बीसों साल बीत गए, सब कुछ कितना बदल गया। लेकिन आज
वह मन बना कर उठा कि इस बार गांव जाना होगा तो दादी से जरूर मिलेगा।
कुछ दिन बीते रामेसर अपने गांव आया और जैसा कि उसने तय कर रखा था दादी से मिलने अपने काका के घर पहुंचा।
दादी अब वैसी न रह गई थी, उसका शरीर सिमट कर एक मुरझाये फूल की तरह हो गया था। जुते हुए खेत की धारियाँ जैसी होती है वैसी ही अनगिनत झुरियाँ उसके चेहरे पर थीं। उसकी चमड़ी मानो ऐसी कि जैसे किसी ने काले रंग की पॉलीथिन पहना दी हो।
एक हंसती इमारत बदलकर टूटे फूटे खंडहर में बदल गई थी।
रामेसर लगभग डेढ़ वर्ष बाद दादी से मिल रहा था उसे पता था कि दादी के हजारों उलाहनों, शिकायतों का सामना करना होगा।
उसने दादी की हालत देखी तो एकबार के लिए डर गया, अपने मन को मजबूत करते हुए रामेसर दादी के पास बैठ गया और धीरे से बोला- दादी
दादी ने जैसे दुनिया का पहला वाक्य सुना हो
वह चौंक उठी।
रामेसर ने उसका हाथ पकड़ा और धीरे से अपने सिर पर रख दिया। कई देर तक हाथ फेरते-टटोलते दादी की अंधी आखें तालाब की तरह भर आई।
रामेसर को लगा उसकी आँखों में एक कहानी चल पड़ी है।
सालों गुजर गए उन बातों को और आज यकायक सम्मुख जीवंत हो उठी। रामेसर इतना कठोर दिल करके उससे बातें कर रहा था जैसे हृदय की जगह कोई फौलाद रखा हुआ हो। क्योंकि ऐसा न करता तो वह फूट पड़ता।
उसका हृदय दो खण्डों में होता और वह रो पड़ता। दादी ने उसका हाथ ऐसे पकड़ रखा था जैसे उसके सिवा रामेसर पर किसी का कोई अधिकार ही न हो।
रामेसर ने पूर्ण रूप से समर्पण कर अपने हाथ दादी के हाथों में छोड़ देना ही उचित समझा। अब वह दादी की गहरी झुरियां गिनने में खो गया था।
दादी के हाथ मानों जैसे कोई काठ के बने हों और वो हर क्षण अपने हाथों की कसावट रामेसर की कलाइयों पर बढ़ाती जा रही थी।
उसकी आँखों से रोशनी जा चुकी थी फिर भी रामेसर उन बुझे दियों की तरफ देखने से डर रहा था, वह सोच रहा था कि कहीं मेरा मायूस उजड़ा चेहरा वो देख ना ले।
दादी की आंखों में बड़े-बड़े मैले के टिब्बे जम रखे थे।
जो किसी समय दो खेत दूर देख लेती थी वो दो फिट दूर बैठे अपने पोते को नहीं देख सकती, यह सोच सोच कर रामेसर अधीर हुआ जा रहा था।
आंखों में दो बड़े बड़े साफ-सफेद गोल बादल उसकी आंखों की सुन्दरता और कम कर थे। रामेसर दादी के चेहरे को देखता सोचने लगा कि कैसे एक बार हमने गन्ने खरीदे थे और कैसे दादी ने झटपट उन को दांतों से ही चीर कर हममें बांट दिए थे।
लेकिन आज उसका मुंह जैसे बिना हवा का गुबारा था, महज तीन दांत बचे थे, जिनपर मानो किसी ने सोने की परत चढ़ा दी हों वैसे पीले।
रामेसर ने जैसे-तैसे उसके साथ एक आध घंटा बीताया और एक जगह एकांत पाया।
रामेसर इतनी जोर से रोया कि मानो उसके क्रंदन से दिवारें जैसे फट जाएंगी। आंसुओं से पूरी आस्तीन भीग गई थी।
उस समय रामेसर का मन कर रहा था कि दादी को हर एक नज़ारा अपनी आंखों से दिखा दूं।
उसे बताऊं कि कहां तेरी प्यारी बकरी बंधी अपने बच्चों को दूध पिला रही है, और उस कोने में अब क्या रखा है जिस कोने तेरी खाट रखी रहती थी।
हमारे खेत का वो पुराना नीम जहां हम दुपहर की कांदा रोटी खाते थे वो पिछले अंधड़ में कैसा टूटा पड़ा है।
उसका बस चलता तो वह अपनी आँखें दादी की आंखों पर चढ़ा देता।
वह दिखाता कि दादी देख में कितना बड़ा हो गया हूँ, देखे मेरी दाढ़ी मूंछ निकल आई है दादी, मैं कैसा दिख रहा हूँ?
दादी अपने लकड़ी से हाथ रामेसर के चेहरे पर फिराए जा रही थी, उसका पूरा बदन टटोल टटोलकर देख रही थी, जैसे किसी बच्चे की चवन्नी रेत के ढेर में खो गई हो। बाहर होने वाली हर आहट दादी को शंकित कर रही थी कि रामेसर अब चला जाएगा।
उसके लकड़ी से हाथ रामेसर की कलाइयों पर इतनी देर से कसे थे कि जब दादी ने उसकी कलाइयां छोड़ी तो उसके पंजे बिलकुल सुन थे।
रामेसर को एक ही बात की खुशी थी कि वो दादी को इस बात के लिए मना पाया कि अबकी बार जल्द ही वह उसके पास कुछ दिनों के लिए आएगी और साथ रहेगी।
रामेसर ने जाते हुए दादी को बस एक झलक मुड़ कर देखा उसके गालों की झुरियां वापस वीरान हो गई थीं, अपने को सहज सी दिखाती अपनी अस्त व्यस्त सफ़ेद बालों की लटियां ठीक करती, चेहरे पर सिवाय करुणा और असहायता के कुछ नहीं था। उसकी निस्तेज़ आंखों के बादल बरस कर झुरियाें में जमी मैल को साफ़ कर रहे थे, दादी के हाथों से निकलते ही जैसे मैं उसके लिए असीम अंधकार में कहीं खो गया और वो इस वेदना और दुख के साथ बैठी रो रही थी कि काश एक बार फिर से हाथों में आ जाए।