मुंबई कभी नहीं सोती.
रात के तीन बजे भी इसकी सडकों पर जिंदगी बहती रहती है—कभी रोशनी बनकर, कभी साए की तरह.
आकृति मेहता इन्हीं सायों में खडी थी.
दुनिया की नजरों में वह आज भी वही थी—
मुंबई की रहने वाली एक साधारण Collage गर्ल.
खुले बाल, हल्की मुस्कान, और आँखों में सपने.
वही लडकी जो कभी शीशे के सामने खडी होकर फिल्मी डायलॉग्स बोला करती थी.
वही लडकी जो Collage के हर फेस्ट, हर ड्रामा में सबसे आगे रहती थी.
जिसकी खूबसूरती और एक्टिंग के चर्चे पूरे Collage में थे.
लेकिन उस मुस्कान के पीछे अब कुछ और था.
कुछ ऐसा, जिसे कोई देख नहीं सकता था.
उसके पिता—रणविजय मेहता.
एक सख्त, ईमानदार और नामी पुलिस अफसर.
रणविजय मेहता के लिए दुनिया दो हिस्सों में बँटी थी—
कानून और अपराध.
और आकृति का सपना.
उस दुनिया में कहीं फिट नहीं बैठता था.
एक्ट्रेस?
रणविजय की आवाज में हमेशा तिरस्कार होता.
ये सब दिखावा है आकृति. अगर कुछ बनना है तो पुलिस बनो. इज्जत, ताकत और सच—सब यहीं है।
लेकिन आकृति के लिए ये शब्द दीवारों जैसे थे.
उसे लगता था उसके पिता उसके सपनों के सबसे बडे दुश्मन हैं.
वह नहीं जानती थी.
कि वही पिता उसकी जिंदगी की सबसे बडी वजह बनने वाले हैं.
दो साल पहले की बात है.
एक आम सी रात.
मुंबई में बारिश हो रही थी.
रणविजय मेहता अपनी गाडी में घर लौट रहे थे.
तभी एक सिग्नल पर.
अंधेरे से गोलियों की आवाज गूँजी.
सब कुछ कुछ सेकंड में हुआ.
काँच टूटा.
खून बिखरा.
और रणविजय मेहता जमीन पर गिर पडे.
हमला करने वाला कोई आम अपराधी नहीं था.
यह एक सुनियोजित हमला था—अंडरवर्ल्ड की भाषा में दिया गया एक संदेश.
जब आकृति को अस्पताल बुलाया गया,
तो उसकी दुनिया वहीं रुक गई.
उसने पहली बार अपने पिता को इतना कमजोर देखा.
मशीनों से जुडा हुआ.
जिंदगी और मौत के बीच झूलता हुआ.
और उसी रात.
आकृति मेहता मर गई.
उसके बाद जो पैदा हुई,
वह कोई Collage गर्ल नहीं थी.
वह बनी—
अंडरकवर एजेंट“ तारा”
सरकारी रिकॉर्ड में उसका नाम कभी दर्ज नहीं हुआ.
ना कोई पहचान,
ना कोई अतीत.
सिर्फ एक मिशन.
उस शख्स तक पहुँचना जिसने रणविजय मेहता पर हमला करवाया था.
अंडरवर्ल्ड में उस आदमी को एक नाम से जाना जाता था—
रुद्राक्ष शेखावत.
मुंबई का ऐसा नाम,
जो सामने कभी नहीं आता,
लेकिन हर बडे अपराध के पीछे वही होता.
ड्रग्स, हथियार, राजनीति और पुलिस—
हर जगह उसकी जडें थीं.
और तारा को उसके पास पहुँचना था.
उसी की दुनिया में रहकर.
आज, दो साल बाद—
तारा फिर से Collage गर्ल बनी हुई थी.
वही आकृति मेहता.
लेकिन अब उसकी आँखें मासूम नहीं थीं.
हर मुस्कान एक मुखौटा थी.
हर दोस्ती एक चाल.
अंडरवर्ल्ड के लिए—
वह सबसे खतरनाक एजेंट थी.
और कानून के लिए—
एक ऐसा हथियार,
जिसका नाम कोई नहीं जानता.
रुद्राक्ष शेखावत को लगता था कि वह सबको कंट्रोल करता है.
उसे नहीं पता था कि
उसके सबसे करीब एक लडकी खडी है.
जो उसकी पूरी दुनिया जला देने आई है.
तारा के Mission का सबसे खतरनाक हिस्सा बंदूक या लडाई नहीं था.
सबसे मुश्किल था—सामान्य दिखना.
मुंबई के अंधेरे हिस्सों में उतरने से पहले उसे रोशनी में जगह बनानी थी.
ऐसी जगह, जहाँ कोई शक न करे.
जहाँ अपराध नहीं, सेवा दिखती हो.
और जहाँ अंडरवर्ल्ड अपने पैसे और रसूख को सबसे सफाई से छुपाता हो.
यही वजह थी कि सोशल वेलफेयर ट्रस्ट उसका अगला पडाव बना.
सहयोग फाउंडेशन”
नाम सुनते ही भरोसा पैदा होता था.
कागजों में यह ट्रस्ट झुग्गी इलाकों के बच्चों की पढाई, महिलाओं के कौशल विकास और नशा मुक्ति अभियान के लिए काम करता था.
लेकिन तारा जानती थी—
अंडरवर्ल्ड को अपने काले पैसों को सफेद करने के लिए ऐसी ही जगहों की जरूरत होती है.
और रुद्राक्ष शेखावत जैसे लोग.
इन्हीं जगहों पर सबसे सुरक्षित होते हैं.
आकृति मेहता के रूप में तारा पहली बार ट्रस्ट के दफ्तर पहुँची.
सादा सूट, बिना मेकअप, बाल हल्के से बंधे हुए.
उसने खुद को आईने में देखा—
आज उसे एजेंट नहीं, एक समाजसेवी दिखना था.
दफ्तर किसी आलीशान इमारत में नहीं था.
लेकिन बहुत ज्यादा साधारण भी नहीं.
दीवारों पर बच्चों की मुस्कुराती तस्वीरें.
काउंटर पर“ सेवा ही धर्म है” लिखा हुआ.
हर चीज इतनी परफेक्ट कि शक होना तय था.
आप आकृति मेहता?
रिसेप्शन पर बैठी लडकी ने पूछा.
हाँ।
तारा ने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया.
इंटरव्यू छोटा था.
बहुत छोटा.
ट्रस्ट की हेड—मीरा देसाई—ने ज्यादा सवाल नहीं पूछे.
ना अनुभव पर जोर दिया,
ना बैकग्राउंड Check की बात की.
बस एक ही सवाल था—
आप ये काम क्यों करना चाहती हैं?
तारा ने पहले से तैयार जवाब नहीं दिया.
उसने सच का सहारा लिया.
क्योंकि मैंने अपने पिता को सिस्टम के लिए लडते हुए टूटते देखा है.
और अब मैं चाहती हूँ कि कुछ लोगों की जिंदगी.
कम से कम थोडी बेहतर हो सके।
मीरा देसाई ने उसे कुछ सेकंड तक देखा.
फिर फाइल बंद कर दी.
आप कल से जॉइन कर सकती हैं।
इतना आसान.
और यही सबसे खतरनाक था.
ट्रस्ट में काम शुरू करते ही तारा को समझ आ गया—
यह जगह जितनी साफ दिखती है,
उतनी है नहीं.
कागजों में हर चीज सही थी.
फंड्स आते थे.
project चलते थे.
लेकिन कुछ नंबर मेल नहीं खाते थे.
कई बार बडी रकम ऐसे इलाकों में खर्च दिखाई जाती थी
जहाँ कोई project था ही नहीं.
कुछ दानदाता ऐसे थे
जिनका नाम कभी सामने नहीं आता था.
और सबसे अजीब बात—
हर महीने एक Meeting होती थी
जिसमें सभी स्टाफ को शामिल नहीं किया जाता था.
तारा को नहीं बुलाया जाता था.
वो समझ गई—
उसे अभी भरोसे के दायरे में नहीं लिया गया है.
वह दिन में समाजसेवी थी.
रात में एजेंट.
रात को वह फाइलों की कॉपी बनाती.
डोनेशन लिस्ट याद करती.
नाम, तारीखें, रकम—सब उसके दिमाग में दर्ज होते जाते.
धीरे- धीरे उसने देखा—
कुछ नाम बार- बार सामने आते थे.
शेल कंपनियाँ.
फर्जी एनजीओ.
और एक नाम, जो हमेशा अप्रत्यक्ष रूप से जुडा रहता—
R. S. Group
पूरा नाम कहीं नहीं लिखा था.
लेकिन अंडरवर्ल्ड में“ R. S. का मतलब साफ था.
रुद्राक्ष शेखावत.
एक शाम ट्रस्ट में एक इवेंट था.
डोनर्स मीट.
बडे लोग आए.
सूट, गाडियाँ, बॉडीगार्ड.
तारा चाय सर्व कर रही थी,
लेकिन उसकी आँखें हर चेहरे को स्कैन कर रही थीं.
और तभी उसने उसे देखा.
वह मंच पर नहीं था.
वह कोने में खडा था.
शांत.
नजरें तेज.
कोई दिखावा नहीं.
लेकिन उसके आसपास खडे लोग.
उससे जरा सा भी ऊपर खडे होने की हिम्मत नहीं कर रहे थे.
तारा का दिल एक पल के लिए तेज धडका.
वही है.
उसका दिमाग चीखा.
रुद्राक्ष शेखावत.
पहली बार इतने करीब.
लेकिन वह जानती थी—
अभी नहीं.
अभी उसे सिर्फ एक मामूली कर्मचारी बनकर रहना था.
रुद्राक्ष की नजर एक पल के लिए उस पर पडी.
एक सेकंड से भी कम.
लेकिन उस नजर में सब कुछ था—
तौलना, परखना, और भूल जाना.
या शायद.
भूलने का नाटक.
उस रात तारा को पहली बार डर लगा.
क्योंकि Mission अब कागजों तक सीमित नहीं था.
वह उस आदमी की दुनिया में आ चुकी थी
जिसने उसके पिता की जिंदगी तबाह की थी.
और अगर वह जरा सी भी चूकी.
तो न कोई आकृति बचेगी,
न कोई तारा.
लेकिन उसी डर के साथ
उसके भीतर एक और चीज भी जगी—
संकल्प.
अब पीछे हटना नामुमकिन था.
सोशल वेलफेयर ट्रस्ट
उसके Mission का हिस्सा बन चुका था.
और यह जगह.
रुद्राक्ष शेखावत तक पहुँचने का दरवाजा थी.
दरवाजा खुल चुका था.
अब बस अंदर जाना बाकी था.