🌑 अध्याय की शुरुआत
उस रात आसमान पर चाँद नहीं था।
या शायद था… लेकिन उसने खुद को छुपा लिया था।
हवेली के पीछे फैला जंगल ऐसा लग रहा था जैसे साँस ले रहा हो। पेड़ों की शाखाएँ हवा में हिलते हुए ऐसे चरमराती थीं मानो किसी पुराने गुनाह की गवाही दे रही हों।
और उसी अँधेरे के बीच—
एक नाम गूंजा।
“आरव मल्होत्रा…”
आवाज़ किसी इंसान की नहीं थी।
वो सीधी उसके दिमाग़ में उतरी थी।
आरव ने झटके से आँखें खोल दीं।
पसीना उसकी गर्दन से बहता हुआ तकिये को गीला कर चुका था। दिल इतनी तेज़ धड़क रहा था कि उसे लगा, अभी छाती फाड़कर बाहर निकल आएगा।
“फिर वही सपना…”
उसने खुद से फुसफुसाकर कहा।
लेकिन ये सिर्फ सपना नहीं था।
वो जानता था।
हर रात वही काली आकृति।
चेहरे पर खोपड़ी जैसा नक़ाब।
जलती हुई आँखें।
और उंगली… जो सीधे उसकी तरफ उठी होती थी।
जैसे कोई कह रहा हो—
“अब बारी तुम्हारी है।”
🕯️ हवेली का सच
आरव पिछले तीन हफ्तों से इस हवेली में रह रहा था।
मल्होत्रा हवेली।
एक नाम, जिसे शहर में डर और लालच—दोनों से याद किया जाता था।
उसके पिता, वीरेंद्र मल्होत्रा, शहर के सबसे ताक़तवर आदमी थे।
बिज़नेस, राजनीति, अपराध—तीनों की रेखाएँ यहाँ आकर धुंधली हो जाती थीं।
और अब…
वीरेंद्र मल्होत्रा मर चुके थे।
कोई बीमारी नहीं।
कोई एक्सीडेंट नहीं।
आत्महत्या।
यही आधिकारिक रिपोर्ट थी।
लेकिन आरव को पता था—
उसके पिता कमजोर नहीं थे।
और आत्महत्या?
ये शब्द उनकी परछाईं को भी छू नहीं सकता था।
🔥 लाल आँखों वाली तस्वीर
आरव बिस्तर से उठा और सीधा उस कमरे की तरफ गया, जहाँ उसे जाने से मना किया गया था।
ताला पहले से खुला था।
कमरे में कदम रखते ही ठंडक उसकी हड्डियों में उतर गई।
दीवारों पर अजीब-सी पेंटिंग्स थीं—
चेहरे… जिनकी आँखें लाल थीं।
मुस्कानें… जो इंसानी नहीं लगती थीं।
कमरे के बीचों-बीच एक बड़ी तस्वीर लगी थी।
एक आदमी।
काले लबादे में।
चेहरे पर खोपड़ी।
और आँखें—
आग की तरह जलती हुई।
आरव की साँस अटक गई।
क्योंकि वो चेहरा…
उसे जाना-पहचाना लगा।
“ये… ये तो…”
उसके होंठ काँपने लगे।
तस्वीर के नीचे लिखा था—
“साया — जो वारिस चुनता है।”
🩸 अतीत का दस्तावेज़
उसी कमरे में एक पुरानी अलमारी थी।
आरव ने उसे खोला।
अंदर एक फाइल रखी थी।
पीली पड़ चुकी थी।
जैसे सालों से किसी ने उसे छुआ ही न हो।
फाइल पर लिखा था—
Project: SAYA
जैसे-जैसे आरव पढ़ता गया, उसकी दुनिया टूटती चली गई।
🔻 ये कोई मिथक नहीं था
🔻 ये कोई कहानी नहीं थी
🔻 ये एक समझौता था
हर पीढ़ी में मल्होत्रा परिवार से
एक वारिस चुना जाता था।
जो—
अँधेरे से सौदा करता
ताक़त पाता
और बदले में…
अपनी आत्मा गिरवी रख देता
वीरेंद्र मल्होत्रा ने भी यही किया था।
और अब…
उनका समय खत्म हो चुका था।
😈 साया की पहली दस्तक
अचानक कमरे की बत्तियाँ बुझ गईं।
ठंडक अब जानलेवा हो चुकी थी।
आरव के पीछे किसी के खड़े होने का एहसास हुआ।
वो मुड़ा नहीं।
वो जानता था—
अगर मुड़ा… तो जो दिखेगा, उसके बाद वो कभी सामान्य नहीं रह पाएगा।
पीछे से वही आवाज़—
“डर क्यों रहे हो, आरव?”
आवाज़ में मुस्कान थी।
ज़हर जैसी।
“तुमने ही तो मुझे बुलाया है… अपने खून से।”
आरव की मुट्ठियाँ कस गईं।
“मैं तुम्हारा हिस्सा नहीं बनूँगा…”
उसने हिम्मत करके कहा।
पीछे से हँसी आई।
धीमी।
भयानक।
“ये तुम्हारे पिता ने भी कहा था।”
🩸 अंत नहीं… शुरुआत
कमरे की दीवार पर अचानक लाल रेखा उभरी।
जैसे किसी ने नाखून से काट दिया हो।
और शब्द बनते चले गए—
“पहला बलिदान चुन लिया गया है।”
आरव की आँखों में डर था।
लेकिन कहीं न कहीं…
एक अजीब-सी आग भी जल उठी थी।
क्योंकि अब वो समझ चुका था—
या तो वो शिकार बनेगा…
या फिर
साया से भी ज़्यादा खौफ़नाक कुछ।