Deewane Ki Diwaniyat - Episode in Hindi Love Stories by kajal jha books and stories PDF | दीवाने की दिवानियत - एपिसोड 9

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दीवाने की दिवानियत - एपिसोड 9

जेल में राय और भानु प्रताप का सामना हुआ। भानु चिल्लाया, "तूने मुझे बेचा!" राय बोला, "तूने मेरी कमाई लूटी।" दोनों के राज खुल गए। कोर्ट में डायरी और रिकॉर्डिंग से केस मजबूत। स्टेशन प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिली।नई शुरुआत
एक हफ्ते बाद, साइट पर पूजा हुई। पृथ्वी और सनाया नींव रख रहे थे। रमेश पट्टी बाँधे मुस्कुरा रहा। सनाया ने कहा, "अब पुरानी दुश्मनी खत्म। हमारा स्टेशन दरभंगा बदलेगा।" पृथ्वी ने उसे गले लगाया। "और हमारा प्यार भी। शादी करेंगे, सनाया। नई जिंदगी।" शाम ढली, दोनों बालकनी में बैठे। सूरज डूबा, लेकिन उम्मीद चमकी।लेकिन कोर्ट से एक चिट्ठी आई। भानु प्रताप की आखिरी अपील: "मेरा बेटा बाहर है। असली बदला बाकी।" दरभंगा की शांति फिर डगमगाई.

एपिसोड 9: खून का बदला, शादी की शामदरभंगा में स्टेशन प्रोजेक्ट जोर पकड़ चुका था। नींव पड़ गई, मजदूर दिन-रात काम कर रहे। पृथ्वी राठौर और सनाया की शादी की तैयारियाँ चल रही थीं। हवेली में मेहंदी की रस्म हो चुकी, गाने गूँज रहे। सनाया ने आईने में खुद को देखा—लाल जोड़ा, मेंहदी की महक। "पृथ्वी, ये खुशी बरकरार रहे?" पृथ्वी ने पीछे से गले लगाया। "हाँ, अब सब ठीक। राय बहादुर और भानु प्रताप जेल में सड़ेंगे। हमारा भविष्य स्टेशन के साथ चमकेगा।" लेकिन कोर्ट की चिट्ठी सनाया के मन को कचोट रही—भानु प्रताप का बेटा?नया दुश्मन
अगले दिन साइट पर हादसा। एक क्रेन गिर पड़ी, दो मजदूर घायल। पृथ्वी ने चेक किया—सबोटाज। केबल कटी हुई। रमेश ने कहा, "सर, कोई अंदरूनी काम किया। कालिया के पुराने साथी?" तभी एक युवक आया—लंबा, तेज आँखें, भानु प्रताप जैसा चेहरा। "मैं विक्रम ठाकुर। भानु प्रताप का बेटा—सनाया का सौतेला भाई। माँ की दूसरी शादी से।" पृथ्वी चौंका। विक्रम बोला, "पापा ने मुझे बताया था। तुमने उन्हें फंसाया। स्टेशन मेरी जमीन पर बन रहा। रुको, वरना..." वो चला गया, धमकी छोड़कर।सनाया को खबर लगी। "विक्रम? मैंने कभी नहीं देखा। माँ की मौत के बाद पापा ने छिपाया।" पृथ्वी ने गले लगाया। "डर मत। पुलिस को बताते हैं। शादी कल है, सब संभाल लेंगे।" लेकिन विक्रम बाहर इंतजार कर रहा। उसके पास गुर्गे—भानु प्रताप के पुराने लोयलिस्ट। प्लान: शादी में धमाका, सनाया को भगा लाना।शादी का दिन
बारात हवेली पहुँची। ढोल-नगाड़े, फूलों की वर्षा। पृथ्वी घोड़ी पर चढ़ा, रमेश साथ। सनाया मंडप में बैठी, हृदय धड़क रहा। रस्में चलीं—कन्यादान, फेरे। विक्रम छिपा देख रहा। तभी आग लग गई—मंडप के पास पटाखों में ब्लास्ट। चीखें गूँजीं। पृथ्वी ने सनाया को बचाया। "विक्रम!" रमेश ने एक गुर्गे को पकड़ा। गोलीबारी शुरू। विक्रम चिल्लाया, "दीदी, पापा का बदला! तू राठौर की हो गई?" सनाया रोई, "विक्रम, रुको! पापा गलत थे। आ जा हमारे साथ।"पुलिस पहुँची। झड़प में विक्रम घायल। पृथ्वी ने उसे पकड़ा। "बदला खत्म। भानु प्रताप ने सब बर्बाद किया। न्याय हो चुका।" विक्रम टूट गया। "माँ मर गई पापा के गुस्से से। मैं अकेला था।" सनाया ने हाथ थामा। "अब परिवार हमारा। जेल मत जाना।"न्याय की जीत
कोर्ट में विक्रम ने कबूल किया—सबोटाज उसका। लेकिन सनाया की गवाही से सजा हल्की। भानु प्रताप को उम्रकैद। स्टेशन प्रोजेक्ट फिर शुरू। शादी पूरी हुई—सादे मंडप में। पृथ्वी-सनाया सात फेरे ले चुके। रात को नई दुल्हन सनाया बोली, "पति देव, बगावत के सुर शांत हो गए। अब प्यार के गीत गाएँगे।" पृथ्वी ने चुंबन दिया। "हाँ, नई जड़ें लगेंगी।"लेकिन जेल से एक आखिरी मैसेज: "मेरा आखिरी हथियार बाकी। स्टेशन उद्घाटन पर देखना।" क्या खतरा अभी बाकी है?