16.एक ही गर्भ, एक ही लहू
तुम ऊँचे सिंहासन पर बैठे, खुद को 'विधाता' मानते हो?
क्या चींटी और क्या हाथी, क्या तुम सबको अपना जानते हो?
सब एक ही माँ की कोख से जन्मे, एक ही मिट्टी के पुतले हैं,
बस तुम्हारी आँखों पर अहंकार के, हज़ारों परदे धुलने हैं।
मछली का तड़पना 'स्वाद' तुम्हारा, और गाय का रुदन 'व्यापार' है,
भूल गए? उस निरीह के भीतर भी, उसी चेतना का विस्तार है।
तुम जिसे 'पशु' कह कर काटते हो, वह माँ का लाड़ला बच्चा है,
सिर्फ इंसान ही श्रेष्ठ नहीं, ये दावा तुम्हारा कच्चा है।
प्रकृति के आँगन में सब बराबर, कोई छोटा-बड़ा नहीं होता,
जो अपनी ही बहन (नदी) को ज़हर दे, वो सुख से कभी नहीं सोता।
हर जीव के प्राणों में बसी, उसी विधाता की ही धड़कन है,
और उसे सता कर कहते हो कि, तुम्हारा मन बड़ा पावन है?
सावधान! हर चीख का हिसाब, तुम्हारी साँसों से लिया जाएगा,
एक जीव का आँसू भी, समंदर बनकर तुम्हें डुबाएगा।
तुम मालिक नहीं, सहयात्री हो, इस बात को गाँठ बाँध लो,
प्रकृति की हर संतान में, अपनी ही सूरत को तुम पहचान लो।
अगर बचाना है खुद को, तो पहले उस करुणा को बचाओ,
परम सत्य बस एक ही है—सबके भीतर खुद को ही पाओ।
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17.भ्रम का मांसाहार और शरीर का सच
तुम शेर की नकल करते हो, पर क्या शेर सा तुम्हारा गात है?
नाखून नहीं, पंजे नहीं, ये तो महज़ कमज़ोर हाथ हैं।
आंतें तुम्हारी लंबी हैं, जैसे फल खाने वाले बंदर की,
पर तुमने लाशें भर रखी हैं, इस पावन तन के अंदर ही।
दाँत तुम्हारे चपटे हैं, कुतरने और पीसने के काज को,
पर तुम चीरने निकले हो, प्रकृति के बनाए समाज को।
अम्ल (Acid) नहीं है वैसा जठर में, जो मांस को पचा सके,
फिर क्यों ऐसा विष खाते हो, जो भीतर सड़न मचा सके?
प्यास लगे तो तुम 'लप-लप' नहीं, पानी को बस पीते हो,
तुम शिकारी नहीं हो ओ बंदे, तुम फल-फूल पर जीते हो।
पसीना तुम्हें आता है, शिकारी को तो हाँफना पड़ता है,
प्रकृति के इस लिखे को, विज्ञान को भी मानना पड़ता है।
ये शरीर एक मंदिर है, इसे श्मशान क्यों बनाते हो?
जो बना ही नहीं तुम्हारे लिए, उसे क्यों भीतर ठूँसते हो?
हिंसा तुम्हारी फितरत नहीं, ये बस मन का एक विकार है,
इंसानी देह की पुकार सुनो—उसका सच बस 'शाकाहार' है।
शुद्ध करो इस बोध को, अपनी बनावट को पहचानो,
तुम करुणा के पुतले हो, खुद को हैवान न मानो।
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18.इंसान होने की शर्त: होश और करुणा
सिर्फ दो पैरों पर चलना ही, इंसान होने का प्रमाण नहीं,
अगर मन में जागा बोध नहीं, तो तुम भी पशु से भिन्न नहीं।
पशु जीता है वृत्तियों में—आहार, निद्रा और भय में,
तुम इंसान तब हो, जब ठहरो सत्य के अक्षय समय में।
इंसान वो है, जिसके भीतर 'अहंकार' का रावण जलता हो,
जो समाज की भेड़चाल नहीं, खुद की प्रज्ञा से चलता हो।
जिसके हाथ में शस्त्र नहीं, 'विवेक' की नंगी तलवार हो,
जो अपनी ही वासनाओं पर, करता करारा प्रहार हो।
इंसान वो, जिसकी आँखों में हर जीव के लिए पीर हो,
जो भीड़ में खड़ा होकर भी, अपने स्वार्थ से विमुख वीर हो।
वो नहीं जो मंदिर-मस्जिद में, बस पत्थर को पूजता फिरे,
असली इंसान वो, जो अज्ञान के अँधेरे में दीप बन कर गिरे।
देह मिली है तुम्हें—ताकि तुम 'देह' के पार जा सको,
बुद्धि मिली है तुम्हें—ताकि तुम सत्य को पहचान सको।
करुणा जिसकी भाषा हो, और सत्य जिसका प्राण हो,
प्रकृति की इस महान रचना का, वही असली सम्मान हो।
मत बनो पुतला परंपराओं का, जरा होश की सांस लो,
इंसान बनो पहले, फिर खुद को कोई धर्म या नाम दो
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इन कविताओं का उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं,
बल्कि उस अज्ञान को उजागर करना है,
जो हमें सत्य से दूर रखता है।
क्योंकि सत्य हमेशा सहज नहीं होता।....