बुराड़ी घाट का युद्ध: स्वराज्य के लिए अंतिम बलिदान
जनवरी 1760 का कड़कड़ाती ठंड वाला पौष महीना। यमुना नदी के किनारे बुराड़ी घाट (बारारी घाट) पर घना कोहरा छाया हुआ था। नदी का पानी कम हो चुका था, जिससे छोटे-छोटे द्वीप और ऊँची घास की आड़ में छिपना आसान था। मराठा सेना, दत्ताजी राव शिंदे (सिंधिया) के नेतृत्व में, दिल्ली की रक्षा के लिए यमुना के इस पार डटी हुई थी। उनके साथ मात्र कुछ हजार सैनिक थे – मुख्य रूप से घुड़सवार और तलवारबाज। तोपखाना पीछे छूट गया था, क्योंकि समय नहीं मिला था उसे साथ लाने का।
दत्ताजी शिंदे, रणोजी शिंदे के पुत्र और युवा जनकोजी शिंदे के चाचा-संरक्षक, मराठा साम्राज्य के उत्तरी अभियानों के प्रमुख सेनापति थे। पेशवा बालाजी बाजीराव ने उन्हें पंजाब और दिल्ली की सुरक्षा की जिम्मेदारी सौंपी थी। अहमद शाह अब्दाली की पुनः आक्रमण की खबर मिलते ही दत्ताजी ने नजीब-उद-दौला रोहिला और उसके सहयोगियों को रोकने का बीड़ा उठाया था। लेकिन अब्दाली की विशाल सेना – नजीब की रोहिला फौज, अवध के सैनिक और अफगान योद्धाओं की संयुक्त शक्ति – यमुना पार कर चुकी थी। उनके पास लंबी दूरी की बंदूकें, जंबूरे (हल्की तोपें) और भारी तोपखाना था। मराठों की संख्या कम थी, और वे संख्याबल में बुरी तरह पीछे थे।
रात के अंधेरे में अफगान-रोहिला सेना ने यमुना पार की। ऊँची झाऊ घास और कोहरे की आड़ में छिपे मुश्केतधारी सैनिकों ने अचानक गोलीबारी शुरू कर दी। मराठा टुकड़ियाँ – छोटे-छोटे दलों में बँटी हुईं – अलाव जला कर ठंड से लड़ रही थीं। घोड़ों की टापों की आवाज सुनते ही उनके कान खड़े हो गए। जानराव वाबले अपनी टुकड़ी के साथ घाट की रक्षा कर रहे थे। सबाजी शिंदे और अन्य बहादुर आगे बढ़े, लेकिन शत्रु की तोपों और बंदूकों की बौछार ने उन्हें घेर लिया।
खबर दत्ताजी तक पहुँची। उन्होंने अपनी सेना को दो हिस्सों में बाँटा। एक टुकड़ी जनकोजी के साथ घाट की ओर दौड़ी, दूसरी खुद संभाली। बख्तर और शिरस्त्राण पहने दत्ताजी शत्रु की सेना में काल बनकर घुस गए। उनकी तलवार हर वार पर अफगान सिरों को धड़ से अलग कर रही थी। जनकोजी भी अदम्य साहस से लड़ रहे थे। लेकिन शत्रु की संख्याबल और बेहतर हथियारों के सामने कितना टिकते?
एक तोप का गोला जनकोजी की छाती पर आकर फटा। वे घोड़े से गिर पड़े, बेहोश। जानराव वाबले और यशवंतराव जगदाले ने उन्हें खींचकर सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। यह खबर दत्ताजी तक पहुँची तो उनका रोष चरम पर पहुँच गया। वे सीधे नजीब और उसके सहयोगी मियाँ कुतुब शाह पर टूट पड़े। एक के बाद एक अफगान योद्धा उनके सामने ढेर हो रहे थे।
तभी एक और गोला आया। दत्ताजी का प्रिय घोड़ा लालमणि और स्वयं दत्ताजी धराशायी हो गए। घायल, रक्तस्नात दत्ताजी जमीन पर पड़े थे। "दत्ताजी गिर गए!" का शोर चारों ओर फैल गया। नजीब-उद-दौला और मियाँ कुतुब शाह उनके पास पहुँचे। घोड़ों की हिनहिनाहट और युद्ध के कोलाहल के बीच कुतुब शाह ने व्यंग्य भरे लहजे में पूछा:
"क्यों पाटिल, और लड़ोगे?"
दत्ताजी ने अंतिम साँसों में, स्वाभिमान से भरी गुर्राती आवाज में जवाब दिया:
"क्यों नहीं? बचेंगे तो और भी लड़ेंगे ही... हम मराठे हैं! हम स्वराज्य के लिए जन्म लेते हैं, लड़ते हैं और स्वराज्य के लिए ही मरते हैं!"
यह सुनते ही कुतुब शाह और नजीब क्रोधित हो उठे। उन्होंने दत्ताजी पर तलवारों से वार पर वार किए। मराठा शेर शांत हो गया, लेकिन उसके अंतिम शब्द शत्रु के दिल में डर पैदा कर गए। बाद में कुतुब शाह ने दत्ताजी का सिर काटकर अब्दाली को भेजा।
यह युद्ध मराठों की हार था। सेना पीछे हट गई, दिल्ली पर अफगानों का कब्जा हो गया। लेकिन दत्ताजी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। उनके शब्द – "बचेंगे तो और भी लड़ेंगे" – मराठा इतिहास में अमर हो गए। यह स्वराज्य की उस अटूट भावना का प्रतीक बन गया, जिसने पानिपत की त्रासदी के बाद भी मराठों को पुनरुत्थान का रास्ता दिखाया। दत्ताजी शिंदे का नाम आज भी मराठा गौरव का पर्याय है – एक ऐसे योद्धा का, जिसने मृत्यु के द्वार पर भी हार नहीं मानी।