उन्हीं में से एक मैं भी था, जो यहाँ तो आ गया था, पर मुझे कुछ भी पता नहीं था कि आगे क्या करना है, क्या पढ़ना है।इसलिए मैंने UPSC की कोचिंग जॉइन की।
मैं नियमित रूप से कोचिंग जाता था।
Regular classes, mock tests, practice—जो एक UPSC aspirant को करना चाहिए, वह सब मैं करता था।
खूब मेहनत की, पढ़ाई में जी-जान लगा दी।
ऐसे ही करते-करते एक साल बीत गया।
Exam की तारीख आ गई थी।
कुछ ही दिनों में मेरी परीक्षा थी, पर मुझे खुद पर confidence था।
Exam वाले दिन मैं परीक्षा देने गया।
इस बार मैंने अपना 100% दिया, क्योंकि पहला साल था और एक अलग सा जोश और उत्साह था।
परीक्षा देने के बाद अब एक महीने में रिज़ल्ट आने वाला था।
उस एक महीने में मैंने पढ़ाई जारी रखी, अपनी English सुधारी, हर चीज़ में सुधार किया।
एक महीने कब बीत गया, पता ही नहीं चला।
आज रिज़ल्ट का दिन था।
मैं खुशी-खुशी रिज़ल्ट देखने गया, पर इस बार भी UPSC clear नहीं कर पाया था, कुछ ही नंबरों से रह गया।
थोड़ा बुरा लगा, पर मैं ठीक था, क्योंकि मुझे पता था कि UPSC कोई आसान परीक्षा नहीं है।
और भी लोग थे जो 2–3 साल से तैयारी कर रहे थे, पर उनके अंक मुझसे कम थे।
उनके लिए बुरा लग रहा था, पर खुद के लिए इतना बुरा नहीं, क्योंकि मैंने अपने हिसाब से इस बार बहुत अच्छा किया था।
मैंने खुद से कहा—“अगली बार सही।”
Result के बाद मैं घर गया।
जाते-जाते मन में घर लौटने की खुशी से ज्यादा सवाल थे—
घर वाले और लोग जब पूछेंगे तो क्या कहूँगा?
उन्हें क्या जवाब दूँगा?
यही सब सोचते-सोचते मैं अपने गाँव पहुँच गया।
सभी लोग मुझे देख रहे थे, क्योंकि मैं गाँव का पहला लड़का था जो UPSC की तैयारी के लिए शहर गया था।
पर जब लोगों को पता चला कि मैं UPSC clear नहीं कर पाया,
तो सब बातें बनाने लगे—
"नहीं निकला।"
"हमने तो पहले ही कहा था, ये सब हम जैसों के लिए नहीं हैं।"
"घर वालों के पैसे बर्बाद कर दिए। हो गया अब शोक पूरा UPSC का।"
हर समय लोग ताने देते, घर वालों का व्यवहार बदल गया था।
पर फिर भी मैंने इन सब बातों को नजरअंदाज किया और एक बार फिर हिम्मत करके UPSC की तैयारी के लिए शहर आया।
पर अब मेरा confidence खो चुका था।
मैं डरता था—लोगों के तानों से, घर की परिस्थिति से, उनकी उम्मीदों से, उनके मेरे प्रति व्यवहार से।
और फिर कोई मुझे guide या support भी नहीं कर रहा था।
यह सब मुझे अंदर ही अंदर तड़पा रहा था।
रात-रात भर जागकर पढ़ता, tension लेता, overthinking करता, पर कभी किसी से कुछ नहीं कहा।
क्योंकि कोई मुझे समझता नहीं था, सब मुझे judge करते थे।
यह सब सोच-सोच कर पढ़ाई अच्छे से नहीं कर पाता, पर फिर भी पढ़ाई करता।
इस बार भी जी-जान से, हर बात भूलकर, मेहनत की।
Exam की तारीख आ चुकी थी।
अगले दिन मेरी परीक्षा थी।
इस बार थोड़ा घबराया हुआ था, पर मेरी तैयारी पूरी थी।
परीक्षा दी, और लगा कि इस बार मेरा selection हो ही जाएगा।
Result आने से पहले मैं घर गया था।
वहाँ लोग पूछ रहे थे—
"क्या हुआ, इस बार हुआ या नहीं?"
"या बस UPSC aspirant ही रह गए?"
घर वाले—"क्या जनाब, इस बार भी fail नहीं होगा ना?"
यह सब सुन-सुनकर मैं हर दिन टूट रहा था।
Relatives और लोगों के तानों से हर रोज़ लड़ता।
हर कोई मुझे याद दिलाता कि मैं हार जाऊँगा।
कुछ महीने ऐसे ही कटे।
फिर वापस हॉस्टल आया।
दो दिन बाद मेरा exam result आने वाला था, और मैं बहुत बेचैन था।
मेरा roommate किसी काम से घर गया हुआ था।
मैं अकेला अपने दुखों के साथ रह गया।
मैं सोचता रहता—क्या होगा मेरा result?
इस बार भी नहीं हुआ तो?
क्या इस बार भी हताश हो जाऊँगा?
दो दिन बाद result आया।
इस बार भी, इतनी मेहनत के बाद, कुछ नंबर से रह गया—UPSC clear नहीं हुआ।
सब लोगों की हँसी, उनके ताने, कमरे के अंधेरे कोने मुझे याद आने लगे।
बस अंधकार ही बचा था।
Anxiety और depression होने लगे।
घर वालों की उम्मीदें, लोगों के ताने, उनकी हँसती हुई आँखें—सिर पर छा गईं।
मैं पागल सा हो रहा था।
कुछ समझ नहीं आ रहा था—
क्या करूँ, क्या न करूँ?
किससे कहूँ कि मेरे साथ क्या हो रहा है?
मैंने खुद को ही खत्म करने के ख्याल सोचना शुरू कर दिया।
यह ख्याल दूर करने —
रूम से बाहर गया, सोचा थोड़ी देर ठंडा लगेगा।
पर वहाँ भी ऐसा लग रहा था जैसे सारे लोग मुझे ही देख रहे हैं, मेरी बातें कर रहे हैं, मुझ पर हँस रहे हैं।
यह सोच-सोचकर मैं और भी depress हो गया।
हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए।
मैं सुन्न सा पड़ गया।
कुछ समझ नहीं आ रहा था।
वापस रूम आते हुए रास्ते में लोग पूछ रहे थे—
"तू तो UPSC कर रहा था ना, आ गया या रह गया?"
इन सवालों और उम्मीदों ने मुझे अंदर से पूरी तरह तोड़ दिया।
मैं सुन्न रह गया।
और फिर—
“मैंने फिर खुद ही को खत्म कर लिया।”
पर मरने के बाद भी इंसान को चैन नहीं मिलता।
लोग तरह-तरह की बातें करते रहते—
"नशा करता होगा।"
"मेहनत ही नहीं की होगी, यहां आकर माँ बाप के पेसो पर मज़े किए होंगे अब नहीं हुआ तो लटक गया।"
"प्यार के चक्कर में पढ़ गया होगा।"
कोई यह नहीं सोचता कि ये कितना टूट चुका था।
इन्हें किसी की जान से कोई मतलब नहीं।
इनको बस किसी की जिंदगी का मज़ाक उड़ाना आता है।
Vansh:- (आँखों में आँसू लिए):
“मैं समझ सकता हूँ भैया।
मैं भी एक aspirant हूँ, पर जो आपने सहा, शायद कोई समझ ना सके।
जो आपने सहा, उसके सामने सब कुछ छोटा लगता है।
सबसे ज्यादा दुख तब होता है—
जब हमारे अपने ही हमें ना समझें।”
Mehul:-
“हाँ, मैं समाज के कारण जो जीवन में बहुत कुछ कर सकता था, वह नहीं कर पाया।
मेरे सपने बस सपने ही रह गए।
इसीलिए मैं समाज और इसकी दोगली सोच से नफरत करता हूँ।”
Vansh :-
“माफ़ करना भैया, पर क्या ये सही है?
लोगों को मारकर अब आपको आपका जीवन वापस मिल जाएगा?
शायद एक और Mehul जो आपकी तरह छोटे घर से बड़े सपने लेकर आया हो,
वह समाज की वजह से नहीं बल्कि आपकी वजह से नष्ट हो गया हो।
क्या आपने कभी सोचा—उन लोगों की क्या गलती थी जिन्हें आपने मारा?
इस सब में जितनी गलती उनकी थी, उतनी ही आपकी भी थी।”
Mehul:-
“Vansh, तुम्हारी बातों ने मुझे अंदर से झकझोर दिया।
मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ कि मेरी वजह से इतनी जानें गईं।
पर मेरी आत्महत्या में मेरी क्या गलती थी?”
Vansh:-
“भैया, आपकी गलती यह थी कि आपने कभी किसी को समझाया नहीं।
किसी को बताया नहीं कि आपके साथ क्या चल रहा है।
खुद ही सब सोच लिया।
शायद अगर आप बताते तो घर वाले समझते, क्योंकि वो तो आपका भला ही चाहते हैं।
यह जीवन आपका था, आप इसे अपने हिसाब से जी सकते थे।”
Mehul:-
“हाँ, वंश… तुमने आज मेरी आँखें खोल दीं।
धन्यवाद मुझे सुनने, समझने और समझाने के लिए।”
पर Vansh के मन में अभी भी एक सवाल था—
Vansh :- (झिझकते हुए):
“भैया, आपने मुझे क्यों छोड़ा?
क्यों आपने मुझे अपनी पूरी कहानी बताई?
दूसरों की तरह मुझे क्यों नहीं मारा?”
Mehul:-
“क्योंकि तुम पहले थे जिसने मुझसे मेरा हाल पूछा,
मुझे समझा और समझाया भी।”
यह सब कहते-कहते Mehul, Vansh को अलविदा कहते हुए सुनहरी रोशनी में हवा में विलुप्त हो गया।
Mehul को मुक्ति मिल गई थी।
सुबह के 6 बज चुके थे।
सूरज निकल गया।
तभी warden और 10–15 लड़के दौड़ते हुए ऊपर आए,
ताला खोला और Vansh को ठीक देखकर खुश हुए।
Vansh ने उन्हें सारी बात बताई जो रात में हुई थी।
सुनकर वे भावुक हुए, पर फिर खुश हुए क्योंकि Mehul को मुक्ति मिल गई थी।
सभी ने Vansh को उठाया और नाचने लगे।
Vansh hostel में hero बन गया।
कुछ महीनों बाद 7th floor को वापस ठीक कर दिया गया।
फिर से वहाँ students रहने लगे।
आज की सुबह कुछ नई थी।
हमें समझना चाहिए—पढ़ाई या सफलता केवल जीवन का एक छोटा हिस्सा है, जीवन नहीं।
Written by –
Yuvraj Singh Chouhan