Search: The Edge of the Soul in Hindi Love Stories by khushboo books and stories PDF | तलाश: रूह का किनारा

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तलाश: रूह का किनारा


यह कहानी है आरोही की, जो अपनों के बीच रहकर भी पराई थी। यह कहानी है उस अजनबी की, जो बिना किसी पते के आया और रूह में बस गया। जब प्यार मुकम्मल होने की दहलीज पर था, तभी किस्मत ने एक ऐसा पत्ता फेंका जिसने सब कुछ बदल दिया। क्या प्यार समय और दुनिया की सीमाओं को पार कर सकता है? या कुछ कहानियां अधूरी रहने के लिए ही लिखी जाती हैं?

अध्याय 1: भीड़ में तन्हा
आरोही अपने घर की सबसे बड़ी और लाडली बेटी थी। एक समय था जब उसकी खिलखिलाहट से पूरा घर गूँजता था। लेकिन वक्त की धूल ने रिश्तों की चमक फीकी कर दी। जैसे-जैसे आरोही बड़ी हुई, घर की जिम्मेदारियाँ और उम्मीदें उसके कंधों पर बोझ बनने लगीं।
सबके लिए सब कुछ करते-करते आरोही की अपनी पहचान कहीं खो गई। उसे महसूस होने लगा कि अब उसे प्यार नहीं, सिर्फ एक 'ज़रूरत' समझा जाता है। उसने खुद को एक कमरे में समेट लिया। वह अक्सर सोचती— "क्या इस पूरी दुनिया में कोई ऐसा है, जो मुझे सिर्फ मेरे होने के लिए प्यार करे?" वह अपनों के बीच रहकर भी दुनिया की सबसे अकेली लड़की बन चुकी थी।


अध्याय 2: अजनबी से मुलाकात
शहर के किनारे एक पुरानी यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी थी, जहाँ सन्नाटा पसरा रहता था। एक शाम, आरोही अपनी तन्हाई से भागकर वहाँ बैठी थी। अचानक, गलियारे में एक तेज़ रोशनी हुई और उसे किसी के गिरने की आवाज़ आई।
वहाँ एक लड़का खड़ा था। धूल से सने कपड़े और आँखों में एक अजीब सी उलझन। उसका नाम अद्विक था। वह बदहवास सा इधर-उधर देख रहा था। उसे खुद नहीं पता था कि वह वहाँ कैसे पहुँचा। वह बस इतना जानता था कि वह किसी सफर पर था और अचानक एक मोड़ पर सब कुछ बदल गया। वह इस दुनिया, इस शहर के लिए पूरी तरह अजनबी था।


अध्याय 3: खामोश गुफ्तगू
अद्विक के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं थी। आरोही ने उसकी मदद करना शुरू की। वे रोज़ यूनिवर्सिटी के पीछे वाले बगीचे में मिलने लगे। अद्विक रोज़ कोशिश करता कि वह वापस जा सके, उन रास्तों को ढूँढ सके जहाँ से वह आया था। लेकिन हर रास्ता बंद मिलता।
बातों-बातों में आरोही ने उसे अपने अकेलेपन के बारे में बताया। अद्विक ने पहली बार उसकी आँखों में झाँक कर कहा, "आरोही, लोग भीड़ में इसलिए अकेले नहीं होते कि उनके पास कोई है नहीं, बल्कि इसलिए होते हैं क्योंकि उन्हें समझने वाला कोई नहीं है। मैं तुम्हें देख सकता हूँ।" पहली बार आरोही को लगा कि उसकी तलाश खत्म हो रही है।


अध्याय 4: मोहब्बत का इकरार
दिन हफ्तों में बदल गए। अद्विक अब वापस जाने की कोशिशों में नाकाम हो चुका था, लेकिन अब वह उदास नहीं था। उसे आरोही की छोटी-छोटी बातें पसंद आने लगी थीं। एक दिन भारी बारिश में, एक पुराने शेड के नीचे खड़े होकर अद्विक ने आरोही का हाथ थाम लिया।
उसने कहा, "मैं अपनी दुनिया वापस ढूँढ रहा था, पर मेरी दुनिया अब तुम हो। क्या तुम मुझे अपनाओगी?" आरोही की आँखों में खुशी के आँसू थे। उसने अद्विक को अपने परिवार से मिलवाया। शुरू में विरोध हुआ, पर अद्विक के निस्वार्थ प्यार ने सबका दिल जीत लिया। घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं।


अध्याय 5: वह मनहूस शहनाई
शादी का दिन आ गया। चारों तरफ खुशियों का माहौल था। आरोही लाल जोड़े में परी जैसी लग रही थी। अद्विक, जो शेरवानी में किसी राजकुमार से कम नहीं लग रहा था, मंडप की ओर बढ़ रहा था।
अचानक, अद्विक के चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी छा गई। उसे कानों में एक गूँज सुनाई देने लगी। हवा का रुख अचानक बदल गया और चिराग टिमटिमाने लगे। अद्विक ने अपना सिर पकड़ा और डगमगाते कदमों से पीछे हटने लगा। आरोही घबरा गई, "अद्विक! क्या हुआ?"
अद्विक की आँखों में डर और लाचारी थी। उसने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा, "आरोही... वो मुझे बुला रहे हैं। मेरा समय यहाँ खत्म हो गया है।"


अध्याय 6: एक अनसुलझा रहस्य 
इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, अद्विक के शरीर से एक हल्की सी रोशनी निकलने लगी। वह धीरे-धीरे धुंधला होने लगा। आरोही चिल्लाई और उसका हाथ पकड़ने के लिए दौड़ी, लेकिन उसका हाथ हवा के सिवा कुछ न छू सका। अद्विक की आँखों से एक आंसू टपका, उसने आखिरी बार होंठों से कुछ कहा और पल भर में हवा में विलीन हो गया।
शादी का मंडप सूनसान था। मेहमान हक्के-बक्के रह गए। किसी को नहीं पता था कि वह लड़का कहाँ से आया था और कहाँ गया। आरोही उसी लाल जोड़े में उस यूनिवर्सिटी की पुरानी लाइब्रेरी की ओर भागी। वहाँ सब शांत था। अद्विक का नामोनिशान तक नहीं था।
वह वहीं ज़मीन पर गिरकर फूट-फूट कर रोने लगी। वह फिर से अकेली हो गई थी, लेकिन इस बार उसके पास एक याद थी... और एक बहुत बड़ा सवाल।

क्या अद्विक वापस आएगा? या वह किसी और दुनिया का मुसाफिर था जो रास्ता भटक गया था?
समाप्त... (या शायद एक नई शुरुआत?)