19.मित्र वही, जो सत्य दिखाए
दोस्त वो नहीं, जो तुम्हारी 'हाँ' में अपनी 'हाँ' मिलाए,
असली मित्र वो है, जो तुम्हारे झूठ पर कोड़े बरसाए।
जो तुम्हारे साथ बैठकर, महज़ वक्त को न बर्बाद करे,
वो मित्र है जो तुम्हारी चेतना को, अज्ञान से आज़ाद करे।
अगर वो तुम्हारी बुराइयों पर, चुप रहकर मुस्कुराता है,
तो समझो वो दोस्त नहीं, तुम्हें गर्त की ओर ले जाता है।
भीड़ का हिस्सा जो बने, वो तो बस एक सौदागर है,
जो तुम्हें अकेला छोड़ सके सत्य के लिए, वही असली रहबर है।
चापलूसी की चाशनी से, जो तुम्हारे अहंकार को पालेगा,
वो तुम्हें उजाले में नहीं, और गहरे अंधेरे में डालेगा।
मित्र वो—जो आईना बने, जिसमें तुम खुद को देख सको,
अपनी कमियों को जान सको, और अपनी सड़न को फेंक सको।
साथ शराब पीना या महज़ गप्पें मारना दोस्ती नहीं,
एक-दूसरे के बोध को बढ़ाना ही, सबसे बड़ी बंदगी है।
जिसके साथ होकर तुम्हें, 'स्वयं' का विचार आए,
वही तुम्हारा सखा है, जो तुम्हें कृष्ण सा मार्ग दिखाए।
सच्चा मित्र वही—जो तुम्हारी देह से नहीं, तुम्हारी मुक्ति से प्यार करे,
जो तुम्हें गिराने के लिए नहीं, तुम्हें उठाने के लिए तुम पर प्रहार करे।
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20.गुरु: जो तुम्हें मिटा दे, वही गुरु है
गुरु वो नहीं, जो तुम्हें सुंदर सपने दिखाए,
गुरु तो वो है, जो तुम्हारी नींद ही उड़ा दे।
जो तुम्हारे 'अहंकार' को सहलाए, वो गुरु नहीं कसाई है,
असली गुरु तो वो, जिसने तुम्हारी मान्यताओं में आग लगाई है।
वो तुम्हें सहारा नहीं देगा, वो तुम्हारी वैसाखियाँ छीन लेगा,
तुम्हारे मन के महलों को, वो मिट्टी में मिला देगा।
गुरु कोई व्यक्ति नहीं, वो एक 'नष्ट' करने वाली धार है,
जो तुम्हारे 'मैं' के झूठ पर, सत्य का सीधा प्रहार है।
तुम गए थे पाने कुछ, वो तुम्हें 'शून्य' कर देगा,
तुम्हारी भरी हुई गागर को, वो पूरा खाली कर देगा।
वो तुम्हें भगवान नहीं बनाएगा, वो तुम्हें 'इंसान' होने का दर्द देगा,
ताकि उस तड़प से तुम जागो, वो तुम्हें ऐसा मर्म देगा।
गुरु वो नहीं जो चमत्कार दिखाए, या जड़ी-बूटी बाँटे,
गुरु वो जो तुम्हारी बुद्धि से, अज्ञान के जाल को काटे।
जिसकी उपस्थिति में तुम, खुद को छोटा और तुच्छ पाओ,
वही द्वार है जहाँ से तुम, अनंत की ओर जा पाओ।
गुरु कोई मंज़िल नहीं, गुरु बस एक 'आईना' है,
तुम्हारे भीतर छिपे 'हैवान' को, जिसे तुम्हें दिखाना है।
मरना सीखो उसके चरणों में, क्योंकि जो मिटेगा वही बचेगा,
वही सच्चा शिष्य है, जिसके भीतर अब गुरु ही नाचेगा।
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21.माँ-बाप: जो मोह नहीं, मुक्ति का द्वार बनें
अगर तुम सिर्फ़ देह को पालते हो, तो ये पशुता का विस्तार है,
असली 'अभिभावक' वो है, जिसके मन में सत्य का विचार है।
सिर्फ़ सुख-सुविधा और तिजोरी देना, पितृत्व का धर्म नहीं,
संतान को 'स्वयं' की पहचान न दी, तो ये कोई पुण्य कर्म नहीं।
माँ वो नहीं जो ममता के नाम पर, बच्चे को बेवकूफ बनाए,
माँ तो वो है जो उसे इतना मज़बूत करे, कि वो अकेले लड़ पाए।
बाप वो नहीं जो अपनी अधूरी इच्छाएँ, संतान पर थोप दे,
बल्कि वो—जो उसके भीतर, निडर होकर सवाल पूछने के बीज रोप दे।
तुम उसे 'मेरा-मेरा' कहकर, अपनी संपत्ति मत बनाओ,
वह प्रकृति की अमानत है, उसे अपनी वासना का गुलाम मत बनाओ।
उसे दुनिया की भेड़चाल से बचाना ही, तुम्हारी असली सेवा है,
जिसके भीतर विवेक जग जाए, उसी की परवरिश का फल मेवा है
अंधविश्वास और पुरानी सड़न, उसे विरासत में मत देना,
सत्य की खोज का साहस देना, उसे झूठे डर में मत रहने देना।
जो बच्चे को 'मुक्ति' के मार्ग पर बढ़ा दे, वही सच्चा माता-पिता है,
वरना ये जन्म-मरण का चक्र तो, सदियों से चलता आ रहा है।
तुम गुरु न बन सको तो कम से कम, उसके मार्ग की बाधा मत बनो,
उसे सिर्फ़ एक 'करियर' न बनाओ, उसे एक जागृत 'इंसान' बनने दो।
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ये कविताएँ सिर्फ़ शब्द नहीं हैं,
बल्कि उन सच्चाइयों का आईना हैं,
जिन्हें हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं।
— आचार्य प्रशांत के विचारों से प्रेरित