अध्याय 2
पिंजरे में पहली रात
काव्या ने अपने हाथ में पकड़े बैग को ज़ोर से भींचा। उसके सामने विराज मल्होत्रा का आलीशान बंगला 'मल्होत्रा मेंशन' खड़ा था। यह घर जितना भव्य था, उतना ही ठंडा और खामोश भी।
"अंदर आने के लिए क्या मुझे रेड कारपेट बिछाना पड़ेगा?" विराज की भारी आवाज़ उसके पीछे से आई। वह अभी-अभी अपनी काली कार से उतरा था।
काव्या ने पलटकर उसे देखा। वह अब भी उसी सख्त अंदाज़ में था।
"मैं यहाँ सिर्फ काम के लिए आई हूँ, सर। और याद रखिएगा, 15 दिन बाद मैं आज़ाद रहूँगी।"
विराज उसके करीब आया, इतना करीब कि काव्या उसकी परफ्यूम की तेज़ खुशबू महसूस कर सकती थी। "आज़ादी महँगी होती है काव्या। उम्मीद है तुम इसकी कीमत चुका पाओगी।"
जैसे ही काव्या ने अंदर कदम रखा, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। घर के हर कोने में विराज की पसंद झलक रही थी—काला और सफ़ेद रंग, आधुनिक कलाकृतियाँ, और हर तरफ एक अजीब सा अकेलापन।
"तुम्हारा कमरा ऊपर दाहिनी तरफ है। ठीक 8 बजे डिनर टेबल पर होनी चाहिए। मुझे इंतज़ार करना पसंद नहीं," विराज ने सीढ़ियाँ चढ़ते हुए कहा।
रात के 8 बजे काव्या नीचे पहुँची। टेबल पर लजीज खाना लगा था, लेकिन विराज वहाँ अकेला बैठा था। पूरे घर में कोई आवाज़ नहीं थी।
"आप इतने बड़े घर में अकेले रहते हैं?" काव्या से रहा नहीं गया और उसने पूछ लिया।
विराज के हाथ में पकड़ा काँटा रुक गया। उसने सर उठाकर काव्या को देखा, उसकी आँखों में एक पल के लिए दर्द की एक लहर दिखी जो तुरंत गायब हो गई।
"भीड़ होने से अकेलापन कम नहीं होता, मिस मेहरा। खाना खाओ और कल सुबह की स्क्रिप्ट का ड्राफ्ट तैयार रखो।"
काव्या ने चुपचाप खाना शुरू किया, लेकिन उसे महसूस हुआ कि विराज की नज़रें लगातार उस पर टिकी थीं। वह उसे देख नहीं रहा था, बल्कि शायद उसे 'महसूस' कर रहा था। अचानक विराज की माँ की एक पुरानी तस्वीर पर काव्या की नज़र पड़ी, जो धूल से ढकी एक कोने में रखी थी।
"वो तस्वीर..." काव्या ने इशारा किया।
"अपनी हद में रहो काव्या!" विराज अचानक चिल्लाया और मेज पर हाथ मारते हुए खड़ा हो गया। "तुम यहाँ स्क्रिप्ट लिखने आई हो, मेरी ज़िंदगी में झाँकने नहीं।"
काव्या की आँखों में आँसू आ गए, पर उसने उन्हें बहने नहीं दिया। वह समझ गई थी कि विराज के इस गुस्से के पीछे कोई बहुत बड़ा ज़ख्म है। और शायद, यही वह ज़ख्म था जिसे उसे अपनी कहानी के लिए समझना था।
आखिर उस तस्वीर में ऐसा क्या था जिसने विराज के ठंडे मिज़ाज को आग में बदल दिया? क्या काव्या विराज के उस राज़ को जान पाएगी जिसे वह पूरी दुनिया से छिपाए बैठा है? जानने के लिए इंतज़ार कीजिए अध्याय 3 का!"
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हर कमेंट मुझे अगला अध्याय और भी बेहतर लिखने की प्रेरणा देता है।
एक लेखक के तौर पर मेरे लिए आपकी राय सबसे कीमती है। आपको विराज का सख्त मिज़ाज और काव्या की बेबाकी कैसी लगी? क्या आपको लगता है कि विराज के इस गुस्से के पीछे कोई गहरा राज़ छुपा है?
Author name = Deepti Gurjar