आज की कहानी कुछ ज्यादा ही खास है क्योंकि ये कोई रोमांटिक,फैंटिसी,या सस्पेंस कहानी नहीं है बल्कि ये कहानी है इतिहास के पन्नों में जिनका नाम सुनहरे अक्षरों से लिखा है उन सम्राट अशोक की तो आइए सुनते हैं सम्राट अशोक की कहानी उनकी जुबानी।
मेरा नाम अशोक है लोग मुझे इतिहास में सम्राट अशोक महान के नाम से जानते हैं लेकिन मैं हमेशा से महान नहीं था मेरे जीवन में ऐसे कई मोड़ आए जिन्होंने मुझे एक कठोर योद्धा से एक दयालु शासक बना दिया
मैं पाटलिपुत्र में पैदा हुआ था, जो उस समय मौर्य साम्राज्य की राजधानी थी मेरे पिता थे बिंदुसार और मेरे दादा महान विजेता चंद्रगुप्त मौर्य थे
मेरे दादा ने इस विशाल साम्राज्य की नींव रखी थी और मेरे पिता ने उसे और भी मजबूत बनाया बचपन से ही मुझ पर एक राजकुमार होने की जिम्मेदारी थी
लेकिन सच कहूँ तो, मेरे बचपन के दिन आसान नहीं थे।
मेरे पिता की कई रानियाँ थीं और मेरे बहुत से भाई भी थे उनमें से कई मुझसे बड़े थे और सिंहासन के उत्तराधिकारी बनने की दौड़ में थे
मैं देखने में उतना सुंदर नहीं था जितने मेरे कुछ भाई थे इसी कारण कई लोग मुझे पसंद नहीं करते थे दरबार में भी कुछ मंत्री और राजकुमार मेरा मज़ाक उड़ाते थे
लेकिन मेरी माँ हमेशा मुझसे कहती थीं:
“अशोक, इंसान की पहचान उसके चेहरे से नहीं, उसके कर्मों से होती है”
उनकी यही बात मेरे दिल में बस गई।
मेरी शिक्षा और प्रशिक्षण
राजकुमार होने के कारण मुझे छोटी उम्र से ही युद्ध और शासन की शिक्षा दी गई
मेरे गुरु मुझे तलवार चलाना, घुड़सवारी करना और सेना का नेतृत्व करना सिखाते थे मैं पढ़ाई में भी तेज था और युद्ध कला में भी
धीरे-धीरे मैंने साबित कर दिया कि मैं कमजोर नहीं हूँ
मेरे गुरु अक्सर कहते थे:
“इस बालक में आग है एक दिन यह महान योद्धा बनेगा”
लेकिन मेरी सबसे बड़ी परीक्षा अभी बाकी थी।
जब मैं युवा हुआ, तब मेरे पिता बिंदुसार ने मुझे पहली बार एक बड़ी जिम्मेदारी दी।
उन्होंने मुझे तक्षशिला भेजा, वहाँ विद्रोह हो गया था सैनिक और जनता राजा के खिलाफ हो गए थे।
मेरे पिता ने मुझे आदेश दिया:
“अशोक, जाकर उस विद्रोह को शांत करो।”
यह मेरे जीवन की पहली बड़ी परीक्षा थी जब मैं अपनी सेना के साथ तक्षशिला पहुँचा, तो वहाँ का माहौल बहुत तनावपूर्ण था।
लोग गुस्से में थे। वे शासन से नाराज़ थे।
मैंने सोचा कि अगर मैं केवल तलवार से काम लूँगा, तो खून-खराबा होगा।
इसलिए मैंने पहले लोगों से बात की।
मैंने उनकी समस्याएँ सुनीं और फिर विद्रोहियों को शांत किया।
आश्चर्य की बात यह थी कि बिना बड़े युद्ध के ही विद्रोह खत्म हो गया।
जब यह खबर पाटलिपुत्र पहुँची, तो मेरे पिता बहुत खुश हुए।
लेकिन मेरे कुछ भाई इससे खुश नहीं थे।
उन्हें डर था कि अगर मैं ऐसे ही सफल होता रहा, तो एक दिन सिंहासन मेरा हो सकता है।
कुछ समय बाद मेरे पिता ने मुझे एक और महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी।
उन्होंने मुझे उज्जैन का राज्यपाल बना दिया।
यह एक महत्वपूर्ण शहर था क्योंकि यहाँ से व्यापार और प्रशासन चलता था।
उज्जैन में रहते हुए मैंने प्रशासन को बहुत करीब से समझा।
मैंने देखा कि एक राजा का काम केवल युद्ध जीतना नहीं होता, बल्कि जनता की भलाई करना भी होता है।
यहीं मेरे जीवन में एक और महत्वपूर्ण घटना हुई।
मैं गंभीर रूप से बीमार पड़ गया था।
उस समय मेरी देखभाल एक स्त्री ने की, जिसका नाम देवी था।
वह बहुत दयालु और बुद्धिमान थी।
धीरे-धीरे हमारे बीच गहरा संबंध बन गया और बाद में वह मेरी पत्नी बनी।
उसने मेरे जीवन को बहुत प्रभावित किया।
सिंहासन के लिए संघर्ष
कुछ वर्षों बाद पाटलिपुत्र से खबर आई जिसने पूरे साम्राज्य को हिला दिया।
मेरे पिता बिंदुसार गंभीर रूप से बीमार हो गए थे।
अब सवाल यह था कि अगला सम्राट कौन बनेगा।
मेरे बड़े भाई सुसीम खुद को सबसे योग्य मानते थे।
दरबार में भी कई लोग उनका समर्थन करते थे।
लेकिन कुछ मंत्री मेरे पक्ष में भी थे।
सिंहासन के लिए संघर्ष शुरू हो गया।
यह मेरे जीवन का सबसे कठिन समय था।
मुझे निर्णय लेना था —
या तो मैं हार मान लूँ,
या अपने भाग्य के लिए लड़ूँ।
मैंने दूसरा रास्ता चुना।
और यहीं से मेरे जीवन का वह अध्याय शुरू हुआ जिसने मुझे इतिहास का सबसे शक्तिशाली सम्राट बना दिया।
लेकिन उस समय मुझे यह नहीं पता था कि भविष्य में एक ऐसा युद्ध होगा जो मेरे पूरे जीवन को बदल देगा।
वह युद्ध था — कलिंग युद्ध।
और उसी युद्ध के बाद मेरा जीवन हमेशा के लिए बदल गया।
अगले भाग में मैं बताऊँगा:
मैंने मौर्य सिंहासन कैसे प्राप्त किया ,मेरे भाइयों के साथ क्या हुआ, मैं कैसे बना भारत का सबसे शक्तिशाली सम्राट
और कैसे शुरू हुई मेरी विजय यात्राएँ।