a broken door in Hindi Women Focused by कमल चोपड़ा books and stories PDF | टूटा-सा कोई दरवाजा

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टूटा-सा कोई दरवाजा

​टूटा-सा कोई दरवाजा

​रात काफी हो गयी थी। आसपास की झुग्गियों से खड़कते हुए बरतनों, बिलबिलाते हुए बच्चों, कलपती हुई बुढ़ियों, खाँसते-खँखारते हुए बूढ़ों, झींकती हुई स्त्रियों और शराब के भभूके से भरी गलियों की आती हुई आवाजें कुछ कम हो गयी थीं।

​उन झुग्गियों को एक सँकरी-सी गली के बीचोंबीच बैठा खजुआया कुत्ता अपनी पिछली टाँग से अपना कान खुजा रहा था। दूर से गिरते-पड़ते आते हुए एक शराबी को देखकर कुत्ता अपनी नैतिक जिम्मेवारी के तहत उठ खड़ा हुआ था। नशे के बावजूद शराबी की नजर कुत्ते पर पड़ी तो घबराहट के मारे पसीना-पसीना हो गया। ज्यों ही कुत्ते ने गुर्राते हुए अपना कदम आगे बढ़ाया, मौत को अपनी ओर बढ़ता देख शराबी मारे घबराहट के पास ही की अधखुले अधटूटे-से दरवाजेवाली एक झुग्गी की ओर लपका।

​कच्ची लकड़ी की फट्टियों से बना दरवाजा उसके जरा-सा धकेलने पर खुल गया था। दरवाजे को रोकने के लिए आगे अटकायी गयी ईंट एकतरफ को हट गयी थी। अन्दर घनाघुप अंधेरा था। नशे के कारण सिकुड़ी हुई उसकी पुतलियाँ घने अंधेरे को भेद नहीं पा रही थीं।

​जरा-सा खड़का झुग्गी के अन्दर अपने दो-तीन छोटे-छोटे बच्चों को लेकर सोई हुई विशंभरी के कानों तक पहुँचा ही था कि वह हड़बड़ाकर उठ बैठी। इस तरह अचानक अन्दर घुस आये अनजान व्यक्ति को देखकर उसका जैसे साँस ही सूख गया, "क...क...कौन?"

​झूलते-हिलते अपने शरीर पर काबू पाने की कोशिश की शराबी ने, पर हड़बड़ी में वह पास पड़े बरतनों पर गिर पड़ा। विशंभरी ने थोड़ा कड़क होकर पूछा, "तू है कौन? कहाँ से घुसा आ रहा है?"

​जल्दी से खड़ा होते हुए शराबी ने कहा, "वो साला एक कुत्ता मेरे पीछे पड़ गया..."

“मेरा ई घर मिला तुझे? वो भी रात के इस बखत?”

​बाहर झाँका विशंभरी ने। कुत्ता इस बीच जा चुका था। डरकर शराबी ने पैंतरा बदला और लड़खड़ाती जुबान से कहा, “वो...राम आसरे, हाँ वो राम आसरे... मन्ने सोचा ये आसरे का घर है... यहीं कहीं रहता था...”

​बड़ी फुर्ती से विशंभरी ने पास ही पड़ा हुआ डण्डा उठाया और उसकी ओर लपकी, “हाट... हट... कुत्ते कमीने... अब बहाने टिका रहा है। बरतन चुराने आया था... जानती हूँ तुम जैसे स्मैकियों को...”

​दुरदुराये जाने के बावजूद वह कुछ क्षण तक नशे में बेसुध-सा वहीं-का-वहीं खड़ा रहा लेकिन तब तक सिर के पास से होता हुआ एक डण्डा उसके कंधे पर आ लगा तो वह बिलबिलाता हुआ बाहर की ओर बढ़ा, “क्या... मैंने क्या... किया है? मैं तो राम आसरे का घर समझ के... गलती से... मैं कोई चोर हूँ... किया क्या है?... कुछ किया भी है मैंने?”

​“ठहर कमीने, बताती हूँ...!”

​“मैं तो गलती से... किया भी है मैंने कुछ? मैंने...”

​कुछ असामान्य-सा पाकर उसके छोटे बच्चे उठ बैठे और रोने लगे थे। बारह साल का बड़ा लड़का बिन्नू उन्हें चुप कराने की कोशिश करने लगा था।

​गाली-गलौज, झगड़े-झंझट और मार-पिटाई जैसी बातें उस झुग्गी बस्ती के लिए नयी नहीं थीं। अगर ऐसी घटना कहीं आसपास ही हो रही हो तो उसमें शामिल होकर उससे मजा लेना उनका धर्म हो जाता है। बच्चे, बूढ़े, औरतें, जवान अपने काम-धाम या नींद छोड़कर अपनी-अपनी झुग्गियों से बाहर निकलने लगे। क्या बात हुई, क्या बात हुई कहते हुए आगे बढ़ने लगे थे।

​बात समझ लेने के बावजूद कोई उस पर विश्वास नहीं कर रहा था, “ठीक-ठाक बता दे बे, क्या बात हुई?” शराबी को लगा वह बुरी तरह फँस चुका है। लोग उसे बुरी तरह मारेंगे। कोई उसकी बात पर विश्वास नहीं करेगा। पड़ोसी पड़ोसी का ही साथ देगा। उसने वहाँ से भाग निकलने की कोशिश की लेकिन झुग्गीवालों ने उसे धर दबोचा। आज तो उन्हें जैसे मौका मिला था अपनी मर्दानगी दिखाने का। ऐसे कैसे जाने देते उसे? चारों तरफ घुप अँधेरा था। वहाँ जमा लोगों की आपस में खुसर-पुसर और खीं-खीं जारी थी। बीच-बीच में कोई-कोई आदमी यों ही ललकारता हुआ बड़क मारता—मारो साले को...!

​विशंभरी अपनी पूरी ताकत उस अनजान शराबी को गालियाँ देने में लगा रही थी। अन्दर रोते हुए, उसके बच्चे उसके लगी आग में जैसे घी का काम कर रहे थे।    

   गलियों में घूम-घूमकर लोहे की बाल्टियों को तल्ले लगानेवाले अधबूढ़े बिज्जू लोहार ने आगे बढ़कर विशंभरी से पूछा, “ठीक-ठाक बता, बात के हुई थी? इस साल्ले ने तै हम देख लेंगे...”

​“बात तो...”

​उसके कुछ बोलने से पहले ही अन्दर से बिन्नू के बुरी तरह खाँसने और उबाकने की आवाज सुनकर वह घबराकर झुग्गी के अन्दर दौड़ी, “क्या हुआ मेरे लाल को...”

​बिज्जू लोहार वहीं का वहीं खड़ा रह गया। उसे लगा विशंभरी ने उसकी बात को तरजीह नहीं दी है। खिसियाकर रह गया वह, “साली, जानबूझकर बात को टाल गयी। दाल में कुछ काला है।”

​झुग्गीवालों से घिरा हुआ शराबी उनके आगे हाथ-पाँव जोड़ रहा था, “मुझे जाने दो मैं तो इधर गलती से आ गया। नशे के कारण कुछ नहीं सूझा मुझे और कुछ अँधेरा... मैं तो उधर इन्दिरा गाँधी कैम्प की झुग्गियों में रहता हूँ। अँधेरे में भटक गया...”

​“झूठ बोल रहा है स्साला... पेंदे पे दो लात पड़ेंगी तो साला...”

​“मैन्ने कुछ नहीं किया... यकीन करो... यकीन करो... मुझे जाने दो...”

​रामदास कबाड़ी जिसकी बीवी को मरे तीन साल हो गये थे और आमतौर पर विशंभरी की झुग्गी के चक्कर काटता रहता, सुबह जब विशंभरी शान विहार की कोठियों में काम करने के लिए जाती तो वह भी काफी दूर तक उसके पीछे-पीछे जाता। विशंभरी को सब पता था लेकिन उसने कभी उसे घास नहीं डाली थी। बल्कि एकबार तो विशंभरी ने शान विहार के मोड़ के पास चप्पलों से उसकी पिटाई भी कर दी थी। आज रामदास कबाड़ी को अपनी खुन्दक निकालने का मौका मिल गया था, “साली ने बुलाया होगा... चोरी-छिपे नया धन्धा शुरू किया होगा। हुँह साली बड़ी सती सावित्री बनी फिरती है?... मुझे तो पहले ही शक था।... आज असलियत खुली साली की... बड़ी खिलाड़ी औरत है साली... दो साल हो गये इसके पति को मरे... क्या पता उसे भी इस साली ने खुद ही कुछ पिला-खिलाकर मारा हो?”

​पीछे खड़ी औरतों की खुसर-पुसर की आवाज भी अब थोड़ी ऊँची, स्पष्ट और एकमत हो गयी थी, “राँड ने खुद ही बुलाया होगा इसे... हाय-हाय देखो तो, कैसी छिनाल है और ऊपर से कैसी सती-पव्वित्तर बनती है?”

​शराबी का चढ़ा हुआ नशा काफी कुछ उतर चुका था। इतने लोगों के बीच से बचकर भाग निकलना उसे असम्भव-सा लग रहा था। लोगों के शक की बात अब तक उसके कानों तक भी पहुँच चुकी थी। उसे लगा यहाँ से बच निकलने का यही एक रास्ता हो सकता है। उसने अपने माथे का पसीना पोंछा और थोड़ा सहज दिखने की कोशिश करता हुआ बोला, “हाँ-हाँ... आप लोग ठीक कह रहे हैं?”

​“क्या ठीक कह रहे हैं?”

​थोड़ा झेंपने शर्माने के अन्दाज में शराबी ने धीरे से कहा, “ये औरत खुद बुलाकर लाई थी मुझे... मैं तो मेन सड़क से जा रहा था... इन्दिरा गाँधी कैम्प की अपनी झुग्गियों की ओर मुड़ने लगा कि इस औरत ने बुला लिया। कहने लगी पैसों की जरूरत है...।”

​बिज्जू लोहार उछला, “मैंने तो पहले ही कह दिया था। हुई न यही बात... मानते हो... सब पता रहता है हमें...।”

​रामदास कबाड़ी ने छाती चौड़ी करते हुए कहा, “सबसे पहले तो मैंने खुद कहा था कि... निकली ना वही बात... हम भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेले...।”

​“इस राँड को तो देखो? ...हैं?”

​विशंभरी अपनी झुग्गी के अन्दर बिन्नू की उल्टी साफ कर रही थी। बाहर लोग खुलकर उसे गालियाँ देने में जुट गये थे।

​“जब खुद बुलाके लाई तो फिर झगड़ा किस बात पे हुआ?”

​थोड़ा अटकते और अकबकाते हुए शराबी बोला, “झुग्गी पे पहुँचकर बोली-पाँच सौ लूँगी। मैंने कहा कि इतने तो मेरे पास हैं नहीं। बोली-सीधी तरह निकाल वर्ना... शोर मचा दूँगी। बुरी तरह फँस जाओगे। मेरे पास इतने पैसे थे ही नहीं तो देता कहाँ से?”

​भीड़ पर अपनी बातों का असर होता देख शराबी ने थोड़ा उत्साहित होते हुए कहा, “आप खुद समझदार हैं। मैं ऐसा आदमी नहीं हूँ। मैं तो खाहमखाह फँस गया...।”

​बस्ती के आधे लोग समझते थे विशंभरी ऐसी नहीं है पर आधे समझते थे वह ऐसी ही है।

​दो साल पहले बस्ती में जहरीली शराब पीकर कई लोग मर गये थे। लाशें पुलिस ले गयी थी। लोगों का कहना था कि कम-से-कम पच्चीस लोग मरे होंगे लेकिन पुलिस ने कहा सिर्फ आठ लोग मरे हैं। विशंभरी के पति को भी पीने की बहुत बुरी लत थी; वह मरनेवालों में से एक था। कुछ लोगों ने भट्ठी के पास पड़ी उसकी लाश को ले जाते हुए पुलिस को देखा था पर... पुलिस ने उसका नाम गुमशुदा लोगों की लिस्ट में जोड़कर उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कर ली थी।

   विशंभरी को भी पता था कि उसका पति जहरीली शराब पीकर मर चुका है पर पुलिस के भुलावे को सच समझकर अपने मन को तसल्ली देने के लिए बाद में कई दिन तक उसे ढूँढ़ती रही थी। वह कहीं होता तो मिलता? उसका पति पीछे छोड़ गया—तीन छोटे-छोटे बच्चे और एक झुग्गी।

​पति के चले जाने से वैसे तो कोई फर्क नहीं पड़ा था। वह पहले भी कोठियों में चौका-बरतन करके कमाकर लाती थी और घर चलाती थी और अब भी वह अपने हाथों से कमाती थी और बच्चे पाल रही थी। उसका पति पीकर घर में ही पड़ा रहता था पर उसके रहते उसे बस्तीवालों के इशारों और नजरों का निशाना नहीं बनना पड़ता था जैसे कि उसे अब बनना पड़ रहा था।

​बस्ती में लौंडे-लफंगों से लेकर ऐसे खबीस-खसूटों की कमी नहीं थी जोकि हमेशा विशंभरी पर नजर गड़ाये रहते। वे बात और है कि उसने कभी उनकी फब्तियों-फिकरों की परवाह न कर उन्हें कभी घास नहीं डाली थी। इसलिए उसे कई बार अपने बारे में उल्टा-सीधा झूठ सुनना भी पड़ता और कई बार उसे गाली-गलौज भी करनी पड़ती। कई बार उसे जूती भी उतारनी पड़ती।

​जैसे भी था वह किसी तरह अपनी इज्जत बचाये लिए आ रही थी कि पता नहीं कहाँ से आज ये शराबी उसके घर में आ घुसा था। बुखार से बुरी तरह तप रहे बिन्नू का खाँसते-खाँसते साँस रुकने को हो आया था। उसकी लगातार बिगड़ती हुई हालत देखकर घबराकर विशंभरी रोने लगी थी।

​बाहर जमा लोगों की भीड़ बढ़ गयी थी।

​उँगलियाँ विशंभरी की ओर उठ गयी थीं, “साली शर्म के मारे अन्दर जा घुसी है...”

​“बाहर कैसे निकले? अन्दर घुसकर रो रही है साली!”

​“हद हो गयी बेशर्मी की...”

​पीछे खड़ी सफेद बालोंवाली मरियल-सी बुढ़िया एकाएक अपने दोनों हाथों को हवा में झटकाते हुए झींकने लगी, “हाय-हाय... कैसा जमाना आ गया राम-राम... झुग्गी में तीन-तीन बच्चों के मौजूद रहते इस राँड ने ग्राहक बुला लिया? कम-से-कम बच्चों का कुछ शर्म करती... हाय-हाय बच्चों के सामने... हया-शर्म-लिहाज कुछ तो होती है।”

​ऐसे कहा उस मरियल बुढ़िया ने जैसे उसे ग्राहक के बुलाये जाने पर एतराज नहीं बल्कि बच्चों की मौजूदगी में बुलाये जाने पर एतराज था।

​“मुझसे सुनो असलियत...” किरयानेवाले लाला लक्ष्मीचन्द ने आगे बढ़कर सबको चुप कराया फिर गहरा राज खोलने के अन्दाज में फुसफुसाया, “असल में विशंभरी है तो शरीफ औरत पर... मजबूरी जो न करवाये। आज आयी थी मेरे पास, कहने लगी—लालाजी पाँच सौ रुपये उधार दे दो। मेरा बच्चा बीमार है। इलाज करवाना है। बोली, जो कहो करने को तैयार हूँ। मैं ठहरा सीधा-सादा... मुझे क्या समझ, क्या करने-कराने को तैयार है। वो तो अब समझ में आया कि... ऐसी बात थी...”

​“फेर दिये तुमने पाँच सौ...”

​“कहाँ से देता मैं?” मैंने कहा, “नगद नोट मेरे पास तो धरे नहीं मैं तो इतना कर सकूँ... दाल-चावल उधार चाहिए तो ले जा...”

​“हाँ ठीक है... इतनी मदद क्या कम है?”

​फिल्मी स्टाइल मारते हुए रामदास कबाड़ी बोला, “मजबूरी बहुत बुरी चीज होती है साहब...! अपने बीमार बच्चे के लिए एक माँ कुछ भी बेच सकती है साहब... इज्जत तो बहुत मामूली चीज है।”

​“बेचारी मजबूर औरत...”

​“बे... चा... री...”

​सहानुभूति के शब्द थे उनके, पर उनमें सहानुभूति नहीं व्यंग्य था। वे जैसे चटखारे ले रहे थे।

​थोड़ी देर पहले काली अँधेरी वीरान-सी लगनेवाली बस्ती अचानक भूत-भूतनियों के रात्रि मेले में बदल गयी थी। हँसी-मजाक, फिसफिसी चीख-चिल्लाहट गाली-गाना सब-कुछ जारी था।

​इस बात पर लगभग सभी एकमत थे कि कुछ देर पहले हुई घटना किसी घोर अनर्थ से कम नहीं थी। सारा दोष विशंभरी का था।

​रामदास कबाड़ी और लोहार विशंभरी की झुग्गी के पास खड़े होकर उसे सुना-सुनाकर कहने लगे, “बेचारी, मजबूर औरत... क्या करती?”

​“दूसरों की मजबूरी तो कोई समझता नहीं... बस लोगों को तो बातें बनाने का मौका चाहिए—हा हा...”

​“यह तो मैं कह रहा हूँ किसी की मजबूरी कोई समझता नहीं!” कहते-कहते रामदास की हँसी छूट गयी थी।

​बिन्नू के मुँह पर छींटे मारकर विशंभरी उसे होश में लाने का प्रयास कर रही थी। लोगों की बातों से ज्यादा वह बिन्नू की हालत देख-देखकर थरथरा रही थी।

​इस सबमें सारा दोष विशंभरी का ही है या शराबी का भी थोड़ा बहुत दोष है। वहाँ जमा लोगों में इस बात की बहस भी छिड़ गयी थी। इक्का-दुक्का लोग शराबी को भी थोड़ा बहुत कसूरवार ठहरा रहे थे। लेकिन ज्यादातर लोगों का कहना था कि सारा कसूर विशंभरी का ही है।

​“इसमें शराबी का क्या कसूर? औरत के आगे तो बड़े-बड़े ऋषि-मुनि तपस्वी अपनी तपस्या भूल जायें। ये बेचारा तो मामूली आदमी है।”

​“सारा कसूर उसीका है जो अन्दर छुपी बैठी है... उसी साली ने यहाँ की मर्यादा भंग की है।”

​“हाँ, औरत को मचा चखाया जायेगा तभी मजा आयेगा वर्ना किसी को भी मजा नहीं आयेगा... हाँ... हाँ...।”

​एकाएक सभी विशंभरी की झुग्गी के आगे आ जमे थे। मरियल बुढ़िया के साथ तीखा और तेज बोलनेवाली दो-तीन औरतें तो उसकी झुग्गी के अन्दर ही जा घुसीं। बाकी लोग अन्दर-बाहर गिद्धों की तरह जमा हो गये थे। विशंभरी उन्हें अन्दर आया देखकर चुन्नी से अपना सिर-मुँह ढँकने लगी थी।

​बुढ़िया बड़बड़ाने लगी, “अरी! बड़ी शर्म-धर्मवाली बन रही है। तूने तो यहीं बुला लिया! बस्ती-बिरादरी का कुछ भी डर न था तुझे? हैं?”

​“अपनी ना सही दूसरों की इज्जत का ख्याल तो करना ई चइये था, औरत को अपनी इज्जत आप बचानी चाहिए।”

​मर्दों की तो बस एक ही जात होती है। अपनी मर्दानगी जाहिर करने के लिए पीछे खड़े कुछ जीर्ण-जर्जर आदमी उसे सीधे ही माँ-बहन की गालियों पर उतर आये थे।

​“था कौन वो? पहले से जानती थी तू उसे?”

​अपनी सफाई में कई बार रोते-रोते उसने कहा कि उसने उस शराबी को नहीं बुलाया था। दरवाजा खुला देखकर गलती से उसके घर आ घुसा था। लेकिन कोई उसकी बात मानने को तैयार नहीं था।

​सब सुन रहा था बिन्नू। दोनों छोटी बच्चियाँ डरी-सहमी कोने में दुबकी जा रही थीं। बिन्नू का मन हो रहा था वह सबको वहाँ से मार भगाये। वह चीखना चाहता था। पर आवाज ही बाहर नहीं आ पा रही थी।

​“कितने पैसों में बात तय हुई थी? दे कितने रहा था?”

​“पहले ही बात बिगड़ गयी या सब-कुछ हो-हवा चुका था? कुछ मिला भी या योंही...”

​जहरभरे शब्दों से वह बुरी तरह आहत हो आयी थी। तड़फड़ाकर रह जाने के सिवाय वह कुछ नहीं कर पा रही थी। पीछे से प्रहार अभी जारी थे—अरे हमें बुला लेती... हम फैसला करवा देते। पड़ोसी होते किसलिए हैं?

   ​बर्दाश्त नहीं हो पा रहा था उससे। गुस्से से काँपने लगी थी वह।

"मैं कैसे साबित करूँ? ना मैंने उसे बुलाया, ना मैं उसे जानती हूँ... मुझे और परेशान मत करो।"

"बड़ी सती-सावित्री है तू? ऐसे कैसे जाने दें? हम लोग गरीब जरूर हैं पर... तुझे नहीं हमें तो अपनी इज्जत प्यारी है।"

रोते-काँपते वह गिड़गिड़ाई, "पहले ही दु:खों की मारी हुई हूँ... मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो...।"

"ऐसे कैसे छोड़ दें? और तू यहाँ धन्धा करे? शरीफों की बस्ती है, रंडीखाना नहीं बनने देंगे इसे...साली रंडी... वेश्या...।"

चीख पड़ी वह, "हरामी... कमीने, कीड़े पड़ेंगे तेरे... मुझ बेसहारा निर्दोष पर इल्जाम लगाता है! कल को तेरी बहन-बेटी भी मेरी तरह बिना कसूर के फँस सकती है... तब देखूँगी तुझे!"

लोहार चीखा, "खबरदार... साली हमारी बहन-बेटी का नाम मत लियो।"

"अब तो बड़ी मिर्चें लग रही हैं...?"

"तू सबको अपने जैसा समझती है?"

"मैंने किया ही क्या है? जो मेरे पीछे पड़ गये हो?"

"अभी तो लखमी लाला खड़ा है हमारे बीच में—जीता-जागता सबूत है! बोल, तूने उससे पाँच सौ रुपये माँगे थे या नहीं?"

बिना किसी झिझक के विशंभरी ने कहा, "हाँ माँगे थे..."

"बदले में तूने क्या कहा था लाला को? कि तू कुछ भी करने को तैयार है?"

"कहाँ है लाला? मेरे सामने कहे... कीड़े पड़ेंगे तुम सब झूठों को...।"

लाला ने पीछे खड़े-खड़े ही कहा, "आयी नहीं थी तू पैसे उधार माँगने?"

"आयी थी तो मैंने कहा था... मेरी झुग्गी का दरवाजा टूटा हुआ है ठीक करवाना है। बच्चा बीमार है पैसों की सख्त जरूरत है अगले महीने लौटा दूँगी जो थोड़ा-बहुत हरजाना हो वो भी ले लेना... बाकी बातें अपने पास से बना लीं? ...उल्टा ये तो मुझे पैसे देने को तैयार था। गन्दी नजरों से देख रहा था ये मुझे। इसकी नीयत गन्दी देखकर मैं तो पैसे लिए बिना ही लौट आयी...ये हरामी कमीना उल्टा मुझे बदनाम...।"

लाला की ओर देखकर हँसने लगे सभी। लाला को जवाब नहीं सूझ पड़ रहा था।

ऐसी उम्मीद नहीं थी लाला को, एकदम चुप रहनेवाली औरत सबके सामने यों एकाएक फूट पड़ेगी। अकबकाकर रह गया वह, “मैं तो... वो मैंने तो...।”

​क्षणभर में लाला की भीड़ में भद्द उड़ गयी। बगलें झाँकता रह गया। हँसी-मजाक, ताने-फिकरे और... लाला को शर्मिंदा देखकर बस्तीवालों को मजा आ रहा था। एकाएक सबके मजे पर पानी फेरती हुई-सी किसी की आवाज आयी—सब इधर मजा ले रहे थे और... उधर वो शराबी भाग गया...

​“धत्त तेरे की... बेड़ा गरक हो गया। उस साले को भी कुछ सबक सिखाया जाना चाहिए था। वर्ना वो तो किसी दिन फिर से इसे बदनाम बस्ती... वो क्या कहते हैं रेड लाइट एरिया समझकर चला आयेगा। पकड़ा गया तो कह देगा गलती हो गयी। पर अब क्या हो सकता है? उसे यों ही नहीं जाने देना चाहिए था। एक वही तो विशंभरी के खिलाफ हमारे पास सबूत था...।”

​“अब बातें बना रहे हो पहले क्यों नहीं ध्यान दिया? तुम पकड़ के रखते उसे?”

​आपस में ही उलझ गये थे वे लोग। ज्यादातर लोगों को उसके भाग जाने का मलाल हो रहा था। हाथ मलते हुए एक ही बात दोहरा रहे थे—अब क्या बचा है? सारा मजा ही किरकिरा हो गया...

​मजा ही खराब हो गया। मजा ही खराब... कहते हुए कुछ लोग अपनी-अपनी झुग्गी की ओर लौटने लगे। तंग कर रहे लोगों पर भड़ककर पड़ गयी विशंभरी, “जो भी मुझ पर झूठा इल्जाम लगाएगा मैं पुलिस में उसीके नाम की रपट लिखवा दूँगी।”

​जवाब में लोग बेशर्मी से खी-खी कर रहे थे। पीछे से किसी ने शरारत से सीटी बजाई, किसी ने अजीब-सी डरी आवाज में कहा—प... पुलिस... पुलिस आ गयी...

​पुलिस का नाम सुनते ही सब एक-दूसरे को भागता देखकर अपनी-अपनी मर्दानगी भूलकर अपने-अपने बिलों की ओर लपके। कुछ ही मिनटों में गली फिर से निर्जन हो गयी थी।

​विशंभरी ने भी अपनी झुग्गी का टूटा-फूटा दरवाजा अन्दर से भिड़का दिया था।

​दोनों छोटी बच्चियाँ सिकुड़कर एकतरफ को सो गयी थीं। बिन्नू के बुखार से तपते माथे पर विशंभरी ने गीला कपड़ा रखा और खुद भी पास ही लेट गयी। झुग्गी के अन्दर-बाहर काला घनाघुप अँधेरा भरा हुआ था। उसे अपनी हालत पर रह-रहकर रोना आ रहा था। जाने कितनी बार उसे अपनी गीली आँखों को पोंछना पड़ा था—कोई बात नहीं। जैसे-कैसे वक्त कट ही जायेगा।और चार-पाँच साल की बात है बस... बिन्नू बड़ा हो जायेगा। फिर उसे किसी बात की चिन्ता नहीं रहेगी।

​बिन्नू ने बीमार-सी आवाज में कहा, "माँ...!"

​उठ बैठी वह, "हाँ बेटे...!"

​"माँ... तूने उस कुत्ते-कमीने शराबी को बुलाया ही क्यों? मुझे बुखार था तो क्या हुआ... उतर जाता... नहीं तो मर जाने देती मुझे। क्यों बुलाया?"

​जलती हुई लकड़ियों में धकेल दिया जैसे किसी ने उसे। क्षणभर में सब-कुछ जलकर जैसे राख हो गया! क्या जवाब दे वह? एकाएक वह झुँझलाई, "तू भी तो यहीं था? क्या हुआ, क्या नहीं? सब यहीं तुम लोगों के सामने ही तो हुआ?"

​गहरी खामोशी घिर आयी। झींगुरों की आवाजें माहौल को और भयावह-सा बना रही थीं। थोड़ी देर बाद बिन्नू बोला, "माँ! मैं मर भी जाऊँ पर तू आगे से ऐसा मत करना।"

​"क्या? कैसा? मैंने अब भी क्या किया है जो आगे ना करने को कह रहा है? बिना किसी गलती के बैठे-बिठाये मुझे ये क्या...?"

​कलपने और अन्दर-ही-अन्दर रोने के सिवाय कोई चारा नहीं उसके पास।

​झुग्गियों में ही रहनेवाले एक झोलाछाप डॉक्टर ने सुबह-शाम टीके लगाकर कुछ ही दिनों में बिन्नू का न्यूमोनिया ठीक कर दिया था। इलाज के पैसे भी वह एक-दो महीने बाद लेने को राजी था।

​धीरे-धीरे सब ठीक हो जायेगा सोचा था उसने। अब दिन-रात उसे झुग्गी का दरवाजा ठीक करवाने की चिन्ता लगी हुई थी। लेकिन पैसों का जुगाड़ कहीं से भी नहीं बैठ पा रहा था। वैसे भी उस घटना के बाद आसपास के लोगों का व्यवहार कुछ बदल-सा गया था। लोगों की नजरों में उसके प्रति हिकारत और उपहास देखकर उसके दिलोदिमाग पर जहरीले साँप फुफकारने लगते, लेकिन वह बर्दाश्त करके रह जाती।

​बीमारी के कारण कई दिन से बिन्नू साइकिलवाले के पास काम सीखने नहीं जा पाया था। उसके दोस्त उसे चिढ़ाते—अब इसे काम की क्या जरूरत है? इसकी माँ ने जो नया काम शुरू कर लिया है।

​बेनागा ही कोई-न-कोई उसे चिढ़ा देता। रोज ही वह किसी-न-किसी के साथ मार-पिटाई कर बैठता। एक दिन तो बुरी तरह जख्मी होकर लौटा था वह। माँ ने उसे समझाने की कोशिश की तो वह उल्टा उसी पर झुँझला उठा था, "तेरी वजह से मुझे सब देखना सहना पड़ रहा है...?"

    क्या वाकई इस सबमें उसका कहीं कुछ कसूर है? उसे सोचने को विवश होना पड़ रहा था। दुःख उसे इस बात का था कि अपनी ही औलाद उसे निर्दोष नहीं मान पा रही थी। सारा कसूर झुग्गी के दरवाजे का है। उसने सोचा, जैसे भी हो उसे अब झुग्गी का दरवाजा ठीक करवाना है।

​अगले ही दिन सुबह-सुबह पैसों के इन्तजाम के लिए घर से निकली थी वह। लौटने में भी उसे देर हो गयी थी। उसे लौटा देखकर बिन्नू उस पर चिल्लाकर पड़ गया, “इतनी देर कहाँ लग गयी तुझे?”

​बेटी ने रोते कहा, “भाई! आज फिर मार-पिटाई करके लौटा है। आज फिर लड़कों ने चिढ़ाया। चोटें भी लगी हैं इसके...।”

​“क्यों रे! घर में टिककर नहीं बैठ सकता? क्या जरूरत है उनसे लड़ने-मरने की?”

​“लड़के कह रहे थे झुग्गीवाले डॉक्टर को तेरी माँ ने तेरे इलाज के लिए पैसों के बदले इज्जत दी है?”

​“हाय राम... नास जाये उन कमीनों का... पैदा हुए नहीं और कहने लगे ऐसी-ऐसी बातें? इलाज के पैसे छोड़ेगा वो डॉक्टर? उधार के चक्कर में महीने बाद ही सही दुगुनी चमड़ी उतारेगा। दुनिया में उधार-सुधार नहीं चलता क्या? कोई जरूरी नहीं ऐसों के मुँह लगने की... दुनिया तो बकती रहती है। किस-किसका मुँह पकड़ेगा तू? क्या-क्या बर्दाश्त करना पड़ रहा है मुझे, मैं ही जानती हूँ...?” आँखें पोंछते हुए बोली, “कल झुग्गी का दरवाजा ठीक करवाना है। पैसों का इन्तजाम हो गया है। कितना मुश्किल है पैसों का इन्तजाम करना, मैं ही जानती हूँ...।”

​सुनते ही बिन्नू की आँखें खुली-की-खुली रह गयीं। उसने सोचा—माँ ने किसी को यहाँ तो नहीं बुलाया पर खुद कहीं जाके... इसका मतलब लोग ठीक कहते हैं। आँखों में खून उतर आया उसके। एकदम चुप हो आया वह। माँ के आग्रह के बावजूद उसने रोटी भी नहीं खाई। बच्चियों को रोटी खिलाकर विशंभरी लेट गयी थी।

​झुग्गी में अँधेरा भरा हुआ था। आसपास से आता हुआ टीवी, रेडियो और लोगों का शोरगुल नींद को उनकी आँखों के पास फटकने नहीं दे रहा था।

​एकाएक विशंभरी को लगा झुग्गी में कोई है। इससे पहले कि वह कुछ समझ पाती, चाकू का एक वार उसकी कोहनी पर लगा। उसने देखा बिन्नू के हाथ में सब्जी काटनेवाला चाकू था और वह अपनी माँ पर वार कर रहा था। अपने बचाव के लिए चीखी वह। डर के मारे सन्न रह गयी वह। बिन्नू चीखा, "पैसों के इन्तजाम के लिए अब तू बाहर जाने लगी है? इतनी देर से आयी आज तू पैसों का इन्तजाम करके?"

​"मैं तो जहाँ काम करती हूँ वहीं से पैसे लेने गयी थी। मालिक सुबह ही कहीं निकल गये थे। मालकिन बोली, शाम को आयेंगे तो उनसे लेकर दे दूँगी। मैंने इन्तजार किया। शाम को वे आये तो उन्हीं से पैसे लेकर आयी हूँ इसलिए देर हो गयी।"

​"झूठ बोलती है तू!"

​"कमीने... मैं तेरी माँ हूँ! मैंने कुछ किया भी नहीं। तू बीमार था। तेरे चक्कर में मैं बदनाम हो गयी और उल्टा तू? अपनी उसी माँ को मारना चाहता है?"

​नीचे बैठकर रोने लगी वह। बिन्नू पर जैसे खून सवार था, "मैंने कहा था मुझे मरने दियो, पर ऐसा काम मत करियो... पर... तू...।"

​इसी बीच ढीली पड़ आयी विशंभरी पर चाकू के दो और वार कर दिये थे बिन्नू ने। नीचे गिर पड़ी थी विशंभरी। बच्चियों की कुरलाहट झुग्गी में भर गयी थी।

​"मैं मर जाऊँगी। अपने-आप ही। मर जाऊँगी रे... तू मत मार रे... तेरे हाथों मरी तो तुझे सजा हो जायेगी रे!"

​चाकू फेंककर झुग्गी से बाहर होता हुआ बोला, "जा रहा हूँ मैं... कभी नहीं आऊँगा अब। कभी नहीं आऊँगा... कभी नहीं आऊँगा।"

​इससे पहले कि पड़ोसी आते और बात को समझते, बिन्नू वहाँ से भाग चुका था। जो सुनता दहलकर रह जाता। बारह साल का बच्चा माँ की हत्या करने चला था।

​गनीमत थी कि पड़ोसियों ने विशंभरी को समय पर हस्पताल पहुँचा दिया था। देर हो जाती, खून ज्यादा बह जाता तो खतरा हो सकता था। चाकू के जख्म उसके कन्धे, कोहनी और जाँघ पर ही बने थे। पुलिसवालों को यह बयान दिया कि एक फैक्ट्री के सामने लोहे की पत्तियों के ढेर पर चक्कर आकर गिरने से चोटें लग गयी थीं। इस तरह उसने बेटे को पुलिस-कचहरी के पचड़े से बचा लिया था। शुक्र है नेक डॉक्टर ने पुलिस केस नहीं बनने दिया था। चार दिन बाद वह हस्पताल से लौट आयी थी। बहुत रोई थी घर आकर वह—निर्दोष बेकसूर हूँ मैं। ये तो सिर्फ मैं जानती हूँ या मेरा भगवान। अनाड़ी था बिन्नू... पेट या पसलियों में चाकू मारता तो...! एक ही बेटा था मेरा, गलतफहमी के चलते वो भी छिन गया...????

​झुग्गी का दरवाजा ठीक करवाने के लिए किया गया पैसों का जुगाड़ विशंभरी के जख्मों के इलाज में खर्च हो गया था। दरवाजा फिर भी ठीक नहीं हो पाया था।

​कई दिन तक ढूँढ़ते रहे बिन्नू को। दूर नजदीक रिश्तेदारों, जान-पहचानवालों के यहाँ। बहुत ढूँढ़ा पर बिन्नू का पता नहीं चला, तो नहीं ही चला। आखिर थक-हारकर बैठना पड़ा था उसे।

​टूटे हुए दरवाजे और बिन्नू को याद करके रो रही थी वह एक रात। पास लेटी छोटी बेटी ने उसकी आँखें पोंछते हुए कहा, “माँ! तू उस दिन पैसों के इन्तजाम के लिए गयी ही क्यों? जो हुआ, हो गया पर अब कभी भी ‘पैसों के इन्तजाम’ के लिए मत जाना।”

​जलते हुए अंगारों जैसे बेटी के शब्द, उसके समूचे वजूद को जलाने झुलसाने लगे थे। उसे लगने लगा था सचमुच ही वो शराबी उसकी इज्जत ही उतारकर ले गया है।

​झुग्गी के दरवाजे के पास आकर गली का कुत्ता गुर्राने लगा। झट-से उठ बैठी वह इससे पहले कि कुत्ता झुग्गी में आ घुसे, उसने पास खड़ा डण्डा उठाया और कुत्ते को दे मारा। कुत्ते को बहुत दूर खदेड़ आने के बाद इतमीनान से बैठती हुई बोली, “किसी तरह बची-खुची इज्जत तो बचानी ही है न?”

​अपनी नन्ही-सी आँखें चौड़ी करते हुए बेटी ने पूछा, “माँ! औरतों की इज्जत होती है? कोई क्या करता है?”