Lal Paththar ka Raaz - 2 in Hindi Fiction Stories by Anil singh books and stories PDF | लाल पत्थर का राज - भाग 2

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लाल पत्थर का राज - भाग 2

बाहर काव्या अपनी स्कूटी के पास खड़ी होकर बार-बार हॉर्न की कर्कश आवाज़ निकाल रही थी। उसकी आवाज़ में साफ़ धमकी थी जब उसने चिल्लाकर कहा, "विराज! अब अगर तुम एक मिनट में बाहर नहीं आए, तो मैं खुद अंदर आ रही हूँ!"
अंदर, विराज अपने कमरे की खिड़की से बाहर का नज़ारा देख रहा था। उसने हताशा में अपने माथे पर हाथ मारा। उसने मन ही मन सोचा, 'आज तो यह मेरे दिमाग का दही कर देगी। अगर इसके साथ कॉलेज गया, तो पूरे रास्ते इसका भाषण सुनना पड़ेगा और ऊपर से सब दोस्त फिर मज़ाक उड़ाएंगे।'
उसने दबे पाँव अपने कमरे का दरवाजा बंद किया। वह मुख्य द्वार से नहीं, बल्कि घर के पिछले रास्ते की तरफ बढ़ा। उसने अपने जूते हाथ में उठा लिए थे ताकि ज़मीन पर आहट न हो। रसोई में माँ काम में व्यस्त थीं।
विराज ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, "माँ, मैं जा रहा हूँ। अगर काव्या पूछे, तो कह देना कि मैं तो बहुत पहले ही निकल गया था।"
माँ ने उसे चोरों की तरह जाते देख मुस्कराते हुए सिर हिला दिया। "तू भी न, उससे कितना डरता है। अच्छा जा, पर संभल कर जाना।"
विराज ने फुर्ती से पिछला दरवाजा खोला और गली में निकल गया। मुख्य सड़क पर पहुँचते ही उसने राहत की सांस ली और तुरंत एक ऑटो रिक्शा को हाथ दिया।
"भैया, सिटी कॉलेज... और जरा जल्दी चलना," विराज ने बैठते ही पीछे मुड़कर देखा, जैसे उसे डर हो कि कहीं काव्या का तूफ़ान उसका पीछा न कर रहा हो।
कैंटीन का घेरा
कॉलेज पहुँचकर विराज सीधा क्लास में नहीं गया। उसे पता था कि काव्या वहाँ पहले से ही पहरा दे रही होगी। इसलिए वह बचते-बचाते सीधा कैंटीन की तरफ निकल गया।
कैंटीन में उसके दो जिगरी दोस्त, समीर और रोहन, पहले से ही नाश्ता कर रहे थे।
"अरे भाई! आ गया हमारा जन्मदिन वाला लड़का!" समीर ने उत्साह में चिल्लाकर कहा।
विराज ने तुरंत झपटकर समीर के मुँह पर हाथ रख दिया। "चुप कर भाई! क्यों शोर मचा रहा है? अगर 'उसने' सुन लिया तो मेरी शामत आ जाएगी।"
रोहन ने समोसा खाते हुए शरारत से पूछा, "क्यों? क्या आज भी अपनी पड़ोसन से छुपकर आ रहे हो?"
विराज ने अपनी कुर्सी खींचते हुए मुँह बनाया। "यार, तुम लोग उसे चिढ़ाना बंद करो। वह सिर्फ मेरी पड़ोसन है। आज सुबह-सुबह ही घर पहुँच गई थी, कह रही थी अपनी स्कूटी पर छोड़ देगी। मैं बड़ी मुश्किल से जान बचाकर भागा हूँ।"
तीनों दोस्त ठहाके लगाने लगे, लेकिन तभी विराज को अपने सीने में एक अजीब सी तपन महसूस हुई। ठीक उसी जगह, जहाँ वह रहस्यमयी लाल तिल था। उसे ऐसा आभास हुआ जैसे कोई आफत उसके बेहद करीब है। उसने अनजाने में अपनी छाती पर हाथ रखा।
"क्या हुआ भाई? क्या दिल की धड़कन तेज़ हो गई?" समीर ने चुटकी ली।
"नहीं यार, बस कुछ अजीब लग रहा है," विराज ने बात को टालने की कोशिश की, पर उसे भीतर से महसूस हो रहा था कि खतरा आसपास ही है।
तभी कैंटीन के मुख्य द्वार पर हलचल हुई। काव्या वहाँ खड़ी थी। उसका चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था। उसने अपना हेलमेट मेज़ पर पटक दिया और अपनी तीखी नज़रों से पूरे कैंटीन की छानबीन करने लगी। वह किसी जासूस की तरह अपने अपराधी को तलाश रही थी।
"भाई! वह आ गई!" रोहन ने फुसफुसाते हुए चेतावनी दी।
विराज ने फौरन मेज़ के नीचे छुपने की नाकाम कोशिश की और फिर रोहन की पीठ के पीछे दुबक गया। "भाई, मुझे कवर दे, बस आज बचा ले!"
काव्या की नज़रें विराज को नहीं ढूँढ पाईं, पर उसे समीर और रोहन दिख गए। वह पैर पटकती हुई उनकी मेज़ के पास आई।
"ओये! तुम दोनों," काव्या ने उन्हें घूरते हुए पूछा। "विराज कहाँ है? उसकी बाइक स्टैंड पर नहीं है, पर मुझे पूरा यकीन है कि वह यहीं कहीं दुबका बैठा है।"
समीर ने हकलाने का नाटक करते हुए झूठ बोला, "अरे काव्या जी... वो... विराज तो आज आया ही नहीं। सुना है उसकी तबीयत थोड़ी खराब है।"
काव्या ने अपनी कमर पर हाथ रखकर संदेह भरी नज़रों से उन्हें देखा। "मुझसे झूठ मत बोलो। आंटी ने बताया था कि वह निकल चुका है। अगर मुझे पता चला कि तुम उसे छुपा रहे हो, तो तुम दोनों की भी खैर नहीं।"
इतना कहकर वह गुस्से में पैर पटकती हुई क्लास की तरफ बढ़ गई। विराज ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपने माथे का पसीना पोंछा। "कसम से, यह लड़की नहीं, खुफिया एजेंसी है।"
क्लास की आफत
लेक्चर शुरू होने का समय हो चुका था। विराज को पता था कि अगर हाजिरी नहीं लगी, तो नुकसान होगा। वह दबे पाँव क्लास में घुसा और सबसे पिछली बेंच पर कोने में जाकर बैठ गया। उसने अपना चेहरा किताब के पीछे पूरी तरह छिपा लिया।
मगर किस्मत शायद आज उससे रूठी हुई थी।
काव्या सबसे पहली बेंच पर बैठी थी। जैसे ही प्रोफेसर ने हाजिरी के लिए "विराज शर्मा" पुकारा, विराज के मुँह से अनजाने में निकल गया— "जी सर!"
पूरी क्लास में सन्नाटा छा गया। अगले ही पल, काव्या ने बिजली की फुर्ती से पीछे मुड़कर देखा। उसकी और विराज की नज़रें एक-दूसरे से टकराईं।
काव्या की आँखों में जैसे ज्वाला धधक रही थी। उसने शब्दों का प्रयोग नहीं किया, बस अपनी आँखों से इशारा किया— 'बेटा, क्लास के बाहर मिल, फिर बताती हूँ तुझे।'
विराज ने घबराकर अपनी नज़रें झुका लीं। ठीक उसी समय, उसके सीने का वह निशान बेहद गरम होने लगा। उसे महसूस हुआ कि उसकी जेब में रखा पेन अपने आप हिलने लगा है। उसे लगा कि उसके भीतर की घबराहट बाहर की चीज़ों पर असर डाल रही है। उसने तुरंत पेन को कसकर अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
"शांत हो जा... खुद पर काबू रख," उसने खुद को मन ही मन समझाया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि काव्या के करीब आते ही यह अनजानी ऊर्जा क्यों बेकाबू होने लगती है।
छुट्टी और नई उलझन
जैसे ही क्लास खत्म होने की घंटी बजी, विराज ने पलक झपकते ही अपना बैग उठाया। उसने सोचा कि काव्या के उठने से पहले ही वह वहां से नौ दो ग्यारह हो जाएगा। वह पिछले दरवाजे से तेज़ी से बाहर निकला।
कॉरिडोर में काफी भीड़ थी। विराज तेज़ कदमों से चल रहा था कि तभी लड़कियों का एक समूह उसके सामने आ गया।
"हाय विराज! जन्मदिन मुबारक हो!" एक लड़की ने मुस्कराते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया।
विराज ठिठक गया। वह स्वभाव से थोड़ा शर्मीला था। "शुक्रिया..." उसने संकोच के साथ हाथ मिलाया।
दूसरी लड़की ने अपने बालों को सँवारते हुए कहा, "आज तो तुम बहुत सुंदर लग रहे हो। वैसे, शाम की पार्टी का क्या कार्यक्रम है? अगर बुलाओगे तो हम भी शरीक होंगे।"
लड़कियां खिलखिलाकर हँस पड़ीं। विराज का चेहरा शर्म से लाल हो गया। "वो... अभी कुछ तय नहीं किया है," उसने झिझकते हुए कहा।
तभी उसे दूर से काव्या की दहाड़ सुनाई दी, "सामने से हटो सब!"
विराज ने देखा कि काव्या भीड़ को चीरती हुई बिजली की तरह उसकी तरफ आ रही है। उसकी नज़रें उन लड़कियों पर टिकी थीं जो विराज से बात कर रही थीं। काव्या का तेवर बता रहा था कि वह इस समय ज्वालामुखी बनी हुई है।
विराज ने तुरंत लड़कियों से कहा, "मुझे माफ़ करना, मुझे बहुत ज़रूरी काम है!" और उसने वहाँ से पतली गली पकड़ी और गेट की तरफ दौड़ लगा दी।
पीछे से लड़कियों की आवाज़ें आती रहीं, पर विराज नहीं रुका। कॉलेज गेट के बाहर आकर उसने एक चैन की सांस ली। उसे लगा कि आज का संकट टल गया।
लेकिन वह नहीं जानता था कि यह भाग-दौड़ तो बस एक बड़े तूफ़ान की शुरुआत थी। उसकी शक्तियां अब बाहर आने को बेताब थीं और काव्या का वह गुस्सा... वह महज़ जलन नहीं, बल्कि पुराने जन्मों का कोई गहरा हिसाब था, जिसका खुलना अभी बाकी था।