सुबह का समय था।
हल्की धूप आँगन में बिखर रही थी।
चित्रा चुपचाप बैठी, बच्चे को गोद में लेकर
धीरे–धीरे तेल की मालिश कर रही थी।
उसकी उँगलियों में ममता थी,
आँखों में अपनापन,
और दिल में एक सच्चा वादा—
“मैं इस बच्चे को हमेशा सुरक्षित रखूँगी।”
पर दादी सास का दिल…
ममता नहीं, शक से भरा था।
“अरे–अरे! ऐसे मालिश करते हैं!?”
तूफान सी आवाज़ गूँजी।
“ज़रा भी तमीज़ नहीं! बच्चे की हड्डी तोड़ देगी क्या!?”
चित्रा घबरा गई, पर फिर भी धीरे बोली—
“दादी माँ… मैं पहली बार किसी बच्चे को संभाल रही हूँ…
आप बताइए ना, कैसे करूँ?
मैं सीख जाऊँगी।”
पर दादी सास़ के दिल में पिघलने की जगह
और सख़्ती जम गई।
“सीख लेगी!? पहले पति को रखते नहीं बना,
अब मेरे पोते पर प्रयोग करेगी?”
ये शब्द सुनकर चित्र का दिल काँप गया।
पर उसने कुछ नहीं कहा।
बस धीमे से बच्चे को सीने से लगा लिया।
🌼 उसी वक्त
दिव्यम अंदर आया।
चित्रा ने बच्चे को मुस्कुराकर देखा—
“दिव्यम जी… मैंने सोचा है…
इसका नाम दिव्यांश रखें।”
दिव्यम ठिठक गया।
“दिव्यांश?”
चित्रा मुस्कुराई—
“हाँ…
दिव्यम + अंशिका = दिव्यांश
आप दोनों का अंश…
आपके प्यार की आखिरी निशानी।”
दिव्यम की आँखें भर आईं।
उसने धीमे से कहा—
“तुम बहुत नेक दिल की हो, चित्रा।”
लेकिन…
जहाँ प्यार था,
वहीं किसी के दिल में जलन भी जल रही थी।
दादी सास़ के चेहरे पर खीझ उतर आई।
“बहुत जल्दी अधिकार जमा लिया बहू ने!”
उनके मन में शंका पनपने लगी।
“ये लड़की बहुत चालाक है…
पहले रोकर सहानुभूति ले ली…
अब पोते पर कब्ज़ा…
कल को सबकुछ अपने नाम लिखवा लेगी…”
यह सोचकर उनका दिल साफ़ नहीं,
और काला हो गया।
🎭 उधर… जेठानी का खेल चालू था।
वह कमरे में बेचैन घूम रही थी।
“अगर ये बहू ऐसे ही सब का दिल जीतती रही
तो सब खत्म!”
उसकी आँखों में लालच जल रहा था।
“मेरी दो बेटियाँ हैं…
इस घर का मालिक तो वही बेटा बनेगा…
अगर यह बच्चा बच गया…
तो सब इन्हीं के हिस्से में जाएगा!”
उसने मुट्ठियाँ कस लीं।
“नहीं…
ऐसा नहीं होगा।”
वह सीधा दादी सास़ के पास पहुँची।
“दादी माँ, आपसे कुछ कहूँ?”
उसने धीरे से आवाज़ बदली,
बिल्कुल मीठी, बिल्कुल बनावटी।
“मेरी रिश्तेदारी में एक चाची रहती हैं…
उन्हीं के मोहल्ले में चित्रा का ससुराल था…”
दादी सास़ ने तुरंत कान खड़े कर दिए।
“क्या कह रही थीं वो?”
जेठानी ने झूठ बुन दिया।
“कहती थीं…
चित्रा तो बहुत बदज़ुबान थी…
अपने पहले ससुराल में तो
खाना भी खुद पहले खाती थी…
सास को कुछ नहीं देती थी।”
दादी सास़ की आँखें फैल गईं।
“सच!?”
“और तो और…”
जेठानी ने ज़हर और गहरा मिला दिया—
“उसके पति ने नहीं छोड़ा था उसे…
इसने खुद तलाक़ माँगा…
क्योंकि इसको उस घर में रहना ही नहीं था!”
अब बस…
शक की आग ने रूप ले लिया।
“तो ये ऐसी औरत है…!!!”
दादी सास़ दाँत पीसते बोलीं,
“इसलिए तो छोड़ी गई!”
अब चित्रा के लिए घर की दीवारें
और भी संकरी हो गईं।
🌪️ दादी सास़ का तूफ़ान
चित्रा बच्चे को गोद में लेकर बाहर आई
तो दादी सास़ चीख पड़ीं—
“बहुत समझदार बनती हो!?”
“कितना नाटक करती हो!”
चित्रा घबरा गई।
“क्या… क्या हुआ दादी माँ?”
“अब मुझसे मत बनो भोली!”
“तुम्हारा सच मुझे पता चल गया है!”
चित्र की साँस अटक गई।
“कौन सा सच…?”
“कि तुम अपने पहले ससुराल में
बदचलन थीं!”
यह शब्द…
मानों बिजली बनकर गिरे।
चित्र का शरीर काँप गया।
होंठ सूख गए।
गला भर आया।
“नहीं दादी माँ… ऐसा नहीं—”
“चुप!”
दादी सास़ चीखी।
“मुझे मत सिखा!”
“अब समझ में आया…
तेरे पति ने क्यों छोड़ा!”
चित्रा की आँखें भर आईं।
वह काँपते होंठों से बोली—
“दादी माँ…
मेरी गलती सिर्फ इतनी थी…
कि मैंने सहा…
कि मैंने चुप्पी चुनी…”
“लेकिन गलत मैं नहीं थी।”
पर सच्चाई
उन्हें सुननी नहीं थी।
🌧️ चित्रा टूट गई…
पर गिरी नहीं।
वह बच्चे को सीने से चिपकाकर
धीरे से बोली—
“मैं चरित्र साबित नहीं करूँगी…
अपनी सास, समाज और दुनिया के सामने।”
“मेरी सच्चाई मेरे कर्म बोलेंगे।”
दादी सास़ ने मुँह फेर लिया।
जेठानी अंदर ही अंदर मुस्कुराई।
🤍 इतने में दिव्यम आ गया।
उसने सब सुन लिया था।
वह दादी के सामने खड़ा हो गया।
“दादी…
आज पहली बार…
मैं आपके सामने खड़ा हूँ।”
“चित्रा बुरी नहीं है।”
“गलत लोग उसके साथ हुए हैं…
वह किसी के साथ गलत नहीं हुई।”
घरेलू आँगन में
हवा भारी हो गई।
क्या दादी सास़ सच्चाई मानेंगी?
क्या जेठानी की साज़िश और गहरी जाएगी?
क्या चित्रा टूटकर बिखरेगी…
या और मज़बूत बनेगी?