Dr. Pradeep Kumar Sharma ki Laghukathayen - 6 in Hindi Short Stories by Dr. Pradeep Kumar Sharma books and stories PDF | डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा की लघुकथाएँ - 6

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डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा की लघुकथाएँ - 6

डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा की लघुकथाएँ 

माँ

ऑफिस से लौटकर जैसे ही वह घर पहुँचा, पत्नी बोलीं, "सुनिए जी, आपके पास किसी स्नेक रेस्क्यू वाले या सपेरे का फोन नंबर हो, तो बुला लीजिए। घर के पीछे रखे गमलों के पास एक साँप है।"
"साँप... ? हमारे घर में ? कब... तुमने मुझे बताया नहीं...?" आश्चर्य से उसने पूछा।
"हाँ, अभी थोड़ी देर पहले ही मैंने देखा। मुझे लगा, 15-20 मिनट में तो आप घर पहुँच ही जाएँगे। फोन पर बताती, तो आप भी हड़बड़ा जाते, सो मैंने साँप को एक पुरानी बाँस की टोकरी में ढक कर उसके ऊपर बड़ा-सा पत्थर रख दिया है और बच्चों को यहाँ बाहर रखकर आपका इंतजार कर रही हूँ।" उसने बहुत ही सहज भाव से कहा।
वह आश्चर्य से पत्नी और बच्चों को देख रहा था।
पत्नी ने ही तंद्रा भंग की, "ऐसे क्या देख रहे हैं जी ?"
"मैं, देख रहा हूँ उस लड़की को, जो पाँच साल पहले तक एक छोटी-सी छिपकली से डर कर पलंग से नीचे नहीं उतरती थी, आज साँप को देख कर भी डरी नहीं, बल्कि उसे टोकरी से ढँक भी ली।" वह बोला।
"तब वह सिर्फ पत्नी थी, आज वह माँ भी है।" पत्नी ने कहा।
*****
अर्धांगिनी

वह करवा चौथ का दिन था। सुनीता का शरीर बुखार से तप रहा था। पूरा शरीर दर्द से टूट रहा था। उसके संदीप ने मौसम्मी का रस देते हुए कहा, "पी लो इसे। फिर डॉक्टर के पास चलेंगे।” 
सुनीता बोली, "आज मेरा करवा चौथ का व्रत है। इसलिए कुछ भी खा-पी नहीं सकती।"
"कोई बात नहीं। तुम आज व्रत नहीं रखोगी। देखो जरा खुद को, तुम कितनी कमजोर हो गई हो। मैं नहीं चाहता कि तुम्हारी तबीयत और भी ज्यादा खराब हो।"
"देखिए जी, हमारी शादी को सोलह साल पूरे होने वाले हैं। आज तक बिना नागा मैंने हर साल तुम्हारी लम्बी उम्र के लिए यह व्रत रखा है। चाहे, कुछ भी हो, इस बार भी मैं व्रत तो रखूँगी ही।"
“क्या तुम मुझे हमेशा खुश देखना नहीं चाहती हो ?”
“शुभ-शुभ बोलिए जी, ऐसा क्यों बोल रहे हैं आप ?”
“तुम्हें क्या लगता है कि तुम्हारी ऐसी हालत देख कर मैं खुश रह पाऊँगा ? खुदा न खास्ता यदि तुम्हें कुछ हो गया, तो मेरा और बच्चों का क्या होगा ? सोचा है इस पर कभी ?”
“आप चिंता मत करिए। मुझे कुछ नहीं होगा। व्रत और तीज त्योहार के अपने विधि-विधान होते हैं। उसे मानना ही पड़ता है।”
"हूँ.... तुम मेरी अर्धांगिनी हो। हो ना?"
"हाँ..., इसमें पूछने की क्या बात है ?"
"ठीक है, फिर तुम्हारी बात भी रह जाए और हमारा काम भी हो जाए। हर बार व्रत तुम ही करती हो, इस बार मैं कर लूँगा। व्रत ये अर्धांग करे या वह अर्धांग, बात तो वही है। चलो पियो ये जूस। अब मैं इस पर और डिस्कस नहीं करनया चाहता।"
संदीप की बात मानकर सुनीता ने जूस पी ली। पूरी श्रद्धा से संदीप ने व्रत रखा।
जब शाम को करवा चौथ का चाँद दिखा, दोनों ने मिल कर चाँद को अर्घ्य दिया। दोनों आँखें बंद कर मन ही मन एक-दूसरे की लंबी उम्र की कामना कर रहे थे।
*****
साली

"राशि, वैसे तो तुम्हारी दीदी मेरी लंबी उम्र के लिए करवा चौथ का व्रत कर ही रही है, क्यों नहीं तुम भी कर लेती, क्योंकि साली भी आधी घरवाली होती है ?" रमेश ने फिरकी लेते हुए कहा।
"हाँ हाँ क्यों नहीं जीजाजी। वैसे साली आधी बहन भी होती है और आपकी तो कोई बहन हैं नहीं, तो क्यों नहीं मैं भाई दूज का व्रत भी कर लूँ।" राशि ने कहा।
"वाह ! क्या खूब कहा है तुमने राशि। हम एक काम करते हैं, तुम ना, मेरी बहन ही बन जाओ। करवा चौथ नहीं, भाई दूज ही ठीक है तुम्हारे लिए। और हाँ, अब से तुम्हें मुझे हर साल राखी भी बाँधनी पड़ेगी।" रमेश ने राशि के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा। 

-डॉ. प्रदीप कुमार शर्मा
रायपुर, छत्तीसगढ़