Rowlatt act in Hindi Motivational Stories by Gauri Katiyar books and stories PDF | काला कानून: रॉलेट एक्ट

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काला कानून: रॉलेट एक्ट

रॉलेट एक्ट के बारे में तो सभी ने सुना है, परंतु इसके पीछे छिपी दर्द भरी कहानी अत्यंत दुखद और हृदय विदारक है “यह सिर्फ एक कानून नहीं था, बल्कि भारत के लिए एक काला कानून था, जिसने अनेक मासूम लोगों की जान ले ली। इस काले कानून के कारण न जाने कितने परिवार उजड़ गए और कितने ही लोग मौत के मुंह में समा गए।

13 अप्रैल 1919—भारत के इतिहास का वह काला दिन था, जिसने अनगिनत जिंदगियों को हमेशा के लिए बर्बाद कर दिया।

आइए, इसके पीछे की कहानी के बारे में जानते हैं।

First World War :- के दौरान भारतीयों ने अंग्रेजी साम्राज्य की सुरक्षा के लिए आशा से अधिक जनशक्ति और धन से सहायता की। उन्होंने पूरी निष्ठा के साथ ब्रिटिश सरकार का साथ दिया और उनकी कठिनाइयों का कोई लाभ उठाने का प्रयास नहीं किया।

भारतीय नेताओं को यह आशा थी कि युद्ध की समाप्ति के पश्चात अंग्रेज अधिकारी भारतीय आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास करेंगे, किंतु अंग्रेजों का ऐसा कोई विचार नहीं था। वे क्रांतिकारियों और उग्र विचारों वाले राष्ट्रीय नेताओं से अत्यधिक भयभीत थे। इसी कारण 1918 में सिडनी रॉलट की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की गई, जिसका उद्देश्य क्रांतिकारी गतिविधियों को रोकने के उपाय सुझाना था। इस समिति ने अत्यंत कठोर कानून बनाने का सुझाव दिया, जिसे सरकार ने भारतीय नेताओं के विरोध की उपेक्षा करते हुए 21 मार्च 1919 को लागू कर दिया। यही कानून Rowlatt Act के नाम से प्रसिद्ध हुआ।


📜 प्रमुख प्रावधान: 

(1)- किसी भी व्यक्ति को बिना मुकदमा चलाए दो वर्षों तक बंदी बनाया जा सकता था।
(2)- युद्धकाल में नागरिक अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंधों को स्थायी कर दिया गया।
(3)- किसी भी संदिग्ध व्यक्ति पर मुकदमा चलाने और उसे दंडित करने में आने वाली बाधाओं को समाप्त कर दिया गया।
(4)- ऐसी विशेष अदालतों की स्थापना की गई, जिनके निर्णय के विरुद्ध अपील नहीं की जा सकती थी, तथा प्रांतीय सरकारों को तलाशी, गिरफ्तारी और जमानत मांगने के असाधारण अधिकार             दिए गए।
इन प्रावधानों के आधार पर, भारतीय नेताओं के भारी विरोध के बावजूद 21 मार्च 1919 को इस विधेयक को कानून का रूप दे दिया गया। Motilal Nehru ने इन विधेयकों का सार बताते हुए कहा—
“न वकील, न अपील और न दलील।”

ऐसे काले कानून का विरोध होना स्वाभाविक था। इस अधिनियम का भारतीय समाचार-पत्रों—जैसे अमृत बाजार पत्रिका, न्यू इंडिया, पंजाबी, द हिंदू और बॉम्बे क्रॉनिकल—द्वारा तीव्र विरोध किया गया।


विरोध और आंदोलन:


Mahatma Gandhi ने होम रूल लीगों, अखिल भारतीय समूहों एवं सत्याग्रह सभाओं के माध्यम से इस अधिनियम के विरुद्ध जन आंदोलन खड़ा करने की योजना बनाई। उन्होंने 30 मार्च 1919 को अखिल भारतीय स्तर पर हड़ताल का आह्वान किया, जिसे बाद में बदलकर 6 अप्रैल 1919 कर दिया गया।

इस विरोध में हिंदू और मुसलमान दोनों ही एकजुट होकर शामिल हुए। कई प्रमुख नेताओं—जैसे Muhammad Ali Jinnah, Madan Mohan Malaviya और Mazharul Haque—ने अपने पदों से इस्तीफा देकर इसका विरोध किया।

Bhagat Singh ने भी इस काले कानून का विरोध किया। उस समय उनकी आयु मात्र 13 वर्ष थी "जलियांवाला बाग हत्याकांड"के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई छोड़कर राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भाग लिया।


🔥 घटनाएँ और परिणाम:

9 अप्रैल 1919 को गांधीजी को दिल्ली के निकट पलवल स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया।
पंजाब के दो प्रमुख नेता—डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू—को 10 अप्रैल को अमृतसर में गिरफ्तार किया गया।इसके विरोध में अमृतसर की जनता ने विशाल जुलूस निकाला। स्थिति तनावपूर्ण हो गई, जिसमें कई यूरोपीय मारे गए तथा स्थानीय बैंकों को नुकसान पहुँचाया गया।

13 अप्रैल 1919 को "जलियांवाला बाग हत्याकांड" के विरोध में अमृतसर के जलियांवाला बाग में एक जनसभा आयोजित की गई। उसी समय जनरल डायर ने बिना किसी चेतावनी के निहत्थी भीड़ पर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया।सरकारी आंकड़ों के अनुसार 379 लोग मारे गए, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक थी।भारतीय इतिहास में यह क्रूर घटना “जलियांवाला बाग हत्याकांड” के नाम से जानी जाती है।

(भावनात्मक पंक्तियाँ):
“मर गए भारत को मिटाने वाले,
क्योंकि हमने माँ के दूध से इस पवित्र देश को सींचा है।
अरे, किसी में इतनी हिम्मत नहीं कि भारत को मिटा सके,
क्योंकि वीरों की माताओं ने अपने लहू से संतानों को देश की रक्षा के लिए पाला है।”

जय हिंद! जय भारत!