Pavitra Bahu - 5 in Hindi Moral Stories by archana books and stories PDF | पवित्र बहु - 5

The Author
Featured Books
Categories
Share

पवित्र बहु - 5

घर अब पहले जैसा शांत नहीं रहा था।
अब हर दीवार पर ताने गूँजते थे।
हर सांस पर टोका-टोकी थी।
और हर कदम पर सवाल।
दादी सास घर की दहलीज़ पर बैठी रहतीं और बस नज़र रखतीं—
जैसे चित्रा कोई बहू नहीं, बल्कि कै़दी हो।
“अरे बहू!”
कड़क आवाज गूँजती।
“बच्चे को ऐसे अकेला छोड़ते हैं कहीं? समझ नहीं है तुम्हें?”
चित्रा पलटकर बोल सकती थी…
पर उसने सिर झुका दिया।
आँचल थोड़ा कसकर पकड़ा।
और चुपचाप फिर वही काम करने लगी।
थोड़ी देर बाद फिर आवाज़—
“रसोई ऐसे संभालते हैं?”
“माचिस यहाँ क्यों रखी?”
“चाकू ऐसे छोड़ दिया?”
“अरे तमीज़ नाम की चीज़ है कि नहीं तुममें!?”
हर रोज़…
हर वक्त…
हर साँस…
चित्रा सब सुनती…
सब सहती…
पर कुछ कहती नहीं।
उसे बस इस बात की परवाह थी—
कि वह दिव्यम से किया वादा निभा रही है।
उसने खुद से कहा था—
“मेरे हिस्से का दुख… मैं खुद झेलूँगी।
पर इस घर के लिए… माँ बनूँगी।”
🌸 चित्रा का धैर्य
दिव्यम का छोटा बेटा जब रोता
तो चित्रा उसे सीने से लगाकर सुला देती।
जब वह हँसता,
तो उसका दिल भी थोड़ा-सा जी उठता।
पर दादी सास़…
जैसे यही नहीं देखना चाहती थीं।
“बहुत बन रही है माँ!”
दादी सास़ बुदबुदातीं,
“कितना दिखावा करेगी?”
उधर जेठानी…
आँखों में चाल और ज़हर भरकर
दादी के कानों में फूँक मारती रहती।
“माँ जी… इस पर ज्यादा भरोसा मत करना…”
वह कहती,
“पहले पति ने भी तो इसे छोड़ दिया था… कुछ तो कमी रही होगी ना?”
और बस—
यही सुनकर दादी सास़ तस्वीर पूरी मान लेतीं।
🎭 एक दिन…
घर में सब मौजूद थे।
चित्रा पूजा करके आ ही रही थी।
बाल हल्के भीगे थे।
चेहरा शांत था।
तभी जेठानी ने मौका देख लिया।
वह ज़ोर से बोली—
“सच कहूँ, दादी!
ऐसी औरत को तो पहले ही घर से निकाल देना चाहिए था।”
चित्रा ने चौंककर उसकी ओर देखा।
“पहले पति ने ऐसे ही थोड़ी छोड़ा होगा?
जरूर कोई बड़ी कमी रही होगी…”
दादी सास़ ने भी हामी भर दी।
“हाँ… नालायक होगी!
तभी तो छोड़ी गई!”
ये शब्द
चित्रा के दिल में तीर बनकर धँस गए।
उसने आँखें झुका लीं—
पर इस बार आँसू रुक न सके।
वह धीरे से उठी…
और अपने कमरे में चली गई।
दरवाज़ा बंद करते ही
उसका सब्र जैसे टूट गया।
वह फूट पड़ी।
🌧️ चित्रा का टूटना
“इतनी गलत क्यों होती है हर छोड़ी हुई औरत?”
उसकी सिसकियाँ कमरे की दीवारों से टकरा रही थीं।
“क्यों हर किसी को लगता है…
कि सिर्फ़ औरत ही गलत होती है…?”
उसी वक्त दरवाज़ा खटखटाया गया।
दिव्यम था।
वह अंदर आया।
आवाज़ धीमी, पर भरी हुई—
“चित्रा…”
चित्रा ने चेहरा छुपा लिया।
“दिव्यम जी… मैं सच कह रही हूँ…”
रोते-रोते बोली,
“सबको हमारी गलती दिखती है।”
“जब पति औरत को छोड़ देता है…”
“तो समाज और ससुराल…
सब उससे सवाल नहीं करते…”
“औरत से करते हैं।”
उसकी आवाज काँपी।
“लोग कहते हैं… पति तो भगवान होता है…”
“तो क्या भगवान कभी गलत नहीं हो सकता?”
दिव्यम के दिल में दर्द उतर गया।
उसने हाथ बढ़ाकर उसके कंधे पर रखा।
“मुझे पता है…”
वह धीमे बोला,
“जो उन्होंने कहा… बहुत गलत था…”
“पर तुम अकेली नहीं हो।”
“मैं हूँ तुम्हारे साथ।”
इन शब्दों ने
चित्रा के बैचेन दिल पर मरहम रख दिया।
उसने आँसू पोंछे।
बस चुप बैठ गई।
🌪️ उधर दूसरी तरफ…
साज़िश और गहरी हो चुकी थी।
जेठानी अपने कमरे में इधर-उधर चलते हुए बुदबुदा रही थी—
“ये लड़की धीरे-धीरे सब पर छा जाएगी।”
उसने खिड़की से बाहर झाँका।
तब उसके चेहरे पर खतरनाक मुस्कान आई।
“मेरी दो बेटियाँ हैं…”
“और इस घर का एक ही बेटा— दिव्यम का…”
“अगर यह लड़का बड़ा हो गया…”
“तो सारी संपत्ति उसी की…
और फिर इस बहू की…”
उसकी आँखों में जहरीली चमक थी।
“नहीं… ऐसा नहीं होने दूँगी।”
अब सिर्फ ताने नहीं,
अब चाल चलेगी।
गिराने वाली चाल।
तोड़ने वाली चाल।
उसने मुट्ठी बाँध ली।
“ये चित्र…”
“अब ज्यादा दिन चैन से नहीं रहेगी।”