अध्याय 7: द्वार का प्रलय और वसुंधरा का क्रोध
लौरा का नाम वसुंधरा के कानों में किसी खंजर की तरह चुभा। वह शिष्या, जिसे उन्होंने अंधेरे से लड़ना सिखाया था, आज खुद अंधेरे की गोद में जा बैठी थी।
आचार्य विक्रम के आदेश पर जैसे ही द्वारपालों ने भारी जंजीरें खींचीं, गुरुकुल के विशाल किवाड़ एक भयानक चरमराहट के साथ खुल गए। बाहर रात का घना अंधेरा और कोहरा था, लेकिन उस धुंध को चीरती हुई एक आकृति बिजली की तरह भीतर प्रविष्ट हुई। वह आचार्या वसुंधरा थीं।
उनके चेहरे पर वह शांति नहीं थी जो आमतौर पर कन्या गुरुकुल की प्रधान के चेहरे पर होती है। उनकी आँखें क्रोध से लाल थीं और उनके हाथों में वही काला लबादा था जिसे देखकर पूरी सभा कांप उठी थी। उनके पीछे कन्या गुरुकुल की दो अंगरक्षिकाएँ मशालें लिए खड़ी थीं, जिनकी रोशनी वसुंधरा के तमतमाए हुए चेहरे को और भी भयानक बना रही थी।
आचार्या वसुंधरा: (गरजते हुए) "महागुरु! कहाँ है आपका वह प्रिय शिष्य रुद्र? और कहाँ है वह मर्यादा जिसका ढिंढोरा आप बरसों से पीट रहे हैं?"
विक्रम और अन्य आचार्य उनकी इस अचानक और उग्र उपस्थिति से स्तब्ध रह गए। वसुंधरा सीधे महागुरु के सामने जाकर खड़ी हो गईं।
आचार्या वसुंधरा: "आपके छात्र ने मेरे गुरुकुल की पवित्रता को दागदार किया है! रुद्र ने वर्जित सीमाओं को लांघा है। वह न केवल यहाँ से भागा है, बल्कि उसने मेरे कन्या गुरुकुल की मर्यादा पर भी प्रहार किया है। विक्रम, जिस रुद्र को तुम यहाँ ढूँढ रहे हो, उसकी परछाईं अब उन शापित रास्तों पर है जहाँ मौत का वास है!"
महागुरु कुछ कहना चाहते थे, पर वसुंधरा का क्रोध किसी तूफ़ान की तरह था।
आचार्या वसुंधरा: (आवाज़ में कड़वाहट और दर्द समेटे हुए) "रुद्र का लौरा को इस तरह ले जाना पूरी तरह गलत है! क्या मेरी अनुमति के कोई मायने नहीं थे? क्या उस लड़के के लिए मुझसे पूछना भी गवारा न था? क्या उसने यह मान लिया कि कन्या गुरुकुल की शिष्याएँ उसकी जागीर हैं जिन्हें वह जब चाहे इस विनाश की आग में झोंक सकता है?"माधव का बयान और भयानक खुलासा
माधव, जो अब तक अंधेरे कोने में दुबका हुआ था, आचार्या वसुंधरा की आवाज़ सुनकर बाहर आया। वह बुरी तरह कांप रहा था।
माधव: "आचार्या... अनर्थ इससे कहीं बड़ा है। आप जिस रुद्र पर क्रोध कर रही हैं, वह... वह अकेला नहीं गया है।"
वसुंधरा: (पैनी नज़रों से देखते हुए) "क्या मतलब है तुम्हारा? साफ़-साफ़ कहो!"
माधव: "रुद्र ने उस रात मुझसे कहा था कि 'रक्त-शिला' को जाग्रत होने के लिए एक योद्धा का लहू और एक शुद्ध चेतना चाहिए। उसने आपकी सबसे प्रिय शिष्या लौरा को अपने साथ चलने के लिए मना लिया है। वे दोनों पिछले कई दिनों से गुप्त रूप से मिल रहे थे और अब... वे दोनों उसी शापित 'रक्त-शिला' की ओर जा चुके हैं।"
लौरा का नाम सुनते ही आचार्या वसुंधरा के चेहरे का रंग उड़ गया। उन्हें अभी तक यह अंदाज़ा नहीं था कि उनकी अपनी परछाईं, उनकी सबसे प्रिय शिष्या लौरा, उस नर्क की ओर बढ़ चुकी है।
आचार्या वसुंधरा: (एक गहरी और डरी हुई आवाज़ में) "लौरा? मेरी लौरा? नहीं... रुद्र उसे वहां नहीं ले जा सकता! रक्त-शिला की प्यास बुझाने के लिए वह मेरी बच्ची का इस्तेमाल कर रहा है?"क्लिफहैंगर: पुकार और बदलता सौदा
अभी आचार्या वसुंधरा संभली भी नहीं थीं कि गुरुकुल की दीवारों के बाहर से एक जानी-पहचानी चीख गूँजी। वह लौरा की आवाज़ थी, पर उसमें कोई मानवीय दर्द नहीं था, बल्कि एक ऐसी पुकार थी जो किसी को भी सम्मोहित कर ले।
माधव चीख उठा— "द्वार मत खोलना आचार्य, वह अब लौरा नहीं है!"
तभी महागुरु ने अपनी थरथराती उंगली उस काले लबादे पर लिखी इबारत की ओर उठाई। जैसे-जैसे मशाल की रोशनी उस पर पड़ी, रक्त से लिखा रुद्र का नाम धीरे-धीरे धुंधला होकर गायब होने लगा और उसकी जगह एक नया नाम उभरने लगा— 'लौरा'।