जब मैं उज्जैन में शासन कर रहा था, तब मेरे जीवन में एक ऐसा समाचार आया जिसने सब कुछ बदल दिया।
मेरे पिता, महान सम्राट बिंदुसार, गंभीर रूप से बीमार पड़ गए थे। यह खबर जैसे ही पूरे मौर्य साम्राज्य में फैली, दरबार में हलचल मच गई।
सिंहासन अब खाली होने वाला था और जब सिंहासन खाली होता है, तो केवल एक ही चीज़ जन्म लेती है संघर्ष।
मेरे कई भाई थे, और उनमें सबसे बड़ा था सुसीम वह खुद को सिंहासन का असली उत्तराधिकारी मानता था दरबार के कई मंत्री और सेनापति भी उसी के पक्ष में थे।
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो मुझे योग्य समझते थे।
जब मुझे यह समाचार मिला, तो मैं तुरंत पाटलिपुत्र के लिए निकल पड़ा।
पाटलिपुत्र उस समय दुनिया के सबसे भव्य नगरों में से एक था ऊँची दीवारें, विशाल महल, और हजारों सैनिकों से सुरक्षित राजधानी।
जब मैं महल पहुँचा, तो वातावरण भारी था हर जगह चिंता और सन्नाटा था।
मैं अपने पिता के कक्ष में गया।
वे बिस्तर पर लेटे थे उनका शरीर कमजोर हो चुका था, लेकिन उनकी आँखों में अभी भी वही तेज था।
उन्होंने मुझे पास बुलाया।
धीरे से बोले: “अशोक… एक राजा केवल तलवार से महान नहीं बनता न्याय से बनता है”
उनकी आवाज़ धीमी होती जा रही थी उस दिन मैंने अपने पिता को आखिरी बार देखा कुछ ही समय बाद, पूरे साम्राज्य में शोक की खबर फैल गई।
सम्राट बिंदुसार अब इस दुनिया में नहीं थे।
पिता की मृत्यु के बाद दरबार में राजनीति शुरू हो गई हर मंत्री, हर सेनापति, किसी न किसी पक्ष में खड़ा था मेरा बड़ा भाई सुसीम खुद को नया सम्राट घोषित करना चाहता था।
वह मुझसे नफरत करता था।
उसे लगता था कि मैं उसका सबसे बड़ा प्रतिद्वंद्वी हूँ।
एक रात मुझे खबर मिली कि मेरे खिलाफ साजिश रची जा रही है।
अगर मैं सावधान नहीं रहता, तो शायद उसी रात मेरी हत्या हो जाती।
उस समय मेरे साथ कुछ वफादार मंत्री और सैनिक थे। उन्होंने मुझे चेतावनी दी:
“राजकुमार, अब यह केवल राजनीति नहीं रही यह जीवन और मृत्यु का प्रश्न है।”
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि अंत में संघर्ष अपरिहार्य हो गया।
मुझे अपनी सेना इकट्ठा करनी पड़ी।
मेरे समर्थक सेनापति और सैनिक मेरे साथ खड़े हो गए।
मेरे और मेरे भाइयों के बीच एक भीषण संघर्ष शुरू हो गया।
वह समय मेरे जीवन का सबसे कठोर समय था।
मैंने कई युद्ध लड़े।
कई बार मुझे खुद तलवार उठानी पड़ी।
मैं जानता था कि अगर मैं हार गया, तो मेरा अंत निश्चित है।
धीरे-धीरे मैं अपने विरोधियों को पराजित करता गया।
लेकिन इस संघर्ष में बहुत खून बहा।
कभी-कभी रात को मैं सो नहीं पाता था।
मैं सोचता था —
क्या सिंहासन के लिए इतना रक्त बहाना सही है?
लेकिन उस समय मेरे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था।
आखिरकार वह दिन आया जब मेरे सभी प्रमुख विरोधी पराजित हो चुके थे।
दरबार में सभा बुलाई गई।
साम्राज्य के मंत्री, सेनापति और विद्वान वहाँ उपस्थित थे।
उसी सभा में मुझे मौर्य साम्राज्य का नया सम्राट घोषित किया गया।
उस दिन मैं पाटलिपुत्र के सिंहासन पर बैठा।
पूरे दरबार में शंख और नगाड़ों की आवाज़ गूंज उठी।
लेकिन मेरे दिल में खुशी से ज्यादा एक अजीब सा बोझ था।
मैं जानता था कि इस सिंहासन तक पहुँचने के लिए बहुत रक्त बहा है।
फिर भी, उस समय मेरे मन में एक ही विचार था —
मुझे इस साम्राज्य को दुनिया का सबसे शक्तिशाली साम्राज्य बनाना है।
सम्राट बनने के बाद मैंने अपने साम्राज्य को और विस्तार देने का निर्णय लिया।
मेरी सेनाएँ एक के बाद एक कई राज्यों को जीतने लगीं।
मेरी शक्ति और साम्राज्य दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया।
लोग मुझे अब एक कठोर और शक्तिशाली शासक के रूप में देखने लगे थे।
लेकिन मेरे मन में अभी भी एक अधूरा लक्ष्य था।
एक राज्य ऐसा था जो अभी भी मौर्य साम्राज्य के अधीन नहीं था।
वह था — कलिंग।
मुझे नहीं पता था कि उसी राज्य के साथ होने वाला युद्ध मेरे पूरे जीवन को बदल देगा।
वह युद्ध केवल एक राज्य की विजय नहीं था।
वह मेरे हृदय की पराजय और मानवता की जीत की शुरुआत था।
अगले भाग में मैं बताऊँगा:
क्यों मैंने कलिंग पर आक्रमण करने का निर्णय लिया
कैसा था कलिंग युद्ध
और उस युद्ध में ऐसा क्या हुआ जिसने मुझे हमेशा के लिए बदल दिया
यहीं से मेरी कहानी का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय शुरू होता है।