उठ री जागृति
’’ उठ री जागृति, अपने नाम को सार्थक कर, हिम्मत न हार, कई लड़कियों की उम्मीद है तुमसे। ’’ यह वाक्य नींद में सोयी किसी लड़की को उठाने के लिए नहीं हो रहे हैं बल्कि उस लड़की को जगाने के लिए हो रहे हैं जो कि अपना आत्मविश्वास खो चुकी है, उसके रोम-रोम ने अपनी हार को स्वीकार कर ली है। उसकी सोई हुई चेतना को जगाने के लिए यह प्रयास हो रहे हैं।
रामकृपासल जी की बेटी जागृति, बचपन से ही और लड़कियों की तरह बड़ी ही नटखट थी। उसकी शरारतें ऐसी बिल्कूल भी नहीं थी कि किसी को गुस्सा आ जाए, उसकी शरारतों का तो यह मकसद था कि किसी को भी हंसी आ जाए।
गाँव में एक ही घर के कई मेहमान आए थे, जागृति के किसी शरारत पर आग बबूला हो उठे थे मगर जिनके घर वो आए थे, उन्हीं ने उन लोगों का गुस्सा शांत करा दिया। उन लोगों का गुस्सा देख जागृति भाग खड़ी हुई और घर में आकर ही रूकी और जाकर माँ के पीछे छुप गई।
’’ कुछ हुआ क्या ? ’’ माँ क इस सवाल पर जागृति ने कोई जवाब नहीं दिया।
उन गुस्साए हुए मेहमान ने जागृति की चंचलता को थोड़ा कम करने का काम किया। एक दिन पढ़ायी में लीन अपनी बेटी को देखकर अचम्भित माँ ने पुछा ’’आज सुरज पश्चिम से कैसे निकल आया। वो भी सुबह-सुबह। जाओ, मंजरी खेलने के लिए बुला रही है।’’
’’ नहीं माँ, मुझको अभी पढ़ना है, खुब पढ़ना है।’’
मंजरी आयी और बोली ’’ चल न जग्गी, खेलते हैं। ’’
सुलेखा ने कहा ’’ अरी जग्गी, कल तो रविवार है, कल तो स्कुल बंद है और आचार्य जी ने तो गृह कार्य भी नहीं दिया है, नहीं तो हमलोग इतना जिद नहीं करते।’’
किसी को बहुत ज्यादा खराब न लगे इस सुन्दर अंदाज से सबको चलता कर जागृति फिर पढ़ने में ध्यान मग्न हो गयी। अपने परिणाम से सबको चौका देने वाली, आज प्रशंसा की पात्र बनी है। पुरे गाँव में आज जागृति के ही चर्चे हैं।
स्कुल और कॉलेज में अब्बल आने वाली जागृति ने प्रशासनिक अधिकारी बनने के लिए अपना लक्ष्य साधा तो उसके पिता ने कहा ’’ इसमें खर्चा तो बहूत आएगा, तुम्हारा बापू कर पाएगा खर्चा? ’’
जगृति ने खुद में ही कहा ’’ एक दिन में नहीं होगा, मगर एक दिन तो जरूर होगा। ’’
सफर के लिए तो कोई भी समतल जमीन पर खड़ा होता है मगर समतल जमीन से उचांई पर बसे लक्ष्य तक सफर काफी कांटों भरा और मुसीबत भरा होता है। जागृति के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, मगर जितने अवरोध और जीतने विरोध आए, उनमें से सबसे बड़ा अवरोध-विरोध जागृति ने अपनी दुविधा को ही माना।
अक्सर यही होता है कि दुविधा की शुरूआत दुविधा पे खत्म। जागृति का यही विचार एकबारगी हुआ कि कदम पीछे ले ले और कोई छोटी-मोटी नौकरी करे। दुविधा को ऐसा हुआ प्रहार कि प्रथम प्रयास में ही प्राप्त हार। प्रशंसा करने वाले अब निंदा करने वालों में परिवर्तित हो गए। माता-पिता तो जागृति का मनोबल बढ़ाते रहे।
मगर मंजरी को बढ़ाया हुआ मनोबल ’’ उठ री जागृति, अपने नाम को सार्थक कर। ’’ ने चमत्कारिक भुमिका निभाई, जागृति की जागृति को वापस लाने में।
पश्चाताप में तपी जागृति ने दुसरे प्रयास में प्रशासनिक अधिकारी बन कर समाज और देश का नाम रौशन किया।
समाप्त।