Dowry is an evil practice in Hindi Women Focused by Gauri Katiyar books and stories PDF | दहेज एक बुराई या प्रथा

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दहेज एक बुराई या प्रथा

दहेज यह एक साधारण शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसी भयानक बीमारी है जिसमें एक लड़की की पूरी ज़िंदगी, उसकी आज़ादी और उसके सपने सिमट कर रह जाते हैं। यह बीमारी आज के समाज का ऐसा कभी न मिटने वाला धब्बा बन चुकी है, जिसे मिटाने की कितनी भी कोशिश की जाए, यह समाप्त नहीं होती।

दहेज – एक बरबादी

दहेज शब्द जितना छोटा है, उतना ही खतरनाक भी है। इस दहेज की वजह से न जाने कितनी लड़कियों को उत्पीड़न सहना पड़ता है। कई महिलाएँ तो इस कुप्रथा के कारण आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो जाती हैं। यह प्रथा न केवल एक परिवार, बल्कि पूरे समाज को प्रभावित करती है।

दहेज की शुरुआत

1. प्राचीन काल (वैदिक युग):

उस स समय माता-पिता अपनी बेटी को आशीर्वाद के रूप में धन और आभूषण देते थे, जिसे स्त्रीधन कहा जाता था। इसका उद्देश्य महिला को विवाह के बाद आर्थिक रूप से स्वतंत्र और सुरक्षित बनाना था।

2. मध्यकालीन युग:

जैसे-जैसे मध्यकालीन युग आया, समाज ने इस प्रथा का गलत तरीके से उपयोग करना शुरू कर दिया। इस समय लड़के के परिवार वाले लड़की पक्ष से जबरदस्ती धन और आभूषण लेने लगे। यहीं से इस प्रथा का विकृत रूप समाज में फैलने लगा।

3. औपनिवेशिक काल:

ब्रिटिश शासन के दौरान यह प्रथा विवाह का एक अनिवार्य हिस्सा बनती चली गई, जिससे इसका दुरुपयोग और बढ़ गया।

4. आधुनिक युग:

आज के समय में यह प्रथा एक कुरीति बन चुकी है, जिसमें वधू पक्ष के लोगों को दहेज देने के लिए मजबूर किया जाता है। इस प्रथा का मूल उद्देश्य बेटियों को आर्थिक सुरक्षा देना था, लेकिन आज यह लालच का प्रतीक बन गई है, जहाँ महिलाओं की खुशियों और जीवन की बलि दी जाती है।

समाज पर प्रभाव

आज समाज के लोगों ने इस प्रथा को इतना गलत तरीके से अपनाया है कि न जाने भविष्य में कितनी और लड़कियों को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। यह कुरीति तभी समाप्त होगी जब समाज की सोच बदलेगी।

कहते हैं कि हमारा भारत एक समृद्ध और विकसित देश बन रहा है, लेकिन जब तक समाज से ऐसी कुरीतियाँ समाप्त नहीं होतीं, तब तक सच्चे अर्थों में हमारा देश पूर्ण रूप से विकसित नहीं बन सकता।

एक कड़वा सत्य

“न जाने कितनी बेटियों को इस दहेज ने लूट रखा है,

मैंने बहुओं को अग्नि में ज़िंदा जलते देखा है

न जाने कितने बापों का घर मैने उजड़ते देखा है,

आज समाज ने इस गंदगी को कितना फैलाकर रखा है,

लोग कहते है कि बेटी बोझ है , ऐ दहेज के भूखों तुमने अपने मन में लालच का बसेरा कर रखा है

पहले अपनी सोच को बदलो इसी में सबका भला रखा है,

होगा ये पाप बंद जिस दिन तो समझ लेना जीवन का सुख इसमें रखा है|”

आज दहेज एक लालची कौए की तरह हो गया है। जैसे कौए की चोंच में जितना भी अन्न डालो, उसका पेट कभी नहीं भरता, वैसे ही कुछ लालची लोगों को जितना भी दहेज दिया जाए, उनके लिए हमेशा कम ही होता है।

निष्कर्ष

हमारे भारत में यह प्रथा दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। इसके कारण महिलाओं को आज भी वह सम्मान नहीं मिल पा रहा, जिसकी वे हकदार हैं।सच तो यह है कि जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, तब तक दहेज जैसी कुरीतियाँ समाप्त नहीं होंगी। हमें मिलकर इस बुराई के खिलाफ आवाज़ उठानी होगी, तभी एक सशक्त, समृद्ध और समानता वाला भारत बन पाएगा।