Infection in Hindi Motivational Stories by कमल चोपड़ा books and stories PDF | संक्रमण

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संक्रमण

संक्रमण
कमल चोपड़ा

    ​आज कालू वहीं काम पर बैठा था, जिसे ना करने के लिए उसकी माँ ने मरते वक्त उसे सख्त ताकीद की थी। माँ ने मरते वक्त कहा था, "हे श्वान-पुत्र, इन अन्तिम क्षणों में तुम्हें अपनी आँखों के सामने देखकर मैं खुशी-खुशी मर सकूँगी। पिछली बार मेरे चार बच्चे हुए थे। उनमें से कौन कहाँ गया? मुझे किसी का कुछ पता नहीं। इस बार छ: बच्चे हुए थे। उनमें केवल एक तुम ही जीवित बचे हो... मैंने तुम्हें अपने पंजों और पूँछ के इस्तेमाल की सभी कलाएँ समझा दी हैं... जबड़ों के व्यायाम और प्रयोग के विषय में सविस्तार समझा दिया है... प्रभु-कृपा से अब तुम जवान हो और तुम्हारे जबड़े भी मजबूत हैं... तुम जो मर्जी खा सकते हो... बन्दर, भैंस, बकरा, बिल्ली—ताजा या मरा हुआ, जैसा शिकार मिल सके... दिल करे, तो सड़ी-गली लाशें भी खा सकते हो, क्योंकि तुम हड्डीखोर वंश के हो। तुम्हारे लिए कुछ भी अभक्ष्य नहीं है... यहाँ तक कि मरा हुआ आदमी भी... लेकिन आदमी की खोपड़ी के अन्दर का गूदा मत खाना... बाकी चाहे कुछ भी खाना, पर मरे हुए मानव का मस्तिष्क मत खाना, मत खाना!" यह कहते हुए उसकी माँ ने प्राण त्याग दिये थे।

​तब वह जवान था। उसके खून में जोश, पंजों में ताकत और जबड़े में मजबूती थी। उसने अपने शरीर को कई बार झटकाया, मानो वह अपनी माँ की नसीहतों के गीले लिजलिजेपन को झाड़ रहा था, "हुँह! ये बूढ़ी खुद तो पुरानी कद्रों-कीमतों को ढोते-ढोते मर गयी... मुझ पर भी दकियानूस ख्यालात लादना चाहती थी—हुँह! मुझे मौका मिला, तो मैं मानव-मस्तिष्क अवश्य खाऊँगा... अवश्य खाऊँगा!" आसमान की तरफ मुँह करके वह काफी देर तक भौंकता रहा, ताकि अपनी ये ख्वाहिश कभी भूले नहीं।

​एक दिन जब उसने सुना कि आदमी का खून ही मुँह से लग जाने पर कुत्ता एकदम पागल, खतरनाक और खूँखार हो जाता है, तो वह एकदम बेचैन, बेताब और बेबस हो उठा, "पूरा आदमी खाने पर तो जाने मैं क्या बन जाऊँगा, बड़ा मजा आयेगा। अब तो मैं मानव-मस्तिष्क अवश्य खाऊँगा।"

​     कई दिनों तक किसी मरे हुए आदमी की लाश की तलाश में वह इधर-उधर मारा-मारा फिरता रहा, पर उसे कहीं भी ऐसी कोई लाश नहीं मिल पाई, क्योंकि कुछ लाशें दफना दी जाती थीं, कुछ जला दी जाती थीं, कुछ बहा भी दी जाती थीं और कुछ को बिजली से फूँक दिया जाता था। उसे गुस्सा भी आया—"हूँह! ये भी कोई मौत हुई? कोई मरे, तो 'कुत्ते की मौत' मरे, ताकि बाद में लाश सड़कों पर घसीटी जाये और कूड़े के ढेर में फेंक दी जाये, ताकि जो चाहे, अपनी भूख मिटाए—आदमी की तरह नहीं कि मरने के बाद भी किसी काम न आये...हूँह...लेकिन कभी-न-कभी, कहीं-न-कहीं मानव-मस्तिष्क खाने को मिलेगा ही।"

​श्मशान और कब्रिस्तान के चक्कर काटना फिजूल है—यह सोचकर वह आमतौर पर नदी किनारे चक्कर काटता रहता। एक दिन एक लाश को किनारे पर वह घसीट भी लाया, पर वहाँ से गुजरते एक आदमी की नजर उस पर पड़ गयी। वह लाठी को लेकर उसके पीछे यों भागा कि उसे अपनी जान बचानी मुश्किल हो गयी। काफी दूर निकल जाने के बाद वह इतनी देर तक भौंकता रहा कि उसके जबड़े ही दुखने लगे। मन मसोसकर रह जाने के सिवाय उसके पास कोई चारा नहीं था।

​भक्ष्य-अभक्ष्य खाकर वह किसी तरह अपना जीवनयापन करने लगा था। उसे लगने लगा था कि मानव-मस्तिष्कवाली उसकी ख्वाहिश शायद ही पूरी हो पाए। वह एकदम निराश और नाउम्मीद हो गया। अपनी बेबसी और लाचारी पर उसे रोना आ गया। वह जितना अधिक बुरी तरह रो सकता था, रोने लगा—बऊ...अऊ...चऊ...बऊ...अऊ...अऊ...

​सारी रात वह इधर-उधर सुनसान गलियों में रोता फिरा। अपने रोने में उसने बहुत सूक्ष्म, तीक्ष्ण और गहन सुरों का प्रयोग करने का प्रयास किया। रोते-रोते उसने अपने करुण विलाप का अर्थ लगाने का भी प्रयास किया—साधो, ये मुर्दों का गाँव, आये न एक भी मुर्दा किसी के काम...अपने विलाप से सन्तुष्ट होकर वह और अधिक मनोयोग से रोने लगा। उसका रोना माहौल को और भी भयावह बना दे रहा था!

​सारी रात रो-रोकर सुबह होते ही थककर वह रघु नाई के लकड़ी के खोखे के नीचे छिपकर सो गया। थोड़ी देर बाद शोर-शराबा सुनकर उसकी आँखें खुलीं, तो जो दृश्य उसके सामने था, उसे देखते ही उसकी रूह काँप गयी। आसपास के कुछ खोखों और कुछ दुकानों में आग लगी हुई थी। लोग गुस्से से फनफनाते हुए वाही-तबाही बक रहे थे। मार-काट और लूट-मार मचा रहे थे। उनका दंगा देखकर दंग रह गया वह—मानव अपने जिन गुणों के कारण 'श्रेष्ठ प्राणी' कहलाता है, ये स्वयं ही अपने उन गुणों की ऐसी-की-तैसी कर रहे हैं...और हम जिन अवगुणों के कारण बदनाम हैं, उनमें भी ये हमसे काफी आगे हैं।

​डर के मारे उसकी पूँछ पिछली टाँगों के साथ चिपकती जा रही थी। शाम तक कर्फ्यू लगा दिया गया था और देखते ही गोली मार देने के आदेश दे दिये गये थे। बड़े चौराहों और मुख्य-मुख्य मार्गों पर पुलिस तैनात कर दी गयी थी।

​गलियाँ एकदम सुनसान थीं। उसे लगा—आज तो उसी का राज है...ये सब लोग तो लड़-लड़कर मर जायेंगे। एक दिन ऐसा आयेगा, जब पूरी दुनिया पर कुत्तों का ही राज होगा...अपने ही विचार को परे झटककर जीभ बाहर लटकाकर थोड़ी देर हाँपने के बाद वह यों ही मुँह उठाकर इधर-उधर गलियों का मुआयना-सा करने लगा। वह बेहद खुश था, क्योंकि आज उसे कोई रोकने-टोकनेवाला तो था नहीं।

​गलियों में घूमते-भटकते हुए उसे एक आदमी की लाश दिखाई दी। खुशी से उछल पड़ा वह। डरते-डरते वह लाश के निकट गया—कहीं ऐसा न हो कि अभी यह जीवित ही हो। कुऊँ-कुऊँ करते हुए लाश को सँघने के बाद तो खुशी से उसकी अन्तड़ियों में घुर्रट-घुर्रट की आवाजें आने लगीं। पूँछ अपने-आप ही हिलने लगी। उसने इधर-उधर देखा, फिर वह लाश पर एकाएक टूट पड़ा। संयोगवश उस लाश की खोपड़ी फूटी हुई थी, शायद किसी दंगाई ने उसे लोहे की छड़ से मारा था। खोपड़ी के अन्दर का गूदा निकालने में उसे कोई असुविधा नहीं हुई। मानव-मस्तिष्क का अंश मुँह में आते ही वह खुशी से झूम उठा। गुलगुला रसभरा हड्डीरहित पदार्थ खाने का उसका ये अजीब-सा अनुभव था—अहो भाग्य...दंगों के कारण ही यह सम्भव हो पाया...वरना अपनी ख्वाहिश पूरी हुए बिना ही मर जाता...

​मानव-मस्तिष्क खाने के कुछ ही देर बाद उसने अपने मस्तिष्क में कुछ संकीर्णता...एक तंगमिजाजी और बोझिलता का-सा अनुभव किया।

​शहर में कर्फ्यू दो-तीन दिन बाद ही उठा लिया गया था। वह अपने-आप में कुछ अन्तर अनुभव करने लगा था, पर उसका आपा अपने बस में नहीं था। दो-तीन दिन मानव-शव खा-खाकर उसे उबकाई-सी आने लगी थी। मुँह का स्वाद बदलने के लिए वह गन्दे नाले के पास खाल उतारने के बाद पड़ीं सड़ रहीं दूसरे जानवरों की लाशों पर हाथ साफ करने चल पड़ा।

   संयोगवश आज खाल उतारनेवाला एक भी आदमी वहाँ मौजूद नहीं था। दो-एक जानवरों के शव वहाँ पड़े थे। जी भरकर उसने भोजन किया और हड्डी का टुकड़ा मुँह में डालकर चूसने लगा। तभी वहाँ कुछ और कुत्ते भी आ गये। उन्हें देखते ही वह गुर्राने लगा। ज्यों ही दूसरे कुत्ते बचे-खुचे भोजन की ओर बढ़े, वह बुरी तरह भौंकने लगा। उसे इस तरह अपने पर भौंकता देखकर एक कुत्ते ने कहा—हे पुण्यात्मा... कहें कि आप-हम इस कदर क्यों बिगड़ रहे हैं? अगर आप भी भूखे हैं, तो आइए... सादर भोजन ग्रहण करें।

​"हे दुष्टो... मैं तो पहले ही अपना पेट भर चुका हूँ..."

​"हैं...? पेट भरा होने के बावजूद आप हमसे लड़ रहे हैं। कहें कि हमारा जीवन-सिद्धांत—'खाओ और खाने दो!' आपने कैसे भुला दिया?"

​उसका सिर शर्म से झुक गया, "अरे, ये मुझे क्या हो गया? पेट भरा होने के बावजूद मैं उन्हें लड़ाई के लिए ललकार रहा था, पहले तो कभी ऐसा नहीं हुआ था... ये मुझे क्या हो गया है?"

​एक नाली से पानी पीकर वह ज्यों ही आगे बढ़ा, सामने से काले रंग के एक और कुत्ते को आता देखकर उसकी बाँछें खिल गयीं, "कहो महानुभाव, क्या हाल है? तुम्हारा और मेरा रंग एक जैसा है... मुझे तुमसे मिलकर बड़ी खुशी हुई... अपने जैसे रंग के कुत्ते को देखकर मेरी पूँछ अपने-आप हिलने लगती है... देखो, तुम्हारी पूँछ भी हिल रही है। ये खुशी स्वाभाविक है... बल्कि सत्य तो यह है कि काले रंग के कुत्ते ही श्रेष्ठ होते हैं... बाकी सब तो अधम और नीच हैं। हमारे रंग के कुत्तों ने सदियों से दूसरों पर राज किया है... सदियों से दुश्मनों के जुल्म सहे हैं, पर अब... हमारा रंग श्रेष्ठ है... हम श्रेष्ठ हैं! बाकियों को हमें काट भगाना है। काटो, काटो..."

​उसकी बातें सुनकर दूसरा कुत्ता थर-थर काँपते हुए बोला, "हे पुण्यात्मा, आपका मस्तिष्क ठिकाने है? कहें कि आप इस प्रकार की भयंकर बातें क्यों कर रहे हैं?"

​एकाएक उसे कोई जवाब नहीं सूझा, दूसरा कुत्ता उस पर दो-चार बार भौंका, फिर मुँह मोड़कर चला गया, वह ठगा-सा खड़ा रहा। फिर अपनी पिछली बाईं टाँग से अपना कान खुजलाने लगा। थोड़ी देर बाद अपना सिर आसमान की तरफ उठाकर मुँह पूरा खोलकर पूँछ हिलाने लगा, मानो किसी आसमानी ईश्वरीय ताकत के सामने अपनी आस्था प्रकट कर रहा हो! एकाएक उसे लगा, उसकी आस्था सम्बन्धी आदतें ही श्रेष्ठ हैं। खुश होकर वह भौंकने लगा—भऊ भौं-भौं... भड़क के भौंको भौं-भौं... अरे, मेरी तो भौंकने की भाषा का प्रचार करना चाहिए... कहीं ऐसा न हो कि भाषा लुप्त होती चली जाये, बल्कि सबको ऐसी ही श्रेष्ठ आदतें अपनानी चाहिए... ये भाषा सबके भौंकने के लिए अनिवार्य कर दी जानी चाहिए... भड़क के भौंको भौं... भौं...

​जहाँ भी उसे अपने भाई लोग मिलते, वह अपनी आदतें और अपनी भाषा का प्रचार करने लगता। उसके भाई लोग उसे टोकते, “भाई, जान लीजिए कि स्वतन्त्रता हमारा, बल्कि सबका जन्मसिद्ध अधिकार है... उछलने की, दौड़ने की, गुर्राने की, भौंकने की स्वतन्त्रता... कोई जैसे मर्जी खाए या हगे, हमें क्या...? हमारे रंग... हमारी कौम, हमारी भाषा खतरे में है... भाई... कहीं कोई खतरा नहीं है... केवल पेट की चिन्ता करो... केवल बोटी और पेट की चिन्ता..."

​उसे खुद नहीं समझ आ रहा था कि उसे क्या हो गया है? वह क्यों इन फिजूल बातों को इतना तूल देकर खुद के लिए इतनी परेशानियाँ खड़ी कर रहा है।

​अगले दिन दोपहर बाद वह सोकर उठा, तो उसे लगा कि जिस गली में वह सोया हुआ था, वह उसके बाप की है, गली में उसका ही राज है, गली सिर्फ उसकी है। इधर-उधर आवारागर्दी करते हुए कुछ कुत्ते उस गली में घुसने लगे, तो वह उनके सामने अड़कर खड़ा हो गया, “मैं, घोषणा करता हूँ कि यह गली सिर्फ मेरी है। अपनी गली में हर कुत्ता शेर होता है। तुमने इधर घुसने का दुस्साहस किया, तो मैं तुम लोगों को फाड़ खाऊँगा—भौं-भौं...”

​“भौं-भौं-भौं... गली हम सबकी है; देश सबका साझा है।”

​बाकी कुत्ते उस पर टूट पड़े। थोड़ी देर बाद वहाँ से गुजरनेवाले एक बूढ़े कुत्ते ने उनकी लड़ाई छुड़वाई, “लड़ाई-लड़ाई माफ करो—भाइयों की छी-छी साफ करो।”

​तब तक वह बुरी तरह घायल हो चुका था। एकदम लहूलुहान। पूरी तरह बातें सुनने के बाद बूढ़ा बोला, “हे श्वान-पुत्र! कुत्तों को एक बीमारी होती है—जलातंक, जिसमें कुत्ता हवा, खासकर पानी के प्रति असहिष्णु और आतंकित हो जाता है और फिर जल्दी ही मर जाता है। इसी तरह मानवों में भी कई प्रकार के फोबिया (भय) हो जाते हैं। जैसे दूसरों के रंग, धर्म, भाषा... वगैरह से वे इतने असहिष्णु और आतंकित हो जाते हैं कि वे लड़-लड़कर ही मर जाते हैं... इस प्रकार तो तुम भी लड़-लड़कर मर जाओगे। तो हे श्वान-पुत्र! बताओ कि तुम इस प्रकार के फोबियों के शिकार क्यों और कैसे हुए? क्या तुम्हें किसी आदमी ने काट खाया था?”

    असहनीय दर्द के कारण उससे बोला भी नहीं जा रहा था। बड़ी कठिनाई से उसने स्वीकार किया कि उसने मानव-मस्तिष्क खाया था। बूढ़े ने दुःख व्यक्त करते हुए कहा कि ये तुमने क्या किया? यदि अब भी तुम्हें अपने किये पर अफसोस हो, तो शायद तुम बच सकोगे, वरना...।