पिछाश का जुनून
(The Madness of the Eighties)
साल था 1987। छोटा सा शहर, जहाँ सड़कों पर अभी भी साइकिलों का राज था और मोहल्ले की एकमात्र टीवी के सामने हर शाम भीड़ लगती थी। उस भीड़ में सबसे आगे बैठने वाला लड़का था—बंटी। बंटी को फिल्मों का ऐसा जुनून था कि लोग कहते, "इस लड़के के सिर में तो पिछाश (पिक्चर) ही सवार है।"
बंटी का असली नाम सुरेंदर था, लेकिन किसी को उस नाम से नहीं जानता था। पूरा मोहल्ला उसे बंटी बुलाता। उसके पिता सरकारी स्कूल में मास्टर जी थे, सख्त मिजाज के इंसान। हर दिन वह बंटी को डांटते, "फिल्मों का भूत सिर पर सवार है। पढ़ाई पर ध्यान दे। ये जुनून तेरा कुछ नहीं रखेगा।"
लेकिन बंटी को कौन सुनता। उसके लिए फिल्में सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं, वह उनमें जीता था। अमिताभ की बारीकियाँ उसने इतनी गहराई से सीख ली थीं कि मोहल्ले के किसी भी कार्यक्रम में लोग उससे डायलॉग बोलवाते। "रिस्क लेना भी क्या चीज़ है, बाप रे बाप!"—वह अमिताभ के अंदाज में बोलता तो लोग तालियाँ पीटते।
उसकी माँ उसका यह हुनर देखकर अक्सर कहतीं, "बेटा, तू एक दिन बड़ा हीरो बनेगा।" और बंटी उस बात को अपने दिल में बिठा लेता, सपने बुनता—बड़े पर्दे की चमक, शहर की रोशनी, लोगों की तालियाँ।
शहर में हर महीने किसी न किसी फिल्म की शूटिंग का झूठा अफवाह उड़ती। बंटी हर अफवाह पर सच की तरह दौड़ पड़ता। एक बार सुना कि रेखा जी आ रही हैं, तो वह तीन दिन तक स्टेशन पर डटा रहा। न रेखा आई, न कोई फिल्म वाला। पिता ने पिटाई की, लेकिन बंटी के जुनून में कमी न आई।
"बस एक मौका चाहिए," वह अपने दोस्त संजू से कहता, "बस एक बार मैं मुंबई पहुँच जाऊँ, फिर देखना मैं कैसे सबको अपना दीवाना बना लेता हूँ।"
संजू उसका एकमात्र सहारा था। उसके पिता की किराने की दुकान थी, और वह अक्सर बंटी को घर से निकाला हुआ खाना खिलाता। दोनों की दोस्ती अनोखी थी—एक फिल्मों का दीवाना, दूसरा उस दीवाने का सहारा।
एक दिन मोहल्ले में हलचल मच गई। सुना कि शहर के एक बड़े होटल में फिल्म के लिए ऑडिशन हो रहा है। निर्देशक खुद आ रहे हैं, नई प्रतिभा की तलाश में। बंटी को यह खबर लगते ही मानो बिजली लग गई। उसने अपनी अलमारी खोली, उसमें से अपना सबसे अच्छा कुर्ता निकाला—जो शादी में पहनने वाला था—और सीधा होटल की तरफ दौड़ पड़ा।
होटल के बाहर भीड़ थी। दर्जनों लड़के लाइन में खड़े थे—कोई गिटार लिए, कोई डायलॉग बोलने का अभ्यास कर रहा था, कोई अपने बालों में तेल लगा रहा था। बंटी ने भी लाइन लगाई। उसका दिल धक-धक कर रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर आत्मविश्वास था।
तीन घंटे लगे उसकी बारी आने में। जब वह अंदर गया, तो कमरे में चार लोग बैठे थे—एक बुजुर्ग निर्देशक, दो सहायक, और एक महिला जो शायद प्रोड्यूसर थी।
"नाम?" निर्देशक ने पूछा।
"सुरेंदर... लेकिन सब मुझे बंटी कहते हैं," उसने कहा।
"तो बंटी, क्या कर सकता है तू?"
बंटी ने गहरी सांस ली। फिर उसने अमिताभ का वह डायलॉग बोला जो उसने हजारों बार अभ्यास किया था—"मैं आज भी फेंका हुआ पैसा नहीं उठाता!"
उसकी आवाज़ कमरे में गूँजी। उसके हाव-भाव, उसकी आँखों की चमक—सब कुछ इतना सटीक था कि निर्देशक ने अपनी कुर्सी से थोड़ा आगे झुककर देखा।
"और?" निर्देशक ने कहा।
बंटी ने फिर एक और डायलॉग बोला, इस बार शशि कपूर का अंदाज़ लेकर—"सच्चाई को जितना दबाओगे, उतना ही दबकर वो फूटेगी।"
निर्देशक ने सहायक से कुछ कहा, फिर बंटी से पूछा, "कोई इम्प्रोवाइजेशन? खुद से कुछ करके दिखा सकता है?"
बंटी की आँखों में चमक थी। उसने एक दृश्य बनाया—एक बूढ़े पिता और उसके बागी बेटे का। वह बिना किसी सहारे के, बिना किसी डायलॉग के, सिर्फ अपने शरीर और चेहरे से पूरी कहानी सुना गया। उसने रोना दिखाया, गुस्सा दिखाया, माफी माँगी—सब कुछ इतनी सहजता से कि कमरे में सन्नाटा छा गया।
जब वह रुका, तो निर्देशक ने ताली बजाई। "बहुत खूब, बंटी। हम तुम्हें कॉल करेंगे।"
बंटी के पैर ज़मीन पर नहीं लग रहे थे। वह बाहर निकला और सीधा संजू की दुकान पर पहुँचा।
"संजू, मैं करके आया! उन्होंने कहा—कॉल करेंगे!"
संजू ने उसे गले लगाया। "मुझे यकीन था, यार। तू एक दिन जरूर करेगा।"
लेकिन दिन बीतते गए, हफ्ते बीत गए, कोई कॉल नहीं आई। बंटी का उत्साह धीरे-धीरे घटने लगा। वह हर दिन होटल के चक्कर लगाता, पूछताछ करता। पता चला कि ऑडिशन तो था, लेकिन फिल्म बनी ही नहीं। प्रोड्यूसर ने पैसे निकाल लिए, निर्देशक मुंबई लौट गया। बंटी का सपना हवा में उड़ गया।
मोहल्ले में लोग मजाक उड़ाने लगे। "बंटी बनता था हीरो, हुआ जीरो।" पिता ने फिर से पुराना राग अलापा—"कहा था न फिल्मों का भूत सिर पर सवार है। अब होश में आ जा।"
बंटी कई दिनों तक चुप रहा। उसने अपने कमरे में बैठकर फिल्मों के पोस्टर उतार दिए। उसने सोचा—शायद पिता सही थे। शायद यह जुनून सिर्फ बचकाना था।
लेकिन एक रात, जब पूरा घर सो गया, बंटी चुपके से उठा। उसने अपनी डायरी निकाली—जहाँ वह हर फिल्म के डायलॉग, हर सीन का विश्लेषण लिखता था। उसने पिछले पन्ने पलटे। पाँच साल की मेहनत थी उन पन्नों में। हर दिन का अभ्यास, हर डायलॉग की बारीकी, हर सीन को समझने की कोशिश।
उसने कलम उठाई और लिखा—"हार मान लेना आसान है, लेकिन मैं बंटी हूँ, और बंटी हार नहीं मानता।"
अगले दिन उसने एक नया फैसला किया। उसने पिता से कहा, "पापा, मैं पढ़ाई जारी रखूंगा। लेकिन मेरा जुनून मुझसे छीना मत।"
पिता ने उसकी आँखों में देखा। वही आँखें, लेकिन उनमें अब सिर्फ जुनून नहीं था, संकल्प भी था। उन्होंने कुछ नहीं कहा, बस सिर हिला दिया।
बंटी ने शहर के नाटक समूह में शामिल हो गया। वहाँ उसने सीखा कि फिल्में सिर्फ डायलॉग बोलने का नाम नहीं है। यह संघर्ष है, अनुशासन है, कला को समझने की गहराई है। वह मंच पर छोटे-छोटे रोल करता, कभी बूढ़ा बनता, कभी बच्चा, कभी पागल, कभी राजा। हर किरदार में वह पूरी जान डाल देता।
धीरे-धीरे शहर में उसकी पहचान बनने लगी। लोग कहने लगे—"वो बंटी है, बहुत अच्छा एक्टर है।" स्थानीय अखबार में उसकी तस्वीर छपी, एक नाटक की समीक्षा में उसकी प्रशंसा की गई।
पिता ने वह अखबार देखा। उन्होंने बंटी को बुलाया और कहा—"बेटा, मैं गलत था। तेरा जुनून सिर्फ जुनून नहीं था, यह तेरी पहचान है।"
बंटी की आँखों में आँसू आ गए। उसने पिता के पैर छूए।
सालों बाद, 1995 में, बंटी मुंबई पहुँचा। अब वह सुरेंदर नहीं था, न ही सिर्फ बंटी। वह सुरेंदर भाटिया था—एक प्रशिक्षित अभिनेता, जिसने अपने जुनून को तपस्या में बदल लिया था।
मुंबई की चकाचौंध में वह खोया नहीं। उसने थिएटर से शुरुआत की, छोटे-मोटे टीवी सीरियल किए, फिर एक दिन उसे फिल्म में मौका मिला—एक छोटा सा रोल, लेकिन उसने उसे इतनी शिद्दत से निभाया कि लोगों ने पूछा—"ये नया लड़का कौन है?"
फिल्म का नाम था "पिछाश", और बंटी ने उसमें एक पागल कवि का रोल किया था। वह दृश्य जहाँ वह बारिश में खड़ा होकर शहर को कोसता है, लोगों ने दिल से सराहा। समीक्षकों ने लिखा—"इस नए अभिनेता में वह आग है जो बड़े-बड़े कलाकारों में भी कम दिखती है।"
उस फिल्म के प्रीमियर पर बंटी हॉल में बैठा था। उसके बगल में उसके पिता थे, जो पहली बार मुंबई आए थे। जब फिल्म खत्म हुई और लोगों ने तालियाँ बजाईं, तो पिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
"बेटा," उन्होंने कहा, "तेरे जुनून ने तुझे यहाँ पहुँचाया। मुझे गर्व है।"
बंटी की आँखों से आँसू बह रहे थे। उसने सोचा—उन सब दिनों को, जब लोग उसका मजाक उड़ाते थे, जब पिता डांटते थे, जब ऑडिशन फेल हो गया था, जब रात-रात भर वह डायलॉग लिखता था, जब संजू उसे खाना खिलाता था, जब उसने हार नहीं मानी थी।
उस रात बंटी ने अपनी डायरी में लिखा—"पिछाश का जुनून अब जुनून नहीं रहा, यह मेरी जिंदगी है।"
और उस डायरी के पहले पन्ने पर उसने लिखा हुआ था—"हर दीवाने को अपना दीवाना मिलता है। बस उस दीवानगी को निभाना आना चाहिए।"
आज बंटी—सुरेंदर भाटिया—एक जाना-माना अभिनेता है। उसने तीस से ज्यादा फिल्मों में काम किया है। वह जब भी अपने छोटे शहर जाता है, मोहल्ले के बच्चे उसके पीछे दौड़ते हैं, उससे ऑटोग्राफ लेते हैं। वह उन्हें देखकर खुद को याद करता है—वही बंटी, जो फिल्मों के पोस्टर पर दीवाना था, जो स्टेशन पर रेखा का इंतजार करता था, जो होटल के बाहर लाइन में खड़ा था।
संजू अब भी उसका सबसे अच्छा दोस्त है। बंटी ने उसकी मदद से शहर में एक छोटा सा थिएटर खोला है—जहाँ हर महीने नाटक होते हैं, और हर नए कलाकार को मंच मिलता है। उस थिएटर का नाम है—"पिछाश"।
और थिएटर के गेट पर लिखा है—"जुनून को कभी मत मारो। वही तुम्हें तुम बनाता है।"
समाप्त