ruho ka soda - 2 in Hindi Fiction Stories by mamta books and stories PDF | रूहों का सौदा - 2

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रूहों का सौदा - 2

 नियति का रक्त-अभिषेक और महाप्रस्थान

कहते हैं कि विनाश से ठीक पहले की खामोशी सबसे डरावनी होती है, लेकिन गुरुकुल की उस रात खामोशी ने आवाज़ दी थी। दीवार पर उभरी वह काली और रहस्यमयी आकृति जब धुंध में विलीन हुई, तो वह अकेले नहीं गई; वह अपने पीछे एक ऐसा ठंडा अहसास छोड़ गई जैसे मौत ने कमरे में कदम रख दिया हो। रुद्र के हाथ की नीली लकीरें अब महज़ निशान नहीं थे, वे उसकी त्वचा के नीचे किसी कैद नाग की तरह छटपटा रहे थे।

​दीवार पर उभरी वह काली और रहस्यमयी आकृति धीरे-धीरे धुंध में विलीन होने लगी, लेकिन उसका जाना किसी आशीर्वाद की तरह नहीं, बल्कि एक आने वाले भयानक श्राप की आहट जैसा था। गुरुकुल के उस लंबे गलियारे में एक ऐसा भारी सन्नाटा पसर गया जो कानों को फाड़ने वाला था। रुद्र वहीं खड़ा रहा, उसकी सांसें तेज थीं और उसकी हथेलियों की नीली लकीरें अब भी उसकी त्वचा के नीचे किसी जीवित अंगारे की तरह धधक रही थीं।

​माधव, जो अब तक खौफ के मारे दीवार से सटा हुआ था, लड़खड़ाते हुए दो कदम आगे बढ़ा। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं। "रुद्र... वह क्या था? क्या वह सच में चली गई या यह हमारी आँखों का धोखा है?" माधव की आवाज़ में थरथराहट साफ़ थी। उसने कांपते हाथों से रुद्र का कंधा पकड़ा, जैसे वह खुद को जमीन पर गिरने से बचा रहा हो।

​रुद्र ने अपनी आँखें बंद कीं और एक लंबी सांस ली। जब उसने आँखें खोलीं, तो उनमें एक अजीब सी गंभीरता थी। "परछाइयाँ तभी हटती हैं माधव, जब असली शिकारी सामने खड़ा हो। मुझे नहीं लगता कि वह गई है... उसने बस अपना काम पूरा कर लिया है। वह हमें सावधान करने नहीं, बल्कि मौत का रास्ता दिखाने आई थी।"

​अभी उनकी यह चर्चा पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक गुरुकुल की बाहरी प्राचीर की ओर से एक ऐसा भयानक धमाका हुआ जैसे कोई विशाल पहाड़ टूटकर गिर पड़ा हो। धमाके की गूँज अभी थमी भी नहीं थी कि चारों तरफ से चीखें और डरावनी सीटी जैसी आवाज़ें रात के सन्नाटे को चीरने लगीं। मशालों की मद्धम और कांपती रोशनी में उन्होंने देखा कि हज़ारों की संख्या में नकाबपोश योद्धा गुरुकुल की ऊंची दीवारों को किसी साये की तरह फांदकर अंदर गिरने लगे हैं।

​उनकी तलवारें साधारण नहीं थीं—उन पर वही नीली आग लिपटी थी जो रुद्र की लकीरों में थी। "हमला! गुरुकुल पर हमला!" रुद्र की दहाड़ पूरे प्रांगण में गूँज उठी।

​यह हमला इतना अचानक और योजनाबद्ध था कि गुरुकुल के प्रहरी संभल भी नहीं पाए। सोते हुए छात्र अपनी कोठरियों से घबराहट और उलझन में बाहर निकले, लेकिन सामने लोहे और मौत का नंगा नाच खड़ा था। रुद्र ने एक पल की भी देरी नहीं की। उसने अपनी म्यान से तलवार निकाली और सीधा उन हमलावरों के दलदल में कूद पड़ा। रुद्र का वह रूप देख आचार्य भी दंग रह गए। वह किसी साधारण छात्र की तरह नहीं, बल्कि स्वयं काल की तरह लड़ रहा था।

​उसकी तलवार की हर काट के साथ नीली चिंगारियां निकल रही थीं और हमलावरों के खून से आँगन की मिट्टी सनी जा रही थी। हमलावरों की तलवारें जब उसकी तलवार से टकरातीं, तो एक रूहानी और कान फाड़ने वाली गूँज पैदा होती। रुद्र एक साथ दस-दस योद्धाओं से लड़ रहा था। उसके कंधे पर एक गहरा घाव हुआ, उसकी जांघ से खून बहने लगा, पर उसे दर्द महसूस नहीं हो रहा था। उसके भीतर की वह 'नीली शक्ति' अब एक ज्वालामुखी बनकर उबल रही थी। वह मुख्य द्वार पर एक अभेद्य दीवार बनकर खड़ा हो गया, क्योंकि वह जानता था कि अगर ये दरिंदे अंदर घुस गए, तो गुरुकुल की यह पवित्र मिट्टी आज मासूमों के लहू से लाल हो जाएगी।

​घंटों तक मौत का यह खेल चलता रहा। जैसे ही सुबह की पहली मटमैली और ठंडी किरण पहाड़ों के पीछे से झाँकने लगी, एक तीखी और रहस्यमयी सीटी की आवाज़ पूरे वातावरण में गूँजी। वह एक संकेत था। वह आवाज़ मिलते ही हमलावर वैसे ही गायब होने लगे जैसे वे आए थे। कुछ घने जंगलों की ओर भागे और कुछ देखते ही देखते धुएं की तरह हवा में विलीन हो गए, अपने पीछे सिर्फ राख, टूटी तलवारें और कटी हुई लाशें छोड़ गए।

​जब युद्ध की धूल बैठी, तो गुरुकुल का दृश्य हृदयविदारक था। वह आँगन जो कभी वेदों और मंत्रों की गूँज से पवित्र रहता था, आज बेगुनाह शिष्यों के खून से लथपथ था। आचार्य विक्रम और स्वयं महागुरु अपनी कुटियों से बाहर आए। सबके चेहरों पर एक ही सवाल तैर रहा था—"ये कौन थे? इन्होंने हमला क्यों किया और बिना कुछ लूटे या किसी को बंदी बनाए अचानक इस तरह क्यों लौट गए?" चर्चाओं में डर, भ्रम और प्रतिशोध की भावनाएं उबल रही थीं। गुरुओं की सभा बैठी, लेकिन कोई नहीं जानता था कि असली निशाना कौन था।

​लेकिन उस भीड़ और उस शोर-शराबे में रुद्र कहीं नहीं था। जब सब लोग आपस में इस तबाही के पीछे के कारण तलाश रहे थे, रुद्र चुपचाप अपनी कोठरी में पहुँचा। उसने बिना किसी शोर के अपनी पुरानी और अब खुरदरी हो चुकी तलवार को अपनी पीठ पर बांधा। उसने एक छोटा सा थैला उठाया जिसमें कुछ सूखी रोटियां और औषधियां थीं। उसने पीछे मुड़कर एक आखिरी बार उस जगह को देखा जिसे वह अपना घर समझता था।

​उसके मन में अब कोई संशय नहीं बचा था। उसे पता था कि यह हमला उसे डराने के लिए नहीं, बल्कि किसी ऐसे गहरे राज को दबाने के लिए किया गया था जिसका सीधा संबंध उसके अतीत से था। वह चुपचाप, अँधेरे का फायदा उठाते हुए गुरुकुल की पिछली दहलीज को पार कर गया। वह निकल पड़ा उस सच का पता लगाने कि आखिर यह हमला किसने सुनियोजित किया था? कौन था वह जो इन रूहानी योद्धाओं को नियंत्रित कर रहा था?

​जैसे ही उसने जंगल के काले सन्नाटे में अपना पहला कदम रखा, पीछे रह गया सिर्फ धुआं उगल रहा गुरुकुल और उसकी वीरता की वह अधूरी दास्तान, जो अब एक महान और खतरनाक सफर में बदलने वाली थी।

जैसे ही रुद्र ने जंगल के काले सन्नाटे में अपना पहला कदम रखा, उसकी नज़र ज़मीन पर पड़े एक टूटे हुए ताबीज पर पड़ी। वह ताबीज ठीक वैसा ही था जैसा उसने अपने बचपन के धुंधले सपनों में देखा था। उसके पैर जम गए और दिल की धड़कन रुक गई। क्या यह हमला महज़ एक इत्तेफाक था, या उन पिताओं का वह अधूरा सौदा अब रुद्र का दरवाज़ा खटखटा रहा था? वह सच की तलाश में निकल तो पड़ा था, पर क्या वह उस सच को सहने के लिए तैयार था जो  उस खौफनाक सुबह से शुरू हुआ था?