बरगद का साया और वो अक्स
कॉलेज के आर्ट्स ब्लॉक के पीछे वाला वो हिस्सा हमेशा से थोड़ा मनहूस माना जाता था। वहां कोई आता-जाता नहीं था। पुरानी लाल ईंटों की टूटी हुई दीवारें, जिन पर काई ने अपना पक्का घर बना लिया था, और हवा में रुकी हुई सीलन... जैसे किसी बहुत पुराने, बंद कमरे का दरवाज़ा अचानक खोल दिया गया हो। वहीं कोने में एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ था। उसकी जटाएँ ज़मीन को ऐसे जकड़े हुए थीं, जैसे किसी बहुत बूढ़े इंसान की हाथों की नसें उभर आई हों।
विराज उसी बरगद के नीचे, खुरदरी दीवार के सहारे औंधे मुंह सा बैठा था। उसकी सांसें किसी लुहार की धौंकनी की तरह चल रही थीं। उसने कांपती उंगलियों से अपनी शर्ट का कॉलर खींचा। ऊपर के दो बटन टूटते-टूटते बचे। छाती के ठीक बीचों-बीच, जहाँ कुछ घंटे पहले वह अजीब सा लाल निशान उभरा था, वहाँ अब आग तो नहीं जल रही थी, लेकिन एक मीठी-मीठी सी टीस उठ रही थी। जैसे किसी ने वहां सुलगता हुआ कोयला रखकर अभी-अभी हटाया हो और खाल अंदर तक सिंक गई हो।
उसने हथेलियों से अपना चेहरा रगड़ा। पसीने से उसके बाल माथे पर चिपक गए थे। उसका दिमाग सुन्न था। वह सपना, सीने का वो निशान, और काव्या के पास आते ही खुद पर से कंट्रोल खो देना... यह सब क्या था?
"तो यहाँ दुबक कर बैठे हो, नवाबजादे?"
एक जानी-पहचानी आवाज़ ने उस भारी सन्नाटे को चीर दिया।
विराज ऐसे हड़बड़ाया जैसे कोई रंगे हाथों चोरी करते पकड़ा गया हो। उसने आँखें खोलीं। सामने काव्या खड़ी थी। पर आज वो हमेशा वाली आफत नहीं लग रही थी। उसके चेहरे की वो 'चंडी' वाली अकड़, जो बात-बात पर लड़ने को तैयार रहती थी, कहीं गायब थी। उसके हाथ में कैंटीन का वो तेल से सना खाकी लिफ़ाफ़ा था। लिफ़ाफ़े के कोनों से छनकर आती गर्मागर्म समोसे और पुदीने की तीखी चटनी की महक ने अचानक विराज के पेट में एक ऐंठन सी पैदा कर दी। उसे याद आया कि कल रात से हलक के नीचे अन्न का एक दाना नहीं गया है।
विराज दीवार का सहारा लेकर खड़ा होने लगा, "काव्या, मैं बस यहाँ..."
"चुपचाप बैठ जाओ," काव्या ने हाथ के एक छोटे से इशारे से उसे टोका और खुद उसके बगल में, थोड़ी दूरी बनाकर उसी खुरदरी दीवार के सहारे बैठ गई।
उसने लिफ़ाफ़ा खोला। समोसे की पपड़ी थोड़ी टूट गई थी और उसमें से आलू की हल्की भाप हवा में घुलने लगी।
"सुबह से कुछ खाया नहीं है न? और घर से भी बिना नाश्ता किए ऐसे भागे जैसे पीछे कोई कुत्ता पड़ गया हो," काव्या ने आधा समोसा तोड़कर उसकी तरफ बढ़ाया। "लो, ठूंस लो। जन्मदिन के दिन भूखे मरने का कोई रिवाज नहीं है हमारे यहाँ।"
विराज ने हिचकिचाते हुए वह टुकड़ा ले लिया। उसने धीरे से काव्या की तरफ देखा। हवा के झोंके से उसके उलझे हुए बाल बार-बार उसकी आँखों पर आ रहे थे। अभी कुछ देर पहले जो लड़की कॉलेज के गलियारे में तूफान खड़ा किए हुए थी, वह अब इतनी शांत कैसे हो गई?
विराज ने समोसे का एक बहुत छोटा सा बाइट लिया। गले में थूक निगलना भी कांटों सा चुभ रहा था। उसने बहुत धीमी आवाज़ में पूछा, "तुम... तुम नाराज नहीं हो?"
काव्या ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने बस अपने बालों की उस जिद्दी लट को कान के पीछे अड़साया और आसमान की तरफ देखने लगी। दोनों के बीच एक लंबी, असहज खामोशी छा गई। बरगद का एक सूखा पत्ता टूटा और हवा में गोल-गोल घूमता हुआ ठीक उन दोनों के बीच आकर गिर गया।
"नाराज तो हूँ," काव्या ने बिना उसकी तरफ देखे कहा। उसकी आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था। "बहुत ज्यादा। मेरा बस चले तो तुम्हारा गला दबा दूँ और किसी को कानो-कान खबर भी न हो।"
विराज के गले में समोसे का टुकड़ा अटक गया। उसे हल्की सी खांसी आ गई।
काव्या अचानक हंस पड़ी। उसकी हंसी बहुत साफ और खनकदार थी। "अरे डरो मत, अभी नहीं मारूँगी। अभी तो... अभी तो मुझे तुम्हारे साथ बहुत वक्त बिताना है।"
विराज ने उसे घूर कर देखा। जब वह हंसती थी, तो उसकी आँखों के कोनों में एक अजीब सी चमक आ जाती थी। वह वाकई बहुत सुंदर थी। अगर वह इतनी चिपकू न होती और हर बात में अपना हुक्म न चलाती, तो शायद विराज को वह बहुत अच्छी लगती।
"वैसे विराज," काव्या की हंसी अचानक गायब हो गई। उसने पास पड़ी एक सूखी टहनी उठाई और उससे ज़मीन की मिट्टी कुरेदने लगी। "तुम्हें सच में लगता है कि मैं तुम्हारे पीछे सिर्फ़ इसलिए पड़ी हूँ क्योंकि मुझे कोई और लड़का नहीं मिलता?"
विराज चुप रहा। उसे जवाब नहीं सूझा। वह बस अपने हाथ में पकड़े आधे खाये समोसे को देखता रहा।
काव्या ने वह टहनी फेंक दी। "पता नहीं क्यों... जब मैं तुम्हारे पास होती हूँ, तो मुझे बहुत सुकून मिलता है। जैसे... जैसे कोई अपना..."
कहते-कहते काव्या ने अचानक अपना हाथ बढ़ाया और विराज का बायां हाथ पकड़ लिया।
"तुम्हारा हाथ... बर्फ हो रहा है विराज।"
जैसे ही काव्या की गर्म उंगलियों ने विराज की ठंडी त्वचा को छुआ... विराज के रोंगटे खड़े हो गए। उसे लगा जैसे नंगे पैर गीली ज़मीन पर खड़े होकर किसी ने बिजली का खुला तार छू लिया हो। लेकिन यह झटका दर्दनाक नहीं था। यह एक अजीब सी सिहरन थी, जो उसकी नसों में किसी बाढ़ की तरह दौड़ गई।
विराज ने अपना हाथ झटके से खींचना चाहा, लेकिन उसका शरीर को जैसे करेंट मार गया था। वह हिल भी नहीं पा रहा था। उसने बेबसी में काव्या की आँखों में देखा।
और उसी एक पल में... समय जैसे रुक गया।
काव्या की उन गहरी काली पुतलियों में विराज को अपनी परछाईं नहीं दिखी। उसे वो दिखा जिसने उसकी रात की नींद उजाड़ दी थी। वही चेहरा। वही राजपूती लिबास। माथे पर खून जैसी लाल बिंदी। और वो आँखें... वो आँखें जो उसे ऐसे देख रही थीं जैसे सदियों से जानती हों। वो आँखें सीधे उसकी रूह के अंदर झाँक रही थीं। बस, इस बार उन हाथों में कोई तलवार नहीं थी।
"विराज? तुम ठीक हो?" काव्या ने घबराकर उसके कंधे को हिलाया।
उसका स्पर्श टूटते ही विराज को एक जोरदार धक्का सा लगा और वह औंधे मुंह वापस असलियत में आ गिरा। उसने तुरंत अपना हाथ झटके से पीछे खींच लिया और ज़मीन पर घिसटता हुआ थोड़ा पीछे खिसक गया। उसकी सांसें फिर से बेकाबू हो गई थीं। माथे पर फिर से पसीने की ठंडी परत जम गई थी।
"ह-हाँ... मैं ठीक हूँ। बस... थोड़ी गर्मी लग रही है," विराज ने नज़रें चुराते हुए हकलाकर कहा।
काव्या उसे बड़ी गौर से देख रही थी। उसकी नज़रों में अब शिकायत नहीं थी, बल्कि एक गहरी, चुभने वाली चिंता थी। उसने कुछ सेकंड तक उसे घूरा, फिर एक गहरी सांस छोड़ी।
"तुम सच में अजीब हो। चलो, अब घर चलते हैं। तुम्हारी माँ ने मुझे तुम्हें जल्दी घर लाने की जिम्मेदारी दी है, और मैं आंटी का भरोसा नहीं तोड़ सकती।"
काव्या उठी और उसने अपनी जींस पर लगी धूल झाड़ी। उसने अपना हाथ विराज की तरफ बढ़ाया, उसे उठाने के लिए।
विराज उस गोरे, छोटे से हाथ को बस घूरता रहा। उसके अंदर एक अनजाना खौफ बैठ गया था। उसे डर लग रहा था कि अगर उसने दोबारा उस हाथ को छुआ, तो कहीं उसके अंदर सोया हुआ वो बवंडर पूरी तरह बाहर न आ जाए।
उसने काव्या का हाथ अनदेखा कर दिया और खुद ही दीवार का सहारा लेकर खड़ा हो गया। "मैं... मैं आ रहा हूँ। तुम चलो आगे।"
काव्या का बढ़ा हुआ हाथ हवा में ही रुक गया। उसने धीरे से अपना हाथ वापस खींच लिया। उसके चेहरे पर एक पल के लिए जो उदासी आई, वह किसी को भी अंदर तक चुभ जाती। लेकिन उसने तुरंत उस दर्द को अपनी उसी पुरानी, नखरे वाली मुस्कान के पीछे छिपा लिया।
"ठीक है, मिस्टर अकड़ू। लेकिन स्कूटी मैं ही चलाऊँगी, और तुम चुपचाप पीछे बैठोगे। कोई फालतू बकवास नहीं," काव्या ने अपना फैसला सुनाया और बिना पीछे मुड़े पार्किंग की तरफ चल दी।
विराज भारी कदमों से उसके पीछे-पीछे चल रहा था। वह उसकी पीठ को देख रहा था। यह लड़की सच में एक पहेली थी। एक पल में जान लेने पर उतारू हो जाती है, और दूसरे ही पल में इतनी फिक्र करती है जैसे दुनिया में उसके अलावा कोई और है ही नहीं।
कुछ ही मिनटों बाद, काव्या की स्कूटी की फट-फट आवाज़ कॉलेज के गेट से बाहर निकलकर धीमी होती हुई दूर चली गई।
और फिर... वहां पसरा वो पुराना सन्नाटा।
जैसे ही स्कूटी की आवाज़ पूरी तरह गायब हुई, उस पुराने बरगद के सबसे मोटे तने के पास का माहौल अचानक बदल गया। दोपहर की उस तीखी धूप में भी हवा एकदम से सर्द हो गई, जैसे किसी ने बर्फ की सिल्लियां रख दी हों। आस-पास मंडराने वाली चींटियों की कतारें अचानक जहाँ की तहाँ रुक गईं।
बरगद के तने के बीच बने उस बड़े से खोखले हिस्से से, जहाँ दिन में भी सूरज की रोशनी नहीं पहुँच पाती थी... एक साया धीरे-धीरे बाहर निकला।
वह एक कन्या थी। उसे सिर्फ 'सुंदर' कहना उस शब्द की तौहीन होगी। उसका रूप ऐसा था जो इंसान की सोच और बर्दाश्त दोनों से परे था। उसके माथे पर एक ऐसा तेज था जिसे देखकर आंखें चौंधिया जाएं। और उसकी आँखें... वे किसी इंसान की आँखें नहीं थीं। उनमें सदियों का ठहराव था, एक ऐसा सम्मोहन था जो किसी भी चलते हुए इंसान को पत्थर बना दे। उसका लिबास इस सदी का था ही नहीं। हवा में अचानक ताज़े चमेली और चंदन की एक बहुत तेज महक फैल गई, जिसने वहां की सीलन भरी बदबू को एक झटके में खत्म कर दिया।
उस कन्या ने ज़मीन की उस मिट्टी को देखा जहाँ कुछ देर पहले विराज के जूते के निशान पड़े थे। उसके होंठों पर एक बहुत ही सूक्ष्म, रहस्य से भरी मुस्कान तैर गई।
"आखिर... ढूँढ ही लिया तुम्हें, विराज..."
उसकी आवाज़ होंठों से नहीं निकली थी, बल्कि सीधे उस सूखी हवा में गूंजी थी। उसमें एक अजीब सी कशिश थी और एक बहुत पुराना दर्द भी।
"बहुत लंबा समय हो गया इंतज़ार करते-करते। सदियाँ बीत गईं। पर अब... तुमसे बहुत जल्दी मुलाकात होगी।"
उसने अपना दायां हाथ धीरे से उस पुराने बरगद के सबसे मोटे तने पर रखा। जिस जगह उसकी उंगलियां पड़ीं, वहाँ की हरी काई पलक झपकते ही सूख कर काली पड़ गई।
खेल शुरू हो चुका था, और इस बार... इस बार कोई लक्ष्मण रेखा उसे नहीं रोक पाएगी।