Monalisa Smile - 1 in Hindi Horror Stories by Sanjay Kamble books and stories PDF | Monalisa Smile - 1

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Monalisa Smile - 1


मोनालिसा स्माईल.



By Sanjay Kamble.



एक एंकर अपनी न्यूज़ रूम में चिल्ला चिल्लाकर लोगों को एक जानकारी दे रही थी।

"लोगों को भी सचेत रहना चाहिए, अगर सच्चाई सामने नहीं आती तो किसी बेगुनाह को जिंदगी भर सलाखों के पीछे सडते रहना पडता और इसका जवाब कौन देता। उन पर झूठा आरोप लगाने वाली उस पागल लड़की की दिमागी हालत को देखते हुए अदालत ने उसे मेंटल एसाइलम भेज कर अच्छी ट्रीटमेंट देना का फैसला सुनाया है। और अस्पताल को यह चेतावनी दी है कि इस लड़की से ज्यादा से ज्यादा दूरी रहे, क्योंकि वह काफी खतरनाक बीमारी से ग्रसित है। जो किसी की जान लेने के लिए जरा भी नहीं हिचकीचाएगी। "



एक महिने बाद...



एक खोजी महिला पत्रकार के हाथ में उस लड़की की मेडिकल कंडीशन, उसकी दिमागी बीमारी और उसके भयानक बर्ताव के रिपोर्ट्स थी।

 स्कित्झोफ्रेनिया, हैल्युसिनेशन। फायनल स्टेज,

 एक अखबार में छपा था '२५ साल की खुशमिजाज लडकी क्या ड्रग्ज की आदी हो गई थी।'  

पेन को उंगलियों पर घुमाते हुए वह सोचने लगी।

' कल सुबह मेंटल एसाइलम में जाकर उस लड़की की हालत और उसकी हालत में हुए सुधार के बारे में जानकारी लेनी है।' 



****



 उस मेंटल असाइलम की एक दमघोंटू कमरे में उस लड़की को ले जाया गया था —छोटे से कमरे में घुली हुई सीलन, दवाइयों की कड़वी गंध और दूर से आती पागलों की अस्पष्ट चीखें। अंदर जलती ट्यूबलाइट मद्धम रोशनी में झिलमिला रही थी, मानो उसकी रोशनी भी यहाँ की सड़ांध से थक चुकी हो।

केंद्र में लोहे का भारी-भरकम बेड था, जिस पर चमड़े की मोटी पट्टियों से एक लड़की को बाँध दिया गया था। उसके दोनों हाथ बेड के सिरों से कसकर जकड़े गए थे, टखनों पर पट्टियाँ इतनी कसी थीं कि मांस में गहरे निशान पड़ चुके थे।

वह छटपटा रही थी, लेकिन उसकी हर कोशिश नाकाम थी। उसके नाखूनों की कोरों से सूखा खून झलक रहा था—शायद उसने खुद को छुड़ाने के लिए पहले भी संघर्ष किया था।

कमरे के कोने में खड़ी नर्स सुनीता ने एक ठंडी निगाह लडकी पर डाली। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं थे, बस हाथों में पकड़े शॉक मशीन के इलेक्ट्रोड्स को कसकर दबाए खड़ी थी।

डॉक्टर शर्मा धीमे कदमों से आगे बढ़े। उनकी झुर्रीदार आँखों में ठंडा आकलन था, मानो यह सिर्फ एक मेडिकल प्रोसीजर हो, किसी इंसान पर नहीं।

"तैयार?" 

उन्होंने सुनीता की ओर बिना देखे पूछा।

सुनीता ने सिर हिलाया और शॉक मशीन चालू कर दी।

"न... नहीं... नहीं... प्लीज़!"

लडकी की दबी-दबी चीख कमरे में गूँज उठी। उसकी साँसें उखड़ने लगीं, उसकी गर्दन रस्सी के बल बंधे किसी पशु की तरह ऐंठने लगी।

"शुरू करो," डॉक्टर ने कहा।

सुनीता ने दोनों धातु के इलेक्ट्रोड्स को लडकी के गीले माथे से चिपका दिया।

"झटका—पहला।"

स्विच दबते ही कमरे में तेज़ "चर्ररररर!" की आवाज़ गूँज उठी।

लड़की का पूरा शरीर झटके से ऊपर उछल गया, जैसे किसी ने लोहे की छड़ को ज़िंदा बिजली से जोड़ दिया हो। उसकी आँखें सफेद पड़ गईं, बालों की लटें हवा में खिंच गईं, होंठ कांपते हुए भयानक तरीके से फड़कने लगे।

चर्रररर... चर्रररर!

बिजली की लहरें उसके शरीर में दौड़ गईं। उसकी उंगलियाँ आपस में टकरा रही थीं, नाखून खून से भर गए थे।

"आहहहहहहहहहह!!!"

एक दहला देने वाली चीख पूरे कमरे में गूँज उठी। उसकी पीठ झटके से इतनी ऊँची उठी कि कंधों के नीचे की पट्टियाँ चरमराने लगीं।

उसके पैरों की एड़ियाँ बिस्तर के किनारे से टकराईं, और पट्टियाँ इतनी कस गईं कि चमड़ी के नीचे की नसें नीली पड़ने लगीं।

"दूसरा झटका।"

"नहीं!"

लड़की की मुड़ी हुई गर्दन के नीचे से लार की पतली धार बाहर बह निकली। परंतु डॉक्टर ने सुनीता की झिझक को अनदेखा कर दिया।

"स्विच ऑन करो!"

चर्ररररररररररर!!!

इस बार झटका और भी घातक था। उसकी दाढ़ें कसकर जकड़ गईं, मांसपेशियाँ इतनी ज़ोर से सिकुड़ गईं कि उसकी गर्दन की नसें बाहर उभर आईं।

"आआआआआआआहहहहहहह!!!"

कमरे में सिर्फ़ झटकों की खौफनाक गूंज थी—बिजली की चीखती आवाज़ और हड्डियों के अंदर तक घुसते दर्द की दहशत।

लड़की की आँखें अब स्थिर हो गई थीं, होंठ ज़ोर से फड़फड़ा रहे थे, मगर उसमें अब शब्दों की ताकत नहीं थी।

फर्श पर उसकी नाक से टपकता लाल खून।

"बस... बंद करिए..." सुनीता ने हकलाते हुए कहा।

"एक और।" डॉक्टर का आदेश आया।

"लेकिन—"

"स्विच ऑन करो!"

चर्रररररररर!!!

लड़की के शरीर ने एक आखिरी, असंभव-सा झटका लिया। उसकी पीठ पूरी तरह ऊपर उठ गई, उसकी गर्दन अजीब से कोण पर झुक गई। उसकी आँखें सफेद हो चुकी थीं, चेहरा पीला पड़ गया था।

लेकिन तभी...

उसकी खुली आँखों में हलचल हुई।


वह खौफनाक तरिके से हंस रही थी।

धीमे... ठंडी... सिहरन-भरी हंसी।

सुनीता ने कांपते हुए पीछे देखा।

लड़की की टूटी-फूटी आवाज़ में गूँजता ठहाका किसी अनदेखी ताकत का संकेत था।

डॉक्टर शर्मा की आँखें सिकुड़ गईं।

लड़की की पुतलियाँ धीमे-धीमे ऊपर उठीं।

और फिर—

कमरे की सारी बत्तियाँ झपककर बंद हो गईं।

सुनीता की साँसें थम गईं।

डॉक्टर शर्मा ने कदम पीछे खींचा, लेकिन तभी...

लड़की का शरीर फिर से झटके से हिला—मगर इस बार किसी बिजली के कारण नहीं।

उसकी पीली आँखें चमक उठीं, और इसका चेहरा भाव शून्य हो गया कमरे में अब सिर्फ़ एक डरावनी, भयानक खामोशी थी...



उसे देखकर डॉक्टर शर्मा ने कहा।

" इसे अपने कमरे में ले जाओ और दरवाजा अच्छे से बंद करो या काफी खतरनाक है।"

 डॉक्टर शर्मा गाड़ी से अपने घर के लिए निकले, बाहर काफी तेज बारिश हो रही थी।



****



अस्पताल की लंबी, ठंडी गलियों में स्ट्रेचर की पहियों की चरमराहट गूँज रही थी। सुनीता और दो वार्ड बॉय उस लड़की को उसके कमरे में वापस ले जा रहे थे। उसकी पतली, सूखी काया अब भी हल्के झटकों से कांप रही थी।

बाहर घनघोर बारिश हो रही थी। अस्पताल की पुरानी, जंग लगी खिड़कियों से पानी की धारें अंदर तक आ रही थीं। बिजली की कड़कड़ाहट से पूरी इमारत थर्रा रही थी, और हर चमकदार बिजली की गूँज पर कुछ मरीज अपने बिस्तरों में सिहर जाते, कुछ सोते रहते, तो कुछ बड़बड़ाने लगते—

"आ रहे हैं... आ रहे हैं... हमें लेने आ रहे हैं!"

सुनीता ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। वह बस जल्दी से काम खत्म कर यहाँ से निकल जाना चाहती थी।

वे स्ट्रेचर को एक संकरी गली से ले जाते हुए कमरे नंबर 313 के सामने रुके। लोहे का पुराना दरवाजा जंग खा चुका था, और उस पर पहले से लगे गहरे नाखूनों के निशान अब और भी भयावह लग रहे थे।

वार्ड बॉय ने दरवाजा खोला, और सुनीता ने लड़की के निश्चल देह को बेड पर रखा। उसकी आँखें खुली थीं, मगर उनमें कोई जीवन नहीं दिख रहा था। वह सीधे छत को घूर रही थी, जैसे कुछ देख रही हो।

"अरे! ये फिर हंस रही है!"

सुनीता ने पलटकर देखा। लड़की के सूखे, फटे होंठों पर एक हल्की, अजीब-सी मुस्कान थी।

"चुप हो जा, ज़्यादा मत सोच," दूसरे वार्ड बॉय ने फुसफुसाया।

जल्दी से उन्होंने उसके हाथों और पैरों की पट्टियाँ खोल दीं, लेकिन सिर को पकड़ने वाली पट्टी अभी भी बंधी थी।

"अब चलो," सुनीता ने ठंडे स्वर में कहा।

वे सभी कमरे से बाहर निकले। दरवाजा ज़ोर से बंद कर दिया गया, और मोटे लोहे के लॉक को खटका लगा दिया गया।

बारिश और तेज़ हो गई थी। बिजली लगातार कड़क रही थी। अस्पताल के भीतर मौजूद छायाओं में अंधेरा और घना होता जा रहा था।

मेंटल असाइलम के अंधेरे कमरे में हल्की रोशनी झूल रही थी। सफेद दीवारों के बीच सफेद चादर से ढका लोहे का बेड… और उस पर पड़ी एक लड़की—निर्जीव, बेहोश, मगर उसकी आँखों के भीतर एक तूफान उमड़ रहा था।

सिर्फ उसकी आँखें ही जानती थीं कि इस घुटन भरी चुप्पी के पीछे कितनी चीखें दबी हैं।

उसका शरीर यहाँ पड़ा था, लेकिन दिमाग में वह बातें गूँज रही थी

'ये लड़की पागल है, वो दिमागी मरिज है। ऐसे पेशंट समाज के लिए ख़तरनाक साबित हो सकते हैं, जजसाहब, इसे जल्द से जल्द सरकारी खर्चे पर किसी मेंटल हॉस्पिटल में भर्ती किया जाय। ताकी किसी और की जिंदगी बर्बाद ना हो'

****

क्रमश: