Boons - 5 in Hindi Mythological Stories by Renu Chaurasiya books and stories PDF | वरदान - 5

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वरदान - 5

बड़ी रानी का दिखावा इतना सधा हुआ था कि छोटी रानी पूरी तरह उसके प्रभाव में आ गई। 

जब भी बड़ी रानी राजवर्धन को अपनी गोद में उठाती, उसे प्यार से खिलाती और उसके लिए चुपचाप उपहार बनवाती, तो छोटी रानी का हृदय भावुक हो उठता।

छोटी रानी" मन ही मन सोचती:
‘वाह! मेरी बड़ी दीदी तो सचमुच मुझसे भी अधिक मेरे पुत्र से प्रेम करती हैं।
मैं तो भाग्यशाली हूँ कि राजवर्धन को ऐसी माँ-सा स्नेह देने वाली संगिनी मिली है।’
वह कई बार बड़ी रानी से कहती भी—
“दीदी, आप तो सचमुच मेरे बेटे को मुझसे भी अधिक दुलार देती हैं। कभी-कभी मुझे लगता है कि राजवर्धन आपका ही बेटा है।”
यह सुनकर बड़ी रानी मधुर मुस्कान के साथ उत्तर देती—
“बहन, वह तो हम सबका बेटा है। पूरे राज्य का बेटा है। तुम क्यों चिंता करती हो? तुम्हारा बेटा मेरा बेटा है।”
छोटी रानी यह सुनकर भावुक हो जाती और निश्चिंत हो जाती कि बड़ी रानी के रहते उसके पुत्र को कोई नुकसान नहीं होगा।
बड़ी रानी की मुस्कान अब और भी मीठी, पर ह्रदय और भी कठोर हो चला था।
उसने धीरे-धीरे और चतुराई से योजनाएँ अंजाम देने शुरू कर दिए।
कभी रसोई के व्यंजनों में सूक्ष्म-सा विष मिला देती, कभी राजा के शीतल जल में नशीला अर्क घोल देती — ऐसा कि अक्सर उसका स्वाद या गंध बदल जाए और किसी को संदेह न हो।
सब कुछ बड़ी सूक्ष्मता से होता; वह कभी एक बार, कभी कुछ बूंदें ही देती, ताकि प्रभाव धीरे-धीरे और बिना दिखे पड़ सके।
राजा, जो पुत्र और परिवार की खुशियों में मग्न थे, छोटे-छोटे ऐंठन, हल्की कमजोरी और कभी-कभी गहरी थकान को जीवन की भागदौड़ समझ लेते। उनकी आँखों में तंद्रा के क्षण बढ़ने लगे, पर वे इसे गंभीरता से न लेकर आराम करने लगते।
महल के कुछ सेवक और वैद्य इन बदलती तासीर को महज बुड़ापा या थकावट समझने लगे, क्योंकि बड़ी रानी ने सावधानी से हर बात का प्रबंध कर रखा था—दाइयाँ चुप रहीं, रसोइए बदल दिए गए और शक की कोई खुरचन पैदा न होने दी गई।राजमहल का कक्ष।
राजा बिस्तर पर लेटे हैं। चेहरा पीला, शरीर कमज़ोर और साँसें भारी।
छोटी रानी उनके पास बैठी आँसू बहा रही है। बड़ी रानी पास खड़ी गंभीर मुद्रा में है।
राजकुमार राजवर्धन अभी खेल की उम्र का है और अपनी माँ की गोद में सिमटा हुआ है।
राजा ,कमज़ोर स्वर में
“रानी… खाँसते हुए
,मुझे लगता है कि अब मेरा शरीर साथ नहीं देगा। समय बहुत कम बचा है।”
छोटी रानी ..आँखों में आँसू भरकर
“नहीं महाराज! ऐसा न कहिए।
आप ठीक हो जाएँगे। वैद्य लोग कह रहे हैं कि आप स्वस्थ हो जाएँगे।”
राजा ..थोड़ी मुस्कान के साथ:
“नहीं रानी… मैं जानता हूँ। यह शरीर अब अधिक दिन का मेहमान नहीं है।
लेकिन मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि हमारा पुत्र राजवर्धन अभी बहुत छोटा है।
वह इस विशाल राज्य का भार कैसे उठाएगा?”
.छोटी रानी फूट-फूटकर रोने लगती है। राजा उसका हाथ थाम लेते हैं।
राजा:
“रो मत, रानी। तुम्हारे आँसू देखकर मेरा हृदय और भारी हो जाता है।
सुनो… जब तक राजवर्धन बड़ा नहीं हो जाता, तब तक किसी को राज्य की देखभाल करनी होगी।”
राजा की नज़र बड़ी रानी पर जाती है।
वह गम्भीर और संयमित मुद्रा में आगे बढ़ती है।
राजा कमज़ोर स्वर में
“बड़ी रानी… मैं तुम पर विश्वास करता हूँ।
तुम बुद्धिमान हो, साहसी हो, और प्रजा भी तुम्हारा आदर करती है।
इसलिए मैं तुम्हें यह राज्य की अस्थायी बागडोर सौंप रहा हूँ।
जब तक राजवर्धन युवराज बनने योग्य न हो जाए, तब तक तुम उसकी और राज्य की रक्षा करना।”
छोटी रानी "आँसू रोकते हुए
“महाराज, क्या सचमुच यही उचित होगा?”
राजा ..धीरे से:
“हाँ, रानी
यही उचित है।
हमारा पुत्र अभी बालक है।
पर एक दिन वह महान राजा बनेगा।
उस दिन तक यह दायित्व बड़ी रानी का है।”
राजा काँपते हाथों से राजवर्धन को देख मुस्कुराते हैं और धीरे-धीरे आँखें मूँद लेते हैं।
छोटी रानी उनके हाथों को पकड़कर विलाप करती है, और बड़ी रानी गंभीर मुद्रा में झुककर आज्ञा स्वीकार करने का अभिनय करती है।
राजमहल का वही कक्ष।
दीपक मंद-मंद जल रहे हैं।

बाहर से मंत्रोच्चार और वैद्यों की फुसफुसाहट सुनाई देती है।
राजा अब अत्यंत दुर्बल हो चुके हैं।
उनका चेहरा पीला और आँखें गहरी थकान से भरी हुई हैं।
राजा कमज़ोर स्वर में, छोटी रानी का हाथ पकड़ते हुए
“रानी… अब मेरा समय आ गया है।
राजवर्धन का ख़याल रखना। उसे धर्म और सत्य का मार्ग सिखाना… यही मेरी अंतिम इच्छा है।”
छोटी रानी फूट-फूटकर रोती है और राजकुमार को अपनी गोद में भींच लेती है।
राजवर्धन मासूम आँखों से अपने पिता को देखता है, पर कुछ समझ नहीं पाता।
राजा की साँसें भारी होने लगती हैं।
दरबारियों और प्रजाजनों को खबर मिलती है कि महाराज की हालत गंभीर है।
पूरा महल शोक में डूब जाता है। लोग गलियों में दीपक बुझाकर मौन साध लेते हैं।
इसी बीच बड़ी रानी गंभीर मुखमुद्रा बनाकर आगे आती है।
वह सबके सामने अत्यंत दुःखी होने का अभिनय करती है, लेकिन उसके भीतर कहीं एक छिपी हुई मुस्कान खिल रही होती है।
उसे भली-भाँति ज्ञात है कि अब राजसिंहासन का मार्ग उसके लिए प्रशस्त होने वाला है।
राजा आखिरी बार राजवर्धन को देखकर:
“मेरा पुत्र… एक दिन महान सम्राट बनेगा…”
इतना कहते हुए राजा की आँखें धीरे-धीरे मूँद जाती हैं।
कमरे में सन्नाटा छा जाता है।
छोटी रानी विलाप करती है—“महाराज…!” और पूरा महल शोकाकुल हो उठता है।
शंख नहीं बजते, नगाड़े नहीं गूँजते—केवल करुण रुदन सुनाई देता है।
दूसरी ओर बड़ी रानी आँसू पोंछते हुए कक्ष से बाहर निकलती है और दरबारियों की ओर देखकर गंभीर स्वर में कहती है—“अब राज्य की रक्षा का भार मेरे कंधों पर है।”
यह कहते हुए वह भीतर ही भीतर अपनी जीत पर गर्व करती है।
राजमहल के प्रांगण में शोक का वातावरण छाया है। श्वेत वस्त्रों में लिपटी प्रजा, आँसुओं से भरे नेत्रों के साथ अपने धर्मप्रिय राजा को अंतिम विदाई देने के लिए एकत्रित है।
चारों ओर शंखनाद और वेद-मंत्रों की गूँज उठ रही है।
राजा का पार्थिव शरीर चंदन की चिता पर रखा गया। उनके हाथ में धर्मग्रंथ और माथे पर चंदन का तिलक लगाया गया।
छोटी रानी और प्रजा फूट-फूटकर रो रही है।
राजकुमार राजवर्धन अपनी माँ की गोद में बैठा मासूम आँखों से सब देख रहा है—उसे समझ नहीं कि यह कैसा खेल है, पर उसका नन्हा हृदय अशांति से भर जाता है।
ज्यों ही अग्नि की लपटें उठीं, पूरा वातावरण करुणा से भर गया।
आकाश में बादल घिर आए और धीमी वर्षा की बूंदें मानो प्रजा के आँसुओं के साथ मिलकर शोक व्यक्त करने लगीं।
हर कोई कह रहा था—‘हमारा धर्मराज अब नहीं रहा।’
कुछ ही दिनों बाद महल में दरबार सजाया गया। दरबारियों ने परंपरा के अनुसार बड़ी रानी को राज्य की अस्थायी बागडोर सौंप दी।
बड़ी रानी गंभीर और संयमित मुखमुद्रा बनाकर सिंहासन पर बैठी।
बाहर से वह धर्म और नियमों की बात करती, लेकिन भीतर उसका मन गुप्त विजय पर गर्वित हो रहा था।

अब उसके हाथों में सत्ता की चाबी थी और सबसे बड़ा अवरोध—राजा—उसके रास्ते से हट चुका था।

छोटी रानी अब भी शोक में डूबी रहती और अपने पुत्र को सीने से लगाकर दिन-रात आँसू बहाती।

उसे भरोसा था कि बड़ी रानी राजवर्धन को अपने पुत्र की तरह सँभालेगी, परंतु सच्चाई यह थी कि बड़ी रानी का मन अब किसी और ही चाल की बुनाई में व्यस्त था।