प्राथमिक विद्यालय का प्रांगण कोलाहल से भरा हुआ था। आज स्कूल का अंतिम दिन था, कल से गर्मी की छुट्टियाँ शुरू होने वाली थीं। बच्चे आज कुछ ज़्यादा ही उत्साहित थे। कोई मैदान में दौड़ रहा था, कोई झूले पर चढ़ा था, तो कोई अगले डेढ़ महीने की योजनाएँ दोस्तों को बता रहा था। स्कूल न आने की खुशी उनके चेहरों पर साफ़ झलक रही थी।
विद्यालय की नई प्रधानाचार्या जया मैडम अपने कार्यालय में खड़ी खिड़की से यह सब देख रही थीं। इसी साल उनकी नियुक्ति हुई थी, इसलिए अभी बहुत-से बच्चों के नाम और उनकी कहानियाँ उनसे अनजान थीं। बच्चों की खिलखिलाहट के बीच अचानक उनकी नज़र प्रांगण के एक कोने पर टिक गई। कदम के पेड़ के नीचे एक लड़की चुपचाप बैठी थी। न किसी खेल में शामिल, न किसी से बात करती हुई। उसका चेहरा उतरा हुआ था, आँखें ज़मीन पर टिकी थीं, जैसे वह अपने ही विचारों में डूबी हो।
शोर से भरे आँगन में वह उदासी जया मैडम को खटक गई। पहले उन्होंने सोचा कि शायद पाँचवी कक्षा की छात्रा है और सहेलियों से बिछड़ने का दुख होगा, क्योंकि आगे उसे दूसरे विद्यालय में जाना होगा। लेकिन मन नहीं माना। उन्होंने स्कूल की सहायिका श्यामा को आवाज़ दी। श्यामा बाहर कुछ काम कर रही थीं, आवाज़ सुनते ही अंदर आ गईं।
“जी मैडम जी, क्या हुआ?”
जया मैडम ने खिड़की की ओर इशारा किया, “वो पेड़ के नीचे बैठी बच्ची कौन है?”
श्यामा ने ध्यान से देखा और बोलीं, “अच्छा… वो रजनी है मैडम जी, पाँचवी में पढ़ती है। हमारे गाँव के उमापति तिवारी की बेटी है।”
“इसे अंदर बुलाइए,” जया ने कहा।
कुछ ही देर में श्यामा रजनी को लेकर अंदर आईं। रजनी सिर झुकाए खड़ी थी।
“क्यों बैठी थी उधर?” श्यामा ने कहा, “मैडम को बता।”
पर मैडम के कई बार पूछने पर भी रजनी कुछ बोल नहीं पाई। उसकी आँखें भर आईं और आँसू पलकों पर ठहर गए।
“अरे बेटा,” जया मैडम ने प्यार से कहा, “अगर कोई दिक्कत है तो बताओ। घर पर कोई परेशानी है? किसी ने डाँटा है?”
रजनी ने सिर नीचे किए हुए धीमे से कहा, “कुछ नहीं मैडम,” और फिर चुप हो गई।
श्यामा ने जया को बताया कि रजनी की एक जुड़वा बहन भी है, जो उसी कक्षा में पढ़ती है। उसका नाम रेवती है। रेवती को बुलाया गया। बहन को रोता देखकर रेवती घबरा गई। उसे लगा शायद बहन को डाँट पड़ी है। वह डर से कभी मैडम को देखती, कभी बहन को।
जया ने पूछा, “ये इसकी बहन है न?”
“हाँ मैडम,” रेवती बोली।
“क्यों रो रही है, पता है?”
रेवती ने सिर हिला दिया, “नहीं।”
रजनी ने बहन की ओर देखा और फिर नज़रें झुका लीं। जया समझ गईं कि यह बात बहन के सामने नहीं कहेगी। रेवती को बाहर भेज दिया गया। बहन को यूँ उदास छोड़कर रेवती की चहक भी बुझ गई थी, लेकिन कुछ देर बाद वह बच्चों के साथ खेलने लगी।
जया मैडम रजनी के सामने घुटनों के बल बैठ गईं और उसका हाथ थाम लिया। “बताओ बेटा, क्या बात है? सब ठीक हो जाएगा।” श्यामा भी पास आकर बोलीं, “हाँ बिटिया, पंडित जी ठीक हैं न? तबियत तो खराब नहीं?”
तभी श्यामा ने धीरे-धीरे पूरी बात जया को बता दी। उमापति तिवारी के बस यही दो बच्चे हैं। बहुत सालों बाद उनकी पत्नी जुड़वा बेटियों को जन्म देकर चल बसी। गरीबी में किसी तरह बेटियों को पाला। अब पंडित जी की आँखें भी ठीक से नहीं देखतीं। पहले पंडिताई करते थे, अब घर पर रहते हैं। बेटियाँ लोगों के घर काम कर लेती हैं, बदले में अनाज या पुराने कपड़े मिल जाते हैं। उसी से गुज़ारा चल रहा है।
यह सब सुनते-सुनते जया का मन द्रवित हो उठा। रजनी की आँखों से आँसू बहने लगे। बार-बार समझाने पर वह बोली, “मैडम जी, बापू को दिखता नहीं।उनके दाँत भी सब ख़राब हो चुके हैं | ज़्यादातर घरों से गेहूँ मिलता है, चावल कम मिलता है। हम दोनों बहनें रोटी खा लेती हैं। चावल बापू के लिए बचा कर रखते हैं।”
वह थोड़ा रुकी, फिर सिसकते हुए बोली, “दिन में मिड-डे मील में जो खिचड़ी बनती थी, थोड़ी बचाकर घर ले जाते थे बापू के लिए। अब स्कूल बंद हो जाएगा… मिड-डे मील भी नहीं मिलेगा… फिर बापू क्या खाएँगे?” कहते-कहते वह फफक कर रो पड़ी।
ग्यारह साल की बच्ची, और पिता की भूख की चिंता। जया मैडम की आँखें भर आईं। उन्होंने रजनी को गले लगा लिया और कहा, “चुप हो जाओ बेटा। छुट्टियों में स्कूल में खाना नहीं बनेगा, लेकिन जो अनाज बचा है, वो तुम्हारे घर जाएगा। और जब स्कूल खुलेगा, तुम रोज़ आकर खाना ले जाया करना। पढ़ना हो या न हो, खाना ज़रूर मिलेगा।”
रजनी ने आश्चर्य और उम्मीद से उनकी ओर देखा। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई। जया ने कहा, “अब जाओ, खेलो।” रजनी मुस्कुराती हुई बाहर दौड़ गई।
जया मैडम फिर खिड़की के पास जाकर खड़ी हो गईं। उन्होंने देखा, रजनी अब हँसते हुए बच्चों के साथ खेल रही थी। उनके मन को अजीब-सी शांति मिली। पीछे से श्यामा की आवाज़ आई,
“कौन कहता है कि श्रवण कुमार सिर्फ बेटे होते हैं, मैडम जी। रजनी बेटी है, लेकिन अपने बाप के लिए श्रवण कुमार है।”
जया मैडम ने मुस्कुराकर हामी भर दी |
~रिंकी सिंह