एपिसोड 3 : शक्ति का प्रदर्शन और ब्लैकमेल का दाँव
अभिमान का जुनून, अब अधिकार और क्रूरता में बदल चुका है। अन्वेषा की ईमानदारी को ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बना दिया जाता है।
(शुरुआत: अन्वेषा का दफ़्तर, अगली सुबह 9:30 बजे)
अन्वेषा पट्टनायक रात भर ठीक से सो नहीं पाई थी। अभिमान राठौड़ की धमकी उसके कानों में गूंज रही थी: "आपका ईमानदार करियर और आपका शांत जीवन... दोनों हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएंगे।"
वह अपनी मेज पर बैठी थी। आज उसने ऑफिस के लिए एक सफ़ेद और लाल बॉर्डर वाली साधारण ओडिया साड़ी पहनी थी, जो उसकी अटूटता को दिखा रही थी।
उसके सहयोगी राहुल ने दरवाज़ा खटखटाया और चाय लेकर अंदर आया। राहुल सीधा-सादा, मेहनती अफ़सर था।
राहुल (चिंता में): "अन्वेषा, तुम ठीक तो हो? आँखें सूजी हुई लग रही हैं। मैंने सुना, राठौड़ जी कल बहुत गुस्से में थे। तुम ज़्यादा टेंशन मत लो। उनके प्रोजेक्ट में कुछ कमियाँ हैं, तो हैं।"
अन्वेषा (मुस्कुराने की कोशिश करती है): "मैं ठीक हूँ, राहुल। बस थोड़ी नींद पूरी नहीं हुई। यह सिर्फ़ कमियों की बात नहीं है। यह आदमी... यह अपनी ताक़त से सब कुछ बदल देना चाहता है। पर मैं अपना धर्म (Duty) नहीं छोडूंगी।"
अन्वेषा ने फ़ाइल उठाई। वह जानती थी कि वह अभिमान को झूठे कागज़ात पर साइन करके नहीं दे सकती। वह खुद को बचाने के लिए अपनी ड्यूटी नहीं छोड़ेगी।
( अभिमान का बुलावा)
तभी, अन्वेषा के फ़ोन पर एक मैसेज आता है—अभिमान राठौड़ की तरफ़ से।
मैसेज: "फ़ैसला क्या है? मुझे दफ़्तर में नहीं, रात 8 बजे मेरी हवेली पर मिलना। अकेले। यह सिर्फ़ तुम्हारे और मेरे बीच की बात है।"
अन्वेषा का गुस्सा चरम पर पहुँच जाता है। वह विधायक है, पर उसे लगता है कि वह एक राजा है जो किसी को भी अपने घर बुला सकता है।
शाम 8 बजे, अन्वेषा अभिमान की शानदार, पुरानी राजस्थानी हवेली के दरवाज़े पर खड़ी थी। हवेली के अंदर का वैभव और बाहर की सन्नाटा उसे डरा रहा था।
वह हवेली के निजी दफ़्तर में दाख़िल होती है। अभिमान वहाँ पूरी राजसी शान में बैठा था। उसने आज गहरे नीले रंग का पारंपरिक जोधपुरी कोट पहना था।
अन्वेषा (तेज़, स्थिर आवाज़ में): "राठौड़ जी, मैं यहाँ आपकी राजसी शान देखने नहीं आई हूँ। मेरा फ़ैसला सुनिए—मैं आपका प्रोजेक्ट पास नहीं कर सकती। आप जो चाहें, कर सकते हैं। मैं अपनी ड्यूटी नहीं बेचूंगी।"
अभिमान एक पल के लिए भी अपनी जगह से नहीं हिला। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी, बस शांत जीत थी।
अभिमान (आराम से, जैसे वह पहले से जानता था): "मैं जानता था, अन्वेषा जी। आपकी ईमानदारी इतनी सस्ती नहीं है। इसीलिए मैंने आपकी ईमानदारी के सबसे ईमानदार साथी पर दाँव लगाया है।"
अभिमान अपने मेज़ पर रखी एक दूसरी फ़ाइल को खोलता है। वह फ़ाइल सीधे अन्वेषा की तरफ़ खिसका देता है।
अभिमान: "यह फ़ाइल देखिए। यह आपके सहयोगी, राहुल की है।"
अन्वेषा फ़ाइल उठाती है। अंदर राहुल के नाम पर छोटी रकम की हेराफेरी के कागज़ात थे—झूठे बिल, फ़र्ज़ी हस्ताक्षर।
अन्वेषा (हाथ काँपते हैं): "यह... यह क्या बकवास है? राहुल ऐसा नहीं कर सकता!"
अभिमान (ठंडी, ताक़तवर आवाज़ में): "यह बकवास नहीं है। यह सिर्फ़ एक दिन का काम था। यह बहुत छोटा मामला है, पर मैं इसे इतना बड़ा बना दूँगा कि कल सुबह तक उसका सस्पेंशन हो जाएगा, उसकी इज्ज़त चली जाएगी और वह हमेशा के लिए भ्रष्टाचारी कहलाएगा।"
अन्वेषा का दिल डूब जाता है। अभिमान ने उसे वहाँ मारा था, जहाँ वह सबसे कमज़ोर थी—उसकी ईमानदारी की वजह से उसे अपनों को बलिदान करना पड़ रहा था।
अन्वेषा (आँखों में आँसू, पर गुस्से से): "आप... आप एक विधायक हैं! आप कानून से खेल रहे हैं! आपको शर्म नहीं आती?"
अभिमान (उठता है और मेज़ के कोने पर बैठता है, बिल्कुल अन्वेषा के सामने): "शर्म? नहीं। मैं सिर्फ़ जीत में विश्वास रखता हूँ। और आपकी ईमानदारी को हराने का यही एकमात्र तरीका था। अब आप बताइए, अन्वेषा जी... आप अपनी ड्यूटी चुनेंगी... या अपने दोस्त की ज़िंदगी? आपका फ़ैसला मुझे कल सुबह तक चाहिए।"
(अकेलेपन का दर्द)
अन्वेषा हवेली से बाहर निकलती है। रात का अंधेरा उसे और भी अकेला महसूस कराता है। वह पूरी रात, अपने सरकारी गेस्ट हाउस के छोटे से कमरे में बैठी, रोती रही।
वह जानती थी कि अभिमान bluff नहीं कर रहा है। वह राहुल को बर्बाद कर देगा।
अन्वेषा (मन ही मन, ज़ोर से): "अभिमान, तुमने मेरी आत्मा पर वार किया है! मैं अपनी ड्यूटी को बचा सकती हूँ, पर राहुल को नहीं। मेरा धर्म कहता है कि मैं अपनों की रक्षा करूँ, भले ही इसके लिए मुझे खुद को बलिदान करना पड़े।"
अन्वेषा, सुबह 5 बजे, टूटे हुए मन से एक फ़ोन करती है और अभिमान के निजी सहायक से मिलने का समय लेती है। वह जानती थी कि अब उसे एक ऐसी शर्त माननी होगी, जो उसकी ज़िंदगी और आज़ादी को हमेशा के लिए छीन लेगी।
क्रमशः.........
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"दोस्तों, सफ़र-ए-दिल का यह मोड़ आपको कैसा लगा? क्या अन्वेषा को राहुल को बचाने के लिए अपनी ईमानदारी का सौदा करना चाहिए था? अभिमान की इस जीत ने उसे और भी खतरनाक बना दिया है। पर याद रखिए, जहाँ नफरत की आग इतनी तेज होती है, वहीं जुनून का जन्म होता है।
अगले एपिसोड में देखिए: अभिमान की असली शर्त, जो अन्वेषा की दुनिया उजाड़ देगी!
लेखक की कलम से...✍️
"क्या अभिमान की यह जीत अन्वेषा की हार है, या एक नए तूफ़ान की शुरुआत? कहानी अभी और भी गहरी होने वाली है! 🌪️✨
ऐसी ही रोमांचक अपडेट्स के लिए मुझे Follow करना न भूलें और अपनी कीमती Rating ज़रूर दें। आपका साथ ही मेरी प्रेरणा है! ❤️🔥🦋
अगला एपिसोड जल्द ही... बने रहिए! 🙏"
Spoiler.....
"अभिमान ने जंग तो जीत ली, पर क्या वो अन्वेषा की रूह को हरा पाएगा? अब शुरू होगा वो खेल, जहाँ सौदे कागजों पर नहीं, ज़िंदगी के रिश्तों पर होंगे। सफ़र-ए-दिल का अगला मोड़... आपकी धड़कनें रोक देगा!" ????
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