दोनों पुरुष कर्मचारियों ने एक-दूसरे की ओर कुटिल मुस्कान से देखा और मोनालिसा की पर नजर डाली।
''आज तो मजा आयेगा''
और बाहर खडी सुनीता से कहा।
" चलो , तुम जाओ हम बाकी का काम संभाल लेंगे "
सुनीता भी रुकना नहीं चाहती थी बगैर पीछे मुड़े वह अपने कमरे की तरफ चलने लगी। बाहर तेज होती बारिश और बिजली की चमक दिल में खौफ पैदा कर रही थी। सन्नाटे में डूबे उस मेंटल एसाइलम में किसी मरीज के चिखने की आवाज से वह एकदम से डर जाती। तेजी से कदम बढ़ाते हुए वह अपने कमरे में दाखिल हुई और दरवाजा बंद कर लिया। गहरी सांस ली। आज पहली बार उसे डर लग रहा था। वह अपने बेड पर बैठ गई और टेबल पर रखी पानी की बोतल उठाई तभी पता चला की कमरे की चाबियां तो वह अपने साथ ले आई है। दो घूंट पानी पीकर वह दोबारा अपने बेड़ से उठी और दरवाजा खोलकर बाहर देखा। बाहर जानलेवा सन्नाटा फैला था। पर वह चाबियां लेकर वार्ड से चलते हुए मोनालिसा के कमरे के तरफ जाने लगे जहां वे दो कर्मचारी थे। कमरे के पास पहुंचकर जैसे उसने भीतर झांक कर देखा वह सन्न रह गई।
"क्या कर रहे हो तुम लोग ?"
एक कर्मचारी मोनालिसा के मृत शरीर के साथ गंदी हरकत कर रहा था। उसे इस तरह देख सुनीता गुस्से में बोली।
"तुम्हारी गंदी हरकतों के बारे में मुझे पहले से पता था। लेकिन अब मैं डॉक्टर साहब को सारी बातें बता दूंगी। "
सुनीता कुछ कहने ही वाली थी कि तभी किसी चीज़ ने उसके सिर पर ज़ोर से वार किया, वह वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी। उसके पीछे दुसरा कर्मचारी खड़ा था।
"अरे इसे मार क्यों ? समझ कर चुप कर दे देना ?"
" तुम्हें लगता है ये समझाकर चुप हो जाती ?"
"पर होश में आते ही वह सारी बातें डॉक्टर को बता देगी।"
"इसका भी सर दीवार पर दे मारते हैं। सुबह बता देंगे कि मोनालिसा ने पागलपन के दौर में सुनिता का सर फोड़ दिया और खुद भी अपना सर पटक पटक कर मर गई।"
'' ये ठीक रहेगा.... चलो इसे साईड में रख दो।''
एक कर्मचारी दूसरे से बोला—
"आज तो मज़ा आयेगा"
दूसरा कर्मचारी सिर हिलाते हुए बोला—
"तू शराब की बोतल लेकर आ, मैं गाड़ी से कुछ सामान लाता हूँ।"
दोनों पुरुष कर्मचारी कमरे से बाहर निकले और कमरा बंद कर दिया।
******
मोनालिसा की लाश अब भी वैसे ही पड़ी थी, मगर उसकी एक उँगली धीरे-धीरे हिल रही थी...
कमरे के बाहर बारिश और तेज़ हो चुकी थी। बिजली की गड़गड़ाहट से हर बार अंधेरा और भी डरावना लगने लगता।
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तेज़ बारिश की बूँदें लोहे के शेड पर गिर रही थीं, हर बूँद जैसे घड़ी की सुइयों की तरह किसी अनहोनी का इशारा कर रही थी। ठंडी हवा में घुली सीलन और फफूंदी की गंध पूरे मेंटल असाइलम को और भी डरावना बना रही थी।
पहला कर्मचारी पार्किंग लॉट की तरफ बढ़ रहा था। हर कदम के साथ उसके जूतों की आवाज़ भीगती ज़मीन पर हल्की-हल्की गूंज रही थी। पर बीच-बीच में उसे ऐसा लग रहा था जैसे उसकी आवाज़ में एक और आवाज़ मिल रही हो—किसी और के कदमों की आहट।
उसने झटके से सिर घुमाया।
कोई नहीं था।
उसने लंबी साँस खींची और आगे बढ़ने लगा, लेकिन...
"छप........छप.........."
वही आहट।
अबकी बार वह रुका नहीं, बल्कि अचानक से मुड़कर पीछे देखा—
खाली गलियारा।
सिर्फ दीवारों पर पानी की बूँदें टपक रही थीं और दूर जलता हुआ बल्ब मंद-मंद झपक रहा था।
"शायद मेरा भ्रम है," उसने खुद को समझाया और तेज़ी से कदम बढ़ाने लगा।
पर जैसे ही वह एक कोने के पास पहुँचा, उसके दाएँ कान में किसी के धीरे से फुसफुसाने की आवाज़ आई।
"रुक जा..."
उसका खून जम गया।
उसने घबराकर इधर-उधर देखा, पर वहाँ कोई नहीं था।
तेज़ी से साँस लेते हुए वह पार्किंग में पहुँचा और अपनी गाड़ी की डिक्की खोली। जैसे ही उसने अंदर से कंडोम का पैकेट निकाला और जेब में डाला...
कुछ सरसराने की आवाज़ आई।
उसने नज़र उठाई—
सामने दीवार के कोने में एक परछाई खड़ी थी।
उसका काला ढांचा एक इंसान की तरह दिख रहा था, मगर उसकी आँखें सुर्ख लाल थी—जैसे सुलगता हुआ अंगारा।
उसका शरीर जम गया।
उसका गला सूखने लगा।
वह आकृति हिली नहीं। वह बस वहीं खड़ी थी—उसे देखती हुई।
" कौन है वहां..?"
आखिर हिम्मत जुटाकर वह धीरे-धीरे उस आकृति की ओर बढ़ा, पर जैसे ही वहाँ पहुँचा...
वहाँ कुछ नहीं था।
बस भीगी दीवार और नीचे गिरती पानी की बूँदें।
हवा ठंडी हो गई थी। इतनी ठंडी कि उसके हाथ-पैर सुन्न होने लगे।
उसने घबराकर खुद को झटका दिया और तेज़ी से अस्पताल की ओर भागा।
दूसरा कर्मचारी असाइलम के स्टोर रूम में घुस चुका था।
अंदर आते ही उसने दरवाजा बंद कर लिया।
लेकिन...
उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
उसे साफ़-साफ़ एहसास हुआ कि कोई दरवाजे के बाहर खड़ा उसे देख रहा हैी। किसी के कदमों की आहट महसूस हो रही थी।
वह घबराकर पलटा और दरवाजा खोलकर धीरे से बाहर झाँककर देखने लगा। पर खामोशी से घिरे उस सुनसान गलियारे में कोई नहीं था।बस टिमटिमाता हुआ बल्ब, जो झपक-झपक कर बंद होने की कगार पर था।
"ये क्या हो रहा है मुझे?" वह बुदबुदाया।
उसने अपना डर झटकते हुए स्टोअर रूम में एक अलमारी के अंदर रखी अपनी शराब की बोतल खोजनी शुरू की।
लेकिन...
बोतल वहाँ नहीं थी!
"ये क्या हो रहा है ? मैंने तो यहीं रखी थी!"
वह तेजी से इधर-उधर देखने लगा।
तभी
'खट्ट!
पीछे से एक कांच की बोतल नीचे गिरकर टुकड़ों में बिखर गई।
उसका दिल ज़ोर से उछला।डर के मारे उसने तेज़ी से पलटकर देखा। पर वहाँ कुछ नहीं था। लेकिन उसकी टूटी हुई बोतल के टुकड़े ज़मीन पर बिखरे थे।
और... तभी किसी के कदमों के आहट उसके कानों पर पड़ी, शायद स्टोर रूम के भीतर उसके अलावा और कोई मौजूद था।
" अरे अजय.. वहां तु है क्या ? "
पर कोई जवाब नहीं आया। लोहे के बड़े बड़े रॅक के बीच से चलते हुए वह देखने लगा पर से कोई नजर नहीं आ रहा था।
तभी उसकी नज़र कुछ दूर दरवाजे के पीछे रखी लकड़ी की अलमारी के शीशे पर गई। थोड़ा अंधेरा होने की वजह से साफ नजर नहीं आ रहा था पर किसी की परछाई उसे शीशे में दिखाई दे रही थी । वह साया उसी को देख रहा था।
" अजय। वहां क्या कर रहा है।"
चलते हुए वह उसे अलमारी के पास पहुंचा तो कोई नहीं था। वह सोच में पड़ गया।
" शीशे में वह परछाई किस की थी।"
पर अलमारी के उसे खुले दरवाजे के भीतरों एक बड़ी शराब की बोतल दिखाई दी।
' ये किस की बोतल है। ? किसकी भी हो अपने को क्या ?"
उसने शराब की बोतल उठाई और अपनी जेब में जबरन घुसेड़ने लगा।
क्रमशः