Padchinha in Hindi Children Stories by Rajeev kumar books and stories PDF | पदचिन्ह

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पदचिन्ह

पदचिन्ह

बचपन में दादा-दादी, नाना-नानी की सुनाई गई कहानियां किसको अच्छी नहीं लगती है भला। उन कहानियों में भुत-प्रेत, परियों और देवी-देवताओं की कहानियों का जिक्र होता है। विभिन्न तरह के खेल-खिलौने भी बच्चों को बहूत भाते है।
सी-साईड सोंसाईटी के बगल में एक बस्ती थी। हर तरह के काम करने वाले, हर जाति के लोगों का निवास उस बस्ती में था। थोड़ी ही दुरी पर समुद्र भी था। बस्ती के बच्चे साहिल की रेत पर अपनी-अपनी पसंद का खेल खेलते थे। उन्ही बच्चों की भीड़ में एक बच्चा ऐसा भी था जिसको कि रेत पर निशान छोड़े किसी के पाँव में पाँव डालकर चलने में ही मजा आता था। वो इतना सम्भल कर पैर से बने गड्धे में अपने पाँव रखता था कि वो गड्धा रेत से न भरे।
खेल-खिलौनों की जगह इसी खेल में रौनक व्यस्त रहता था। और इस खेल में रौनक की व्यस्तता इतनी थी कि उसका ध्यान दुर खेल रहे अपने दोस्तों की तरफ नहीं जाता था बल्कि उसके दोस्तों की ही नज़र बारी-बारी से रौनक पर पड़ती रहती थी।
अपना खेल खत्म कर उसके दोस्त कमल और शीला, मयंक और विष्णू रौनक के पास आए और तालियां बजाने लगे।
कमल ने कहा ’’ देखना एक दिन ये रेत के महल बनाएगा। ’’
मयंक ने कहा ’’ अरे नहीं पागल, देखता नहीं है कि रेत पर उभरे सबके पाँव के नाप ले रहा है, देखना एक दिन ये जुता ही बनाएगा। ’’
विष्णू ने कहा ’’ रौनक भाई, हमलोगों को भी इस खेल का मतलब समझाओ न। ’’
शीला मुस्कराती रही और बोली ’’ चलो, तुम्हारे घर में जाकर बोलती हुं, मंदबूद्धि कहीं के। ’’
रौनक से मिल कर उसके दोस्तों को हंसने का सामान मिल जाता था।
घर में पिता की दो छड़ी लगने के बाद रौनक ने कहा ’’ कल से नहीं करूंगा। ’’
रौनक की माँ दौड़ती हुई आयी और बोली ’’ जाने दिजीए, कल से नहीं करेगा, बच्चा के साथ आप भी बच्चा बन जाते हैं। ’’
रौनक को कुछ शब्द बड़े ही खास लगते थे और लुभावने ढंग से आकर्षित करते थे, जैसे- पद, पदचाप और पदचिन्ह। खास कर पदचिन्ह, जिसके बारे में जीज्ञासावश वो लोगों से पुछा करता था, पदचिन्ह के सवाल पर उसके बबलू चाचा ने कहा ’’ देखो, सीधी सी बात, पद का मतलब पैर और चिन्ह का मतलब निशान, मतलब कि चलने के कारण जमीन पर जो निशान पड़ते हैं वही तो पदचिन्ह है। ’’
बबलू चाचा की कही गयी बात उसके पल्ले नहीं पड़ी और नन्हा रौनक खुद को इस सवाल में और उलझाता गया। स्कूल और कॉलेज लाईफ तक मन के किसी कोने में ’ पदचिन्ह’ बड़ा सवाल बन कर बैठा रहा। मंथन के बाद यही निष्कर्ष निकला कि ’ पदचिन्ह ’ मतलब राह में चलने पर किसी के पाँव से बना चिन्ह, जिसका कि अनुसरण सब करते हैं।
रह-रह कर उसको बचपन का पसंदीदा खेल रेत पर बने किसी के पाँव के से बने निशान पर पाँव रखने की याद आ जाती थी। वो पैर के निशान किसका हो सकता है, किसी साधारण आदमी का या फिर किसी विद्धान का। खैर जिसका भी हो हमको तो विद्धान के पदचिन्ह का ही अनुसरण करना है, रौनक ने यह ठान लिया।
पदचिन्ह से लक्ष्य तक का सफर काफी अवरोध और काफी विरोध भरा था। मगर रौनक ने सिर्फ चलना सिखा और पाँच वर्ष के अथक प्रयास के बाद रौनक ने अपना लक्ष्य, प्रशासनिक अधिकारी बन कर प्राप्त किया।
रौनक ने अपे समाज और देश का नाम रौशन किया और सबका प्रेरणास्रोत बन गया।

समाप्त