मन ,कर्म और भाग्य क्या है? इसको विस्तार से समझाए।
मन को उपनिषदों में ब्रम्ह का वह रूप कहा गया है,जो इंद्रियों से जुड़ा हुआ है, जो निरंतर वातावरण ,शिक्षा,समाज ,न्याय -अन्याय ,दुनिया के समस्त विरोधाभास और इंद्रियों के स्मृतिगत अनुभवों को ग्रहण करता है। मन को देखा नहीं जा सकता।
मन का व्याप मस्तिष्क से लेकर नाभि तक है, यह मनुष्य के व्यहवार जगत ,भाव जगत और कर्म जगत को समेट कर चलता है।
कल्पना,शब्द, एकाग्रता,चित्र, आवाज, आंखों देखी घटना,श्रद्धा,अंधश्रद्धा या कुछ भी ऐसा जो इंद्रियों को प्रभावित करता है,वह मन को भी छूता है।
वास्तविक जीवन इसी क्षण में है। परन्तु मन के पास जाने अनजाने अनुभवों का इतना बोझ है,की आप न चाहते हुए भी भूतकाल और भविष्यकाल में मन से ही चले जाते हो।
स्मृति अलग़ है, स्मृति कभी एक हद से ज्यादा बोझ नहीं रखती, वह कुछ चीजें भूल जाती है, परन्तु मन सारे पुराने, नए अनुभवों को इंद्रियों के कंपनों के साथ ग्रहण करता है।
मान लीजिए किसी एक दुकान के गरम गरम पकौड़े आपको पसंद है, अब वह दुकान बंद हो चुकी है, परन्तु उस विस्तार में जाते ही आपको पकौड़े का स्वाद पकड़ता है, वह दुकान याद आती है,
देखिए , वर्तमान में वह दुकान बंद है, आपकी स्मृति भी यह जानती है, फिर भी आपको स्वाद दिलाने वाला आपका मन है।
आप अगर कुत्ते से डरते हो, तो यह भय आपके कुत्तों के साथ जुड़े अनुभवों का कंपन है, जो बार बार आपको कुत्तों से सावधान करता है। और आप हर कुत्ते से दूर भागते हो।
मन को स्मृति, बुद्धि,इंद्रियों और वाणी से भी अधिक बलवान माना गया है, मन इन सभी के कंपनों का एक डेटा बैंक है।
कभी कभी ऐसे अनुभव जो आपने वास्तविकता में न ग्रहण किए हो, परन्तु सिर्फ उसके बारे में सुना हो, तो भी आपको उसके कंपन महसूस होते है, मन वास्तविकता और वर्तमान का मोहताज नहीं है, वह कल्पना , शब्द,संगीत या चित्रों से भी कंपन ग्रहण कर सकता है, जो अंधश्रद्धा से ग्रसित है, उसका मन उसे आत्मा,भूत,प्रेत ,पिशाच का भी कंपन दे सकता है, मन वातावरण से भी कंपन ग्रहण करता है, किसी वीरान जगह पर जाने मात्र से आपका मन आपको वास्तविकता से बिल्कुल विपरीत कल्पना से जन्मे अनुभव दे सकता है, यदि आपको ईश्वर पर श्रद्धा है तो आपका मन आपको स्वप्न और खुली आंखों से भी ईश्वर से संबंधित अनुभव दे सकता है, वह जो कंपन आपको देता है, आपको भविष्य की झलक भी दिखा सकता है, यह भी अनुभव दे सकता है कि आप ईश्वर को पूर्ण रूप से प्राप्त हो चुके हो।
भावनाओं के प्रति मन सब से ज्यादा संवेदनशील है, वह आपको उन्माद, निराशा, या सर्वश्रेष्ठ होने का भरम भी दे सकता है, मन के लिए बर्बादी और आबादी दोनों एक है, वह कभी भेद नहीं करता, विरोधाभास उसके लिए एक सिक्के के दो पहलू है। दैवीय कृपा और घृणित पशुता दोनों उसके लिए खेल मात्र है। आपको संत बनाकर भी किसी का बलात्कार करवाना मन के लिए आसान है, यदि मन ऐसे कम्पनों से भरा हो।
कुदरत आपको इंसान के रूप में जन्म देती है, परन्तु यदि आप मन के गुलाम हो तो वह आपको सिर्फ एक पात्र बना देगा।
पात्र के पास दो ही विकल्प है, एक वह व्यहवार जगत की प्रतिक्रियाओं के भरम में उलझे, जो मस्तिष्क से नियंत्रित होता है, या फिर वह कर्म जगत को प्राप्त होकर एक सुलझा हुआ महान पात्र बने जो नाभि से नियंत्रित होता है। भाव जगत एक ऐसा जगत है जो हृदय से नियंत्रित होता है, वह व्यहवार और कर्म जगत दोनों के लिए कार्य करता है। मन के लिए भविष्य और कल्पना को साकार रूप देना भी संभव है।
प्राचीन ग्रंथों में मन की गुलामी करना पतन माना गया है, मन की रचना होना ही पतन है, मन से मुक्त होने के लिए या मन को अपना गुलाम बनाने के बहुत तरीके खोजे गए है।
संकल्प, इच्छाशक्ति,योग, ध्यान, प्राणायाम, यह सब मन को नियंत्रित करने के माध्यम है, परन्तु यह भरम है क्योंकि यदि आपने संकल्प लेने के लिए शब्दों का प्रयोग किया, ध्यान के लिए कल्पना का प्रयोग किया या किसी मूर्ति, नाद, मंत्र का प्रयोग किया ,ध्यान करने या प्राणायाम करने के लिए सांस पर एकाग्रता बनाए रखी , तो मन आपके इन संकल्पों को समझ कर उसके हिसाब से अपने भरम रचेगा, और थोड़े बहुत अभ्यास के बाद आपको लगेगा कि आपको परम शांति मिल रही है, एकाग्रता या फोकस बढ़ रहा है, पर वह भी मन का ही विषय है।
यदि आप श्रीकृष्ण में मन को एकाग्र करते हो तो आपको चमत्कार के, या समाधि के अनुभव होंगे, किसी को रास लीला दिखेगी, किसी को मुरली सुनाई देगी, किसी को चक्र दिखाई देगा, और आपको लगेगा कि आप मन के पार चले गए। शब्दों से किया गया ध्यान शब्द को ही प्राप्त होगा।
यदि आपने जिब्रीश शब्द का प्रयोग किया तो वह भी शब्द ही तो है, शब्द मन का विषय है, विषय का उपभोग कर के विषय को ही प्राप्त होना है।
श्वास पर किया गया ध्यान आपको एकाग्र कर देगा, नासिका के मध्य ध्यान करना भी आपको केवल अनुभव देगा कि आप वर्तमान में हो, और जैसे ही यह अनुभव हुआ, उसके कंपन आपका मन ग्रहण के लेगा, और फिर आप उसके गुलाम होंगे।
मन आपको नए बोध, समर्पण भाव और स्वीकार की भ्रांतियां देकर आपको आध्यात्मिक गुरु या चिंतक बना देगा, और फिर ठीक आपको उसके भी विरोधाभास का सामना करना पड़ेगा ,जैसे आध्यात्म की ऊंचाई को प्राप्त हो कर भी ओशो को जेल जाना पड़ा, और जहर पिलाया गया। मन ने ओशो को भगवान होने का भरम पहना दिया। विश्वरूप दिखाने वाले कृष्ण भी शापित हो कर सामान्य मानव की तरह मृत्यु को प्राप्त हुए।
मन से बने विश्व को नाटक के रूप में उसके ही साधनों से जान लेना और खुद को इस महान नाटक के खेल का पात्र जानना ही पर्याप्त है। इसी को आप मुक्ति भी कह सकते हो। पर सिर्फ कहने के लिए।
इस जीवन की सभी घटनाएं, भाव, विचार, शब्द ,शरीर , और संबंधों से जुड़ा हुआ मोह सर्वथा नहीं रहेगा, यह अनित्य है, और नश्वर है, इसी को भली भांति जानना ज्ञान है।
व्यक्ति एक निश्चित समय के लिए जन्म लेता है, और अपना समय पूर्ण होने पर वह मृत्यु को प्राप्त होता है, तो मृत्यु और मृत्यु तुल्य दु:खो के भय, राग और द्वेष से मुक्त और शोक रहित होना *ज्ञान* है।
*कर्म* वह है, जो व्यक्ति जन्म और मृत्यु के बीच में उसके अपने समय काल में अपनी प्रकृति के द्वारा निर्धारित गुणों से युक्त हो कर करता है, कर्म उसके निर्वाह के लिए आवश्यक है। इसी लिए श्रीकृष्ण कर्म को आवश्यक बताते है।
हमारी ५ इंद्रिय विविध प्रकार के विरोधाभासी भावों को भोगती है। इसी से सुख -दुख,लाभ - हानि, जय - पराजय जैसे भाव प्रथम इंद्रिय को और उसी से अंतर को प्रभावित करते है। इसी प्रभाव से काम,क्रोध,मोह,लोभ, मद,मत्सर,ममत्व उत्पन्न होते है, और यह विविध प्रकार के राग (Attachments) और द्वेष (hatered) को जन्म देते है।
तो हमारी आंख,कान,नाक,जिह्वा और स्पर्श से संबंधित सभी प्रकार के विषयों से राग द्वेष सहजरूप से जन्म लेते है।
यदि यह विरोधाभास और राग द्वेष के होते हुए भी हमारा अंतर इससे उत्पन्न सुख और दुख से अप्रभावित रहे , एवं निरंतर शांत ,संतुष्ट रहे तो इसी स्थिति को *समत्व* कहा गया है। और *समत्व* ही *योग* है।
ज्ञान वस्तु ,व्यक्ति,शब्द,भाव और घटनाक्रम के अनित्य और परिवर्तनशील होने पर जोर देता है, और योग बाह्य रूप से विरोधाभासों को सहन करते हुए भी अंतर की शांति और स्थिरता पर जोर देता है, तो यदि कोई व्यक्ति जो ज्ञान योग में निष्ठा रखता है, वह संसार और उपलब्ध भोगों को परिवर्तनशील और अनित्य जानकर उससे उत्पन्न राग और द्वेष को अपने अंतर से अप्रभावित रखता है, उसे ज्ञान है कि सुख भी चला जाएगा, दुख भी, व्यक्ति भी चला जाएगा और वस्तु भी। तो ज्ञान योग रूपी बुद्धि से वह नित्य विरोधाभास को भोगता हुआ भी शांत संतुष्ट और प्रसन्न रहता है।
कर्म योग में निष्ठा रखने वाला जानता है, की मै जन्म और मृत्यु के बीच के समय में अपनी प्रकृति से प्रेरित कर्म करने हेतु बाध्य हूं। और यही मेरा अधिकार है, तो वह कर्म करना ही अपना अधिकार समझ कर, कर्म से उत्पन्न होने वाले राग द्वेष से मुक्त रहता है,
इसी इंद्रिय के विषय और विविध प्रकार के कर्मों से उत्पन्न विरोधाभास एवं राग द्वेष को श्रीकृष्ण *कर्मफल* कहते है, और वह कहते है कि "कर्मों के फल पर तेरा अधिकार नहीं।"
उदाहरण : यदि एक सुपर स्पेशियलिस्ट हार्ट सर्जन अपनी ही मां या बेटी के दिल का ऑपरेशन करता है, और उस प्रकिया में उसके शरीर की शस्त्र क्रिया करता है, तो उसे हिंसा का दोष नहीं लगता, इसी प्रकार कोई सैनिक या योद्धा भयानक युद्ध में कितने भी दुश्मनों को गोली मारे ,उसे हत्या का दोष नहीं लगता।
तो श्रीकृष्ण इसी को ही *स्वधर्म* कहते है, *स्वधर्म* को जानना ही ज्ञान योग और कर्म योग को जोड़ता है। जो संसार को अनित्य जानकर अपने कर्म रूपी स्वधर्म का पालन करता है, एवं स्वधर्म का पालन करते हुए राग और द्वेष से उत्पन्न *कर्मफल* से अप्रभावित रहता है,तो वह सभी प्रकार के दोष से मुक्त रहता है।श्रीकृष्ण कहते है, प्राणी मात्र कर्म करने हेतु बाध्य है, इसी लिए अपने स्वधर्म का पालन करने हेतु उस दिशा में कर्म करना , कर्म न करने से या अपने स्वधर्म को छोड़ किसी दूसरे के स्वधर्म का पालन करने से श्रेष्ठ है।
श्रीकृष्ण कहते है,की अपने स्वधर्म अनुसार किया गया यज्ञ,दान और तप सात्विक कर्म है, तथा स्वधर्म के पालन हेतु जो निश्चित अनिवार्य कर्म है वह भी सात्विक कर्म है।
उदाहरण :
यज्ञ:अर्जुन एक क्षत्रिय कुल में जन्मा राजकुमार है, तो उसके लिए युद्ध करना और धर्म की रक्षा हेतु शस्त्र उठाना यज्ञ है,।
दान : किसी को सुरक्षा का वचन देना और उसकी निस्वार्थ सुरक्षा करना दान है।
तप :अपने धर्म के निर्वाह के लिए विविध प्रकार के अस्त्र और शस्त्र प्राप्त करना और शिक्षा ग्रहण करना तप है।
इसी तरह यदि आप शिक्षक है; तो
यज्ञ: अपने पास आए विद्यार्थियों को श्रेष्ठ ज्ञान देना यज्ञ है।
दान : समाज के कमजोर और उपेक्षित लोगों की बिना किसी स्वार्थ के सहाय करना और उन्हें भी शिक्षा का अधिकार देना दान है।
तप : अपने शिक्षक रूपी स्वधर्म का पालन करने के लिए और यज्ञ एवं दान हेतु खुद भली भांति क्षमतावान और शिक्षित होना और निरंतर अभ्यास करना तप है।
इसी प्रकार स्वधर्म के पालन हेतु कर्म सात्विक कर्म है,
जो व्यक्ति यज्ञ ,दान तप और नियत कार्यों को छोड़ कर अन्य किसी भी प्रकार का कर्म करता है, वह राजसी कर्म है। अभिमान एवं किसी भी प्रकार के लोभ से प्रेरित होकर कर्म करता है, वह राजसी कर्म है।
और जो कर्म करने में प्रमाद करता है, अपने कर्तव्य का पालन करने से भागता है, वह मोह और प्रमाद से उत्पन्न हुआ तामसी कर्म है।
श्रीकृष्ण कहते है, की कर्म मात्र का चयन मनुष्य के प्रकृति दत्त गुण और समाज के कर्म विभाग के अनुसार होता है, प्रत्येक मनुष्य का अपना तप,दान और यज्ञ प्रकृति और समाज निर्धारित करता है। इसी लिए " में कर्ता हूं, या मैने ही यह कर्म किया", "में ही कर सकता हूं।", या " में ही सर्वश्रेष्ठ हूं, ऐसा अहंकार पालना मनुष्य को अपनी सहजता से विचलित करता है। यह अहम कर्मयोग से विचलित करने वाला और द्वंद्वों के चक्र में बांधने वाला है।
इसी लिए कर्ताभाव से मुक्त होकर स्वधर्म का पालन करना श्रेष्ठ है ।
श्रीकृष्ण ने ज्ञान और कर्म योग के माध्यम से संसार की अनित्यता को जानकर अपने स्वधर्म के अनुसार कर्म करने को कहा है और कर्म करते हुए राग द्वेष और ममत्व से उत्पन्न कर्मफल को सहन करने एवं भीतर से शांत और संतुष्ट रहने का मार्ग बताया है। अब यह प्रश्न होता है कि व्यक्ति आज के समय में स्वधर्म को कैसे निर्धारित करे? क्योंकि पूर्व काल में स्वधर्म त्रिगुणों यानी कि सत्व, राजस और तमस और ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य और शूद्र जैसे कर्म विभाग पर आधारित था। मोटे तौर पर हर एक व्यक्ति का स्वधर्म निश्चित था। परन्तु इस प्रणाली में अब परिवर्तन हुआ है। तो यह स्वधर्म निर्धारित करने के लिए विद्वानों ने २ प्रश्न पर चिंतन करने को कहा है।
(१)अगर आपके पास कोई वित्तीय बाधाएं नहीं होती, तो आप "काम के लिए ही कौन सी गतिविधि करते?
(२)वह कौन सा कर्म है जो करते समय आप समय का पता भूल जाते हैं?
यह दो प्रश्न पर चिंतन करे क्योंकि इसका उत्तर ही आपका स्वधर्म है। यह अक्सर आपके प्रकृति या स्वभाव का संकेत होता है। इस प्रकृति के अनुसार किया गया कर्म, यज्ञ, तप और दान सदैव विरोधाभासों के होते हुए भी व्यक्ति को अंदर से शांत और संतुष्ट रखता है। ज्ञान योग का मार्ग अष्टावक्र के द्वारा जनक को मिला था। जिसका सार अष्टावक्र गीता के रूप में उपलब्ध है। और कर्मयोग का मार्ग प्रकृति द्वारा सब जीवों को पहले से ही प्राप्त है। केवल मनुष्य इसे भूल गया है। और श्रीकृष्ण ने स्वयं सूर्य को इस योग का अधिष्ठाता बताया है।
श्रीकृष्ण ने आगे एक और मार्ग भी कहा है जिसमें ध्यान और भक्ति के द्वारा परमात्मा की विभूति अथवा निष्ठापूर्वक परब्रह्म पुरुषोत्तम को राग द्वेष से जन्मे सारे विरोधाभास रूपी कर्म फल और कर्म को अर्पण करने का मार्ग है।
ध्यान योग और भक्ति योग इस अनित्य संसार को छोड़ कर नित्य शाश्वत परब्रह्म को मन, वचन और कर्म से समर्पित होने की बात करता है।
अगर ध्यान और भक्तियोग से आप राग द्वेष तथा ममत्व से मुक्त हो कर स्वयं को परब्रम्ह में पा कर शांत और संतुष्ट हो सकते हो , तो यह मार्ग भी आप के लिए है। यह मार्ग आपको कर्म से विचलित नहीं करता पर यह भाव आपमें दृढ़ करता है कि समस्त संसार उसके अनित्य और परिवर्तनशील संयोग, कर्म एवं कर्मों का फल यह सब कुछ परब्रह्म में उसी तरह समाहित है जैसे नदिया समुद्र में समाहित है। यह एक आस्तिक मार्ग है,
परन्तु काल वश यह मार्ग भ्रष्ट हो चुका है, रूढ़िवादी और वर्णव्यवस्था वादी धार्मिक पंडितों, ब्राह्मणों
संतो और भक्ति कवियों ने केवल परब्रह्म की भक्ति, नाम स्मरण, भजन और कीर्तन को ही अपना नित्य कर्म बनाकर समत्व से स्वधर्म का मार्ग मनुष्य समाज को भुला दिया। और कथा, कीर्तन ,स्थूल कर्मकांडो से तथा भगवद नाम स्मरण से ही मनुष्य परब्रह्म में स्थित हो सकता है ऐसा समझाया, इसके लिए विविध आचार और नियम निश्चित किये गए और इसी से बहुत सारे अलग अलग संप्रदाय का जन्म हुआ, जिन संप्रदायों ने मनुष्य को मूर्ति, पुस्तक, यज्ञ , मंत्र, तंत्र ,निर्गुण और सगुण भेद एवं अलग अलग प्रकार के समाज और निष्ठाएं दी। जिसने आज दमन ,शोषण , वैमनस्य और वैचारिक तथा चरित्र के विकृत पतन को जन्म दिया है। आज धार्मिक कहे जाने वाला व्यक्ति दुःख और विचारों की दरिद्रता से त्रस्त है, मानसिक रूप से भ्रमित और संताप से परिपूर्ण है। मंदिर में रोज जाकर भी उसे शांति नहीं। तथा कथित आध्यात्मिक गुरु और संतों ने ध्यान और प्राणायाम को भी सगुण और निर्गुण रंग दे दिया है। श्रीकृष्ण द्वारा जिस मार्ग की सबसे अधिक बात की गई थी वह मार्ग उन्हीं के नाम से आज आपने भ्रष्ट स्वरूप को प्राप्त हुआ है। यह दु:खद बात है।श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते है " मुझ परब्रह्म में निष्ठा रखने वाला यह भली भांति जानता है कि मैं उसमें हूँ और वह मुझमें है"। यह जानकर यदि तू योद्धा है तो तू युद्ध कर, युद्ध के परिणाम से जन्मा शोक और हानि भी मुझमें है, और युद्ध के बाद मिलने वाला राज्य और भविष्य भी मेरे अंदर ही समाहित है। जो भी तुझे पहले,आज या बाद में प्राप्त होगा ,या जो भी तुने पहले, आज और बाद में खोया , स्वयं तू और तेरे सभी प्रकार के कर्म अपने सभी फलों के सहित तू अपने आप को मुझ परब्रह्म में विद्यमान देख। ऐसा जानकर भी तू शोक मुक्त होकर परम शांति को प्राप्त होगा"।*
अब यह बात विश्वरूप दर्शन योग का सार है।
पंडितों ने इसको भ्रष्ट किया है, वह कहते है कि रोज परमात्मा के नाम और मंत्र का जप करो, रोज पारायण करो। इससे रोज आपको यह याद रहेगा कि परमात्मा इस जगत का स्वामी है और इसी से आपकी भक्ति दृढ़ होगी ।
"श्रीकृष्ण कहते है कि सब कुछ मुझ ही में विद्यमान जानकर यदि तू योद्धा है तो युद्ध कर, यदि चिकित्सक है तो लोगों को रोगमुक्त कर, यदि शिक्षक है तो अच्छे से अच्छा पाठ सिखा। यही सच्ची निष्ठा है। श्रीकृष्ण आपको समत्व और स्वधर्म के मार्ग से कभी विचलित नहीं करते। श्रीकृष्ण कहते है कि इस प्रकार जो भी आपने संसार को मुझमे विद्यमान देखता है वह संसार भोगते हुए भी सन्यासी है, ऐसे भक्त का प्रत्येक कर्म स्वयं परब्रह्म ही है। इसी को कृष्ण ने मोक्ष संन्यास कहा है।
विज्ञान का अर्थ है " विशिष्ट ज्ञान",
विशिष्ट ज्ञान वह है जो जीवन को समझने और जानने में आपकी सहायता करता है। विशिष्ट ज्ञान के ४ स्तंभ है। इन्हीं ४ स्तंभ को विस्तार से समझा गया है।
#१.भरम ---(आंतरिक और बाह्य)
(१) गलतफहमी
(२) कहानी
#२.सापेक्ष (व्यहवार)----( आंतरिक और बाह्य)
(१) किसी आधार पर टीका हुआ।
(२) किसी के द्वारा जाना और समझा गया।
#३.निरपेक्ष ( आत्मबोध)
(१) बोध - आंतरिक और बाह्य
(२) मृत्यु - बाह्य
#४.संसार के यथारूप से मुक्त होना।
(मोक्ष)
(१) निर्वाण- आंतरिक
(२) समाधि - आंतरिक
व्यहवार, और आत्मबोध की संभावनाओं से बना जीवन एक ही निश्चित गति को प्राप्त है, वह है मृत्यु। भरम में कुछ अमर होने की संभावना है, व्यहवार और आत्मबोध नश्वर है। और भरम ही व्यवहार, आत्मबोध की संभावनाओं का मूल उत्पन्न करता है।
इसी लिए भरम या कहानी पीढ़ी दर पीढ़ी चलते रहते है, उस से नई संभावनाए जन्म लेती है। भरम को विचार कहा गया है। विचार को ही विज्ञान,मन, भाग्य,साइकी,माया , idea,Life Script, कहा गया है। इसी लिए मन को देखा नहीं जा सकता।
व्यक्ति गलतफहमी और कहानी के अनुसार चलता है, इसी गलतफहमी और कहानी में उतार चढ़ाव और द्वंद्व उत्पन्न होते है। जब व्यक्ति गलतफहमी और कहानी को यथारूप जान लेता है, वह बोध को उपलब्ध होता है। मृत्यु को इस स्क्रिप्ट का अंत माना गया है, और इस स्क्रिप्ट को जीवन रहते हुए ,कहानी जानने वाला सुलझा हुआ, जानने वाला व्यक्ति कहा जाता है। जानने वाला व्यक्ति न बंधा हुआ है, न मुक्त है। वह केवल एक पात्र है।
बच्चे के जन्म के बाद उसके मस्तिष्क में कहानी रची और रचाई जाती है, जिसमें समाज,परिवार,धर्म,सरकार,विश्व, इतिहास, पर्यावरण ,युद्ध,महामारी जैसे महत्वपूर्ण घटक काम करते है, उसकी संगत और अपने कर्म भी महत्वपूर्ण घटक है। यही घटक जीवन में उठा पटक लाते है। चाहे आप इस विचार को अमर समझो या नश्वर इसका एक चक्र है और इसी चक्र को विश्व कहा गया है।
कुछ लोग इस स्क्रिप्ट को अनंत मानते है, मतलब एक कहानी खत्म तो दूसरी शुरू होती है, और यह चक्र को जन्म और पुनःजन्म का चक्र माना गया हैं। व्यक्ति को एक से दूसरी स्क्रिप्ट के साथ बांधने वाला घटक कर्म है, और कर्म से उत्पन्न पाप और पुण्य की अवधारणा भी मानी गई है। इस जन्म मरण के चक्र में बंधा हुआ जीव संसारी होता है, इसी से मुक्त होने के बहुत मार्ग है, जिसमें एक मार्ग अष्टांग योग है। जो इस मार्ग को उपलब्ध होकर जन्म मृत्यु रूपी चक्र से मुक्त हो गया वह समाधि प्राप्त योगी मोक्ष मार्गी माना गया है, वह मुक्त है, वैरागी है, वह फिर से ऐक्टिंग नहीं करता। यानी फिर से गलत फहमी या कहानी नहीं पालता। बोध या समाधि कुछ लोगों को प्राप्त होती है वह बुद्ध पुरुष, संत, महात्मा कहलाते है। अंतहीन जन्मों का चक्र और मोक्ष का मार्ग प्राचीन मार्ग है, जिसे सनातन, जैन और बुद्ध मत ने अलग अलग तरीके से स्वीकार किया गया है। समाधि से मोक्ष की और जाने वाले मार्ग को आस्तिक मार्ग माना गया है, और ईश्वर को इस मार्ग का मूल माना गया है। कुछ लोग ईश्वर को प्राप्त करने हेतु अलग अलग प्रकार के उपाय करते है। ईश्वर को पाना ही समाधि प्राप्त करना है, यह धारणा भी प्रचलित है, भक्ति योग का मार्ग यह स्पष्ट करता है। जो निर्वाण या समाधि को प्राप्त हुए है उनके विचार या उनके सिखाए मार्ग अमर है, उनको बोधिसत्व, परमात्मा, तीर्थंकर , परब्रम्ह कहा गया है।
नास्तिकता एक मार्ग है ,जो तर्क देता है कि कहानी में बंधन और मुक्ति दोनों ही कहानी है, दूसरे शब्दों में बंधन और मुक्ति भी एक प्रकार का विरोधाभास है।
भरम से लेकर मोक्ष तक सारा पुरुषार्थ कहानी ही है। मोक्ष के रस्ते पर चलकर निर्वाण या समाधि का रास्ता भरम से सदा के लिए मुक्त होना नहीं है। जैसे एक जादूगर अपने खेल को जानता है, फिर भी वह खेल दिखाता ही है। वह भरम दिखा कर ही मनोरंजन करता है। इसी लिए समाधि या निर्वाण को प्राप्त हुए विचार भी मुक्त नहीं है, वह अलग तरह के विरोधाभास को प्राप्त हुए है। और ईश्वर की अवधारणा तो छोटे भरम से मुक्त के लिए बड़ा भरम पालने जैसी है, क्योंकि जहाँ राम और शंकर की धारणा है वहां भूत ,प्रेत ,पिशाच आदि उपद्रवों की भी धारणा है, जहां भगवान की धारणा है, वहां शैतान की भी धारणा है।
इसी लिए आस्तिकता का मार्ग छोटी गलतफहमी को मिटाने के लिए बड़ी गलतफहमी को पालने का मार्ग है।
कहानियाँ अमर रहेंगी, इनके विचार भी परन्तु छोटी कहानियों के पार बड़ी कहानियों से जाने की बात का मार्ग पुराना है। पुराने विचार प्रेरणादाई हो सकते है परंतु उपद्रवी भी।
एक मार्ग जो आत्मा,पुन:जन्म,ईश्वर,मोक्ष,भक्ति,निर्वाण,समाधि,आत्मज्ञान जैसे अमर हो चुके भरम से दूर होने की बात करता है, और कहता है कि जो भी व्यक्ति जन्म लेता है, समाज के द्वारा उसे यह भरम सिखाए जाते है, आपका जिस भी धर्म या संप्रदाय में मानने वाले परिवार में जन्म हुआ है, वह परिवार आप को अपनी मान्यताओं के अनुसार सांप्रदायिक प्रशिक्षण देगा। और आपको एक नश्वर पहचान भी देगा,जो आपके नाम और उपनाम के रूप में आप के साथ रहेगी।
उदाहरण: एक बच्चे का जन्म एक वैष्णव परंपरा में विश्वास रखने वाले कुल में जन्मे पिता और जैन परंपरा में विश्वास रखने वाले कुल की माता के गर्भ से हुआ। बचपन से उसे वैष्णव और जैन परंपरा का प्रशिक्षण दिया गया। अब यह प्रशिक्षण आस्तिक मार्ग सिखाता है। और उस बच्चे को एक नाम दिया " यश" अब यह नाम उसकी पहचान है, उसकी मृत्यु तक , अब यह नाम "यश" उसकी सामाजिक पहचान है, समाज की दृष्टि से यह एक पात्र है। और उसकी पहचान है ,की वह वैष्णव है, और जैन भी है। यह मार्ग कहता है, की एक बच्चे का जैन होना, वैष्णव होना और उसको यश नाम मिलना मात्र एक संभावना है, जो अनंत संभावनाओं में से एक है। और इस संभावना पर उस बच्चे का कोई नियंत्रण नहीं है, बाद में उसे जो प्रारंभिक शिक्षा और पोषण प्राप्त होगा वह उसके अपने समाज की प्रतिकूलता और अनुकूलता के कारण होगा। तो यह केवल एक छोटी सी संभावना है, अब इसी बच्चे का जन्म अगर सिख मत में मानने वाले परिवार में होता तो यह पूरी संभावना बदल जाती। तो व्यक्ति जन्म से ही एक संभावना का वहन करता है, दूसरा आयाम उसका अपना स्वभाव भी है, जो उसके भविष्य का चयन करता है, अब भविष्य की भी अनेक संभावना है, व्यक्ति अपने भाग्य और स्वभाव अनुसार एक संभावना या अनेक विकल्पों को चुनता है, जैसे सिद्धार्थ का जन्म एक क्षत्रिय कुल में हुआ, उसने क्षत्रिय परिवार के अनुकूल शिक्षा प्राप्त की परंतु समाज के दुख और द्वंद्व को जानकर उससे मुक्ति का उपाय जानने हेतु अपने करुणामय स्वभाव का प्रभाव बलवती होने पर उन्होंने संन्यास धारण किया, वहा भी उन्होंने अपने भाग्य से जो भी मान्यता प्राप्त थी उस मान्यताओं के मार्ग पर चल कर सांख्य , अष्टांग योग और अन्य कठोर मार्ग पर चल कर आत्मज्ञान को प्राप्त करने हेतु परिश्रम किया, और उस पर कुछ प्राप्त न हुआ, बाद में अपनी स्वाभाविक अनुभूति से उन्हें मध्यम मार्ग का ज्ञान हुआ और बुद्धत्व प्राप्त हुआ।
अब समाज और परिवार द्वारा प्राप्त हुई पहचान और सांप्रदायिक मान्यताएं भी प्रशिक्षण है और वह भी संभावना है, और आपका स्वभाव भी आप को दिए गए प्रशिक्षण और आप के साथ हुए व्यहवार का प्रतिबिंब है, बच्चा अनंत संभावनाओं को लेकर पैदा होता है, सिद्धार्थ के जन्म पर भी यह भविष्यवाणी की गई थी के या तो वह चक्रवर्ती राजा होगा, या प्रखर सन्यासी उस पर असित मुनि ने कहा था कि वह बुद्धत्व को प्राप्त होंगे।यानी कि बच्चे में क्षत्रिय के लक्षण और सन्यासी के लक्षण दोनों थे, दो संभावना थी परन्तु उसने स्वभाव और परिस्थिति के अनुसार संन्यास के मार्ग का चयन किया। और आंतरिक अनुभूति से बुद्धत्व के मार्ग को प्राप्त हुए।
तीन आयाम
(१) भाग्य - समाज *
(२) स्वभाव और परिस्थिति ( प्रकृति)- प्रशिक्षण
(३) अनुभूति- स्वतंत्र चयन
समाज : डॉ भीमराव अंबेडकर भाग्य से दलित वर्ग में पैदा हुए, उन्हें सभी दुखों और अन्यायों को भोगना पड़ा जो दलित वर्ग को मिलते थे।
प्रकृति : उन्होंने अपने स्वभाव के अनुकूल अन्याय का प्रतिकार किया और श्रेष्ठ प्रशिक्षण प्राप्त किया। बाद में भारत के संविधान की रचना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने सनातन धर्म की विषमताओं से त्रस्त हो कर बुद्ध धम्म को स्वीकार किया।
अनुभूति : उन्होंने बुद्ध धम्म में नवयान नाम के नए मार्ग का प्रारंभ किया।