ruho ka soda - 3 in Hindi Fiction Stories by mamta books and stories PDF | रूहों का सौदा - 3

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रूहों का सौदा - 3

​दूसरी ओर... गुरुकुल का श्मशान सा सन्नाटा

​गुरुकुल के भीतर, तबाही के निशान और भी गहरे थे। आचार्य विक्रम और आचार्या वसुंधरा मलबे के बीच खड़े उन शिष्यों को देख रहे थे जिन्होंने वीरता से लड़ते हुए अपने प्राण त्याग दिए थे। पूरे परिसर में मंत्रों की गूँज की जगह अब सिसकियों ने ले ली थी। महागुरु, जो हमेशा अडिग रहते थे, आज उस मुख्य द्वार की चौखट पर ऐसे बैठे थे जैसे कोई पुराना किला ढह गया हो।

 खंडहरों का न्याय और पुराना हिसाब

​​"रुद्र ने कांपते हाथों से उस ताबीज को उठाया, जिसकी धातु रात की ओस में और भी ठंडी लग रही थी। लेकिन उस ताबीज की ठंडक से उलट, उसके दिल में एक आग सुलग रही थी। वह मुड़ा और दूर पहाड़ी पर जलते हुए गुरुकुल की ओर देखा, जहाँ से अब भी धुएं की काली लकीरें आसमान का सीना चीर रही थीं।

​अतीत की वह काली रात (फ्लैशबैक)

​रुद्र को उस ताबीज को देखते ही महागुरु और आचार्य केदार के बीच का वह पुराना टकराव याद आ गया। उसे याद आया कि कैसे बरसों पहले, जब वह पहली बार इस गुरुकुल में आया था, तब आचार्य केदार ने महागुरु का रास्ता रोक लिया था।

​"महागुरु! रुकिए!" केदार की वह आवाज़ आज भी रुद्र के कानों में गूँज रही थी। उसे याद था कि कैसे केदार ने उसे 'रूहों का सौदा' और 'अभागा अंश' कहा था। उसे वह पल भी याद आया जब उसने केदार के वस्त्र छुए थे और वे नफ़रत से पीछे हट गए थे। केदार की वह चेतावनी आज हकीकत बन चुकी थी— "जिस दिन उस 'सौदे' की मियाद पूरी होगी, यह गुरुकुल श्मशानों की राख में तब्दील हो जाएगा        

 विशाल गुरुकुल की कठोर प्रतिध्वनि

​हिमालय की तलहटी में बसा 'विशाल गुरुकुल' केवल पत्थरों और लकड़ियों से बना ढांचा नहीं था; वह मर्यादा और अनुशासन का एक जीवित प्रतीक था। जब भोर की पहली किरण बर्फीली चोटियों को छूती, तो गुरुकुल की ऊँची दीवारों पर लगा विशाल ताम्र-घंटा बज उठता था। उसकी गूँज इतनी गहरी थी कि वह केवल कानों में नहीं, बल्कि छात्रों की आत्माओं में उतर जाती थी। यह गूँज एक चेतावनी थी कि प्रमाद (आलस्य) के लिए यहाँ कोई स्थान नहीं है।​मर्यादा का अदृश्य विभाजन

​गुरुकुल के दो मुख्य भाग थे, जिन्हें 'उत्तर परिसर' और 'दक्षिण परिसर' कहा जाता था। उत्तर परिसर लड़कों के लिए था और दक्षिण परिसर लड़कियों के लिए। इन दोनों के बीच केवल एक ऊँची दीवार ही नहीं थी, बल्कि वर्षों से चली आ रही एक अटूट परंपरा और कड़े नियम थे। छात्रों और छात्राओं के मार्ग इस तरह निर्धारित थे कि वे कभी एक-दूसरे के सम्मुख न आ सकें। भोजन कक्ष से लेकर अभ्यास के मैदान तक, सब कुछ पूरी तरह अलग और स्वतंत्र था।

​यहाँ तक कि हवा में तैरने वाले मंत्र भी दोनों ओर अलग-अलग ध्वनियों में गूँजते थे। यह अलगाव केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक भी था ताकि ब्रह्मचर्य और एकाग्रता में रत्ती भर भी विचलन न आए।​पत्थर सा कठोर अनुशासन

​गुरुकुल के मुख्य मैदान की मिट्टी लाल थी, जिसे हर सुबह छात्र अपने पसीने से सींचते थे। मैदान के एक कोने पर आचार्य द्रोणवत खड़े थे, जिनकी आँखें बाज़ की तरह तेज़ थीं। उनके सामने तीन सौ छात्र एक ही लय में 'शस्त्र-अंग संचालन' कर रहे थे।

​"पैर की स्थिति स्थिर! दृष्टि केवल लक्ष्य की ओर!" आचार्य की कड़क आवाज़ गूँजी।

​नियम इतने सख्त थे कि यदि कोई छात्र अभ्यास के दौरान पलक भी झपकाता या उसके पैर की दिशा एक इंच भी भटक जाती, तो उसे उसी क्षण मैदान के बाहर कर दिया जाता था। दंड के रूप में उसे ठंडे जल के कुंड में घंटों खड़े रहना पड़ता था। यहाँ मौन का शासन था। केवल शस्त्रों के टकराने की 'खन्न-खन्न' और छात्रों की संयमित श्वास की आवाज़ सुनाई देती थी। किसी को भी बिना अनुमति के एक शब्द भी बोलने का अधिकार नहीं था।​एक रहस्यमयी उपस्थिति

​इतनी कठोरता और सैंकड़ों छात्रों की भीड़ के बीच भी, एक स्थान ऐसा था जहाँ अनुशासन और प्रतिभा का एक अद्भुत मिलन दिखता था। कतार के सबसे अंत में, एक किशोर पूरी तन्मयता से अपनी लकड़ी की तलवार घुमा रहा था। उसकी गति इतनी तीव्र थी कि तलवार केवल एक धुंधली परछाईं की तरह दिख रही थी।

​आचार्य की नज़रें उस पर रुकीं। वे जानते थे कि इस लड़के के भीतर कुछ ऐसा है जिसे ये दीवारें रोक नहीं पाएंगी। लेकिन फिलहाल, 'विशाल गुरुकुल' का यह अभेद्य अनुशासन ही उसकी दुनिया थी।

​गुरुकुल के नियम जितने शांत दिखते थे, उनके पीछे उतना ही बड़ा रहस्य छिपा था। किसी को नहीं पता था कि आज की यह शांति कल एक ऐसे तूफान में बदलने वाली है जो इन सदियों पुरानी मर्यादाओं को चुनौती देने वाला था।