनी कर रहे हों और हर कदम पर एक नयी चुनौती खड़ी हो। ऐसे समयमें कायर पीछे हट जाते हैं, परंतु धैर्यवान व्यक्ति वही है जो गगन को भेदनेवाली हुंकार लगाता है। जब चारों तरफ अंधेरा हो, तब हमें किसी और केसहारे की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपने हिस्से का सूरज खुदखींचकर लाना चाहिए। स्वयं की क्षमताओं पर विश्वास करना ही वहपहली सीढ़ी है जो हमें शिखर तक ले जाती है।
हमें याद रखना चाहिए कि संघर्ष ही जीवन का दूसरा नाम है। जो व्यक्तिस्वयं को परिश्रम की अग्नि में खर्च करता है, वही भविष्य में चमकता है। दुनिया केवल उन्हीं को याद रखती है और उन्हीं के बारे में जानने के लिएउत्सुक रहती है, जिन्होंने अपने जीवन में कठिन संघर्ष किया हो। इसलिए, जब भी जीवन में निराशा के बादल मंडराएं, तो घबराना नहीं चाहिए। बसएक बार फिर से खड़े होना है, अपनी पुरानी गलतियों से सीखना है औरनए उत्साह के साथ जीवन की लड़ाई लड़नी है। वापस आने का यहसंकल्प ही मनुष्य को अमर बनाता है।
सीख / नैतिक संदेश
इस अध्याय से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में कठिनाइयां औरअसफलताएं केवल एक पड़ाव हैं, मंज़िल नहीं। असली साहस इसमें नहींहै कि हम कभी न गिरें, बल्कि इसमें है कि हम हर बार गिरकर पहले सेअधिक मजबूती के साथ वापस खड़े हों। जो व्यक्ति अपने कर्म औरमेहनत पर विश्वास रखता है, वह अपनी किस्मत स्वयं लिखता है। हमेंहमेशा याद रखना चाहिए कि जो व्यक्ति आज खुद को मेहनत में खर्चकरता है, कल दुनिया उसी का सम्मान करती है और उसे ही अपना प्रेरणास्रोत मानती है। आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास ही सफलता की कुंजीहै।
अध्याय :5
कृतज्ञता का उपहार और माता-पिता का ऋण
मनुष्य के जीवन में सफलता के अनेक सोपान होते हैं, लेकिन उन सोपानों तक पहुँचने का मार्ग अक्सर दूसरों के त्याग औरबलिदान से निर्मित होता है। हमारे जीवन में 'कृतज्ञता' यानी 'ग्रैटिट्यूड' काभाव होना अत्यंत आवश्यक है। यह वह गुण है जो हमें अपनी जड़ों से जोड़ेरखता है। एक सच्ची घटना इस बात को बड़े मार्मिक ढंग से स्पष्ट करतीहै। एक निर्धन लेकिन अत्यंत मेधावी छात्र था, जिसके पिता एक छोटी सीकिराने की दुकान चलाकर घर का गुजारा करते थे। जब उस बालक नेअपनी कठिन मेहनत से मेडिकल की प्रवेश परीक्षा उत्तीर्ण की, तो उसकेसामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। कॉलेज की फीस और बॉन्ड भरने केलिए एक बड़ी धनराशि की आवश्यकता थी, जो उस गरीब परिवार कीक्षमता से बाहर थी।
उस समय एक मार्गदर्शक ने उसके पिता को एक कठिन लेकिन भविष्यबदलने वाला सुझाव दिया। पिता के पास अपनी संपत्ति के नाम पर केवलएक छोटा सा मकान था। मार्गदर्शक ने पिता से पूछा कि क्या उनके लिएउस मकान से बढ़कर उनका पुत्र है? पिता का उत्तर 'नहीं' था। अपने पुत्र केउज्ज्वल भविष्य के लिए उस पिता ने अपना एकमात्र ठिकाना, अपना वहघर बेच दिया और स्वयं किराए के मकान में रहने चले गए। यह केवल एकसंपत्ति का बेचना नहीं था, बल्कि एक पिता का अपने पुत्र के सपनों केप्रति अटूट विश्वास और समर्पण था। पुत्र ने भी इस त्याग की गरिमा कोसमझा और निरंतर परिश्रम करता रहा।
समय का चक्र घूमा और कुछ वर्षों बाद वह बालक एक सफल चिकित्सकबन गया। जब उसे अपनी पहली नौकरी और पहली तनख्वाह मिली, तोउसके मन में सबसे पहला विचार अपने पिता के उसी त्याग का आया। उसने अपनी सफलता का जश्न मनाने के बजाय उस ऋण को चुकाने कासंकल्प लिया जो उसके पिता ने उसके भविष्य के लिए उठाया था। उसनेबैंक से ऋण लिया और कठिन परिश्रम करके उसी मकान को वापसखरीदा जिसे उसके पिता ने वर्षों पहले बेच दिया था। जब उसने वह मकानअपने पिता को सौंपा, तो वह केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्किएक पुत्र की अपने पिता के प्रति सच्ची कृतज्ञता का प्रतीक था।
अक्सर हम अपने जीवन में बाहरी दुनिया के लोगों को धन्यवाद कहते नहींथकते, लेकिन उन माता-पिता को भूल जाते हैं जिन्होंने हमें इस योग्यबनाया। हम भूल जाते हैं कि हमारी एक छोटी सी सफलता के पीछे उनकीअनगिनत रातों की नींद और सुखों का त्याग होता है। सच्चा सुख किसीबड़ी उपलब्धि में नहीं, बल्कि अपने माता-पिता की आँखों में गर्व के आँसूदेखने में है। जब हम उनके हाथों को थामकर उनसे कहते हैं कि उन्होंनेहमारे लिए जो किया है वह अद्वितीय है, तब उन्हें अपनी परवरिश पर गर्वहोता है। यही कृतज्ञता हमारे जीवन को अर्थपूर्ण और अनमोल बनाती है।
सीख / नैतिक संदेश
यह अध्याय हमें सिखाता है कि कृतज्ञता ही वह आधार है जिस पर सुखीजीवन की नींव टिकी होती है। विशेषकर अपने माता-पिता के प्रति आभारव्यक्त करना हमारा परम कर्तव्य है। सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचने केबाद भी हमें उन हाथों को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने हमें चलनासिखाया और हमारे सपनों के लिए अपनी खुशियों की आहुति दे दी। माता-पिता का सम्मान और उनके त्याग को स्वीकार करना ही सबसे बड़ीपूजा है। जब हम दूसरों के प्रति कृतज्ञ होते हैं, तो न केवल हमाराव्यक्तित्व निखरता है, बल्कि समाज में प्रेम और सम्मान की भावना भीबढ़ती है।
मेरी अन्य किताबे मीता अनकहा अहसास उड़ान भी आमेजन पर उपलब्ध हैं
भूपेंद्र कुलदीप
9817153834
bhupendrakuldeep76@gmail.com