नफरत का सामना और पुरानी यादें
दरभंगा की सड़कों पर आज अजीब सा सन्नाटा था। खबर फैल चुकी थी कि शहर में एक नया कड़क ऑफिसर आया है जिसने ज्वाइन करते ही ठाकुर साहब के दो खास गुर्गों को हवालात में डाल दिया है। ये खबर जब ठाकुर हवेली पहुँची, तो वहां का माहौल गरम हो गया।
सनाया का दबदबा
हवेली के बरामदे में 30 साल की सनाया ठाकुर बैठी थी। वो अब वो 5 साल की बच्ची नहीं थी जो गिरकर रोने लगती थी। आँखों में काजल, गले में सोने की पतली चैन और चेहरे पर एक ऐसी कड़वाहट जो बरसों की दुश्मनी से पैदा हुई थी। उसके सामने उसके पिता भानु प्रताप ठाकुर गुस्से में टहल रहे थे।
"कौन है ये नया लड़का? किसकी इतनी मजाल कि हमारे आदमियों पर हाथ डाले?" भानु प्रताप दहाड़े।
सनाया ने ठंडे दिमाग से अपनी चाय का घूंट भरा और बोली, "पापा, सुना है मुंबई से आया है। नाम पृथ्वी राठौर बता रहा है। शायद राजवीर चाचा का बेटा है, जो 25 साल पहले दुम दबाकर भागा था।"
भानु प्रताप के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आई। "अच्छा! तो वो बच्चा वापस आया है? उसे लगा कि वर्दी पहनकर वो इस इलाके का शेर बन जाएगा? उसे पता नहीं कि यहाँ आज भी ठाकुरों का ही सिक्का चलता है।"
पहली आमने-सामने की टक्कर
उधर पुलिस स्टेशन में पृथ्वी अपनी मेज पर बैठा कुछ फाइलें देख रहा था। तभी बाहर शोर हुआ। चार-पांच गाड़ियाँ स्टेशन के गेट पर आकर रुकीं। उनमें से सनाया ठाकुर शान से नीचे उतरी। उसके पीछे हथियारों से लैस उसके गार्ड्स थे।
वो सीधे पृथ्वी के केबिन में बिना इजाजत घुस गई। पृथ्वी ने सिर उठाकर देखा। 25 साल बाद सनाया उसके सामने खड़ी थी। उसकी खूबसूरती में अब एक तीखापन था।
"सुना है आपको पुरानी यादें ताजा करने का बहुत शौक है, ऑफिसर?" सनाया ने उसकी मेज पर हाथ टिकाते हुए कहा।
पृथ्वी अपनी कुर्सी से उठा। उसकी लंबाई और वर्दी का रौब सनाया को थोड़ा असहज कर गया, पर उसने दिखाया नहीं। "पुरानी यादें नहीं सनाया ठाकुर, पुराने हिसाब चुकता करने आया हूँ। और मेरा नाम रिकॉर्ड में 'ऑफिसर राठौर' लिखा है, तमीज से लीजिएगा।"
सनाया मुस्कुराई, पर उसकी आँखों में नफरत थी। "तमीज हमारे यहाँ बड़ों को दी जाती है, वर्दी वालों को नहीं। हमारे आदमियों को छोड़ दीजिए, वरना दरभंगा में आपका पहला हफ्ता आखिरी भी हो सकता है।"
पृथ्वी उसके करीब आया और धीरे से बोला, "धमकी सरकारी दफ्तर में मत दो सनाया। याद है बचपन में जब गिर गई थी तो रोती हुई मेरे पास ही आई थी? आज भी अगर कानून की ठोकर लगी, तो संभल नहीं पाओगी।"
सनाया का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसे वो बचपन का सीन याद आ गया, लेकिन उसने तुरंत खुद को संभाला। "वो बचपन था। अब मैं गिरती नहीं, गिराती हूँ। संभलकर रहिएगा, राठौर साहब।"
वो पैर पटकती हुई बाहर निकल गई, लेकिन जाते-जाते उसकी नजर पृथ्वी की मेज पर पड़े एक छोटे से पत्थर पर पड़ी—वही पत्थर जो बचपन में पृथ्वी ने उसकी खिड़की पर छोड़ा था। उसे देखकर सनाया के दिल में एक पल के लिए कसक हुई, पर उसने उसे झटक दिया।
दुश्मनी का नया मोड़
अगले कुछ दिनों में पृथ्वी ने ठाकुरों के अवैध धंधों पर नकेल कसना शुरू कर दिया। उसने शहर के बीचों-बीच उस जमीन पर फिर से काम शुरू करवा दिया जिसे लेकर दोनों परिवारों में झगड़ा हुआ था।
भानु प्रताप ने पृथ्वी के पिता राजवीर जी को फोन किया।
"राजवीर, अपने बेटे को समझा ले। वर्दी की गर्मी यहाँ नहीं चलेगी। अगर उसे कुछ हुआ, तो उसका जिम्मेदार तू होगा।"
राजवीर जी ने दूसरी तरफ से शांत होकर जवाब दिया, "भानु, अब वो मेरा बेटा नहीं, इस देश का अफसर है। और उसे रोकना अब मेरे बस में भी नहीं है।"
एक अनचाही मुलाकात
एक शाम, पृथ्वी शहर के पुराने तालाब के पास अकेला टहल रहा था। तभी वहां सनाया भी अपनी गाड़ी से गुजरी। उसने गाड़ी रोकी और नीचे उतरी। वहां कोई और नहीं था।
"क्यों कर रहे हो ये सब? तुम्हें पता है ना कि तुम मेरे पिता से नहीं जीत पाओगे?" सनाया की आवाज़ में इस बार थोड़ी नरमी थी।
पृथ्वी ने तालाब के पानी की तरफ देखते हुए कहा, "जीत-हार की बात ही नहीं है सनाया। बात सही और गलत की है। तुम्हारे पिता ने मेरे परिवार को जो जख्म दिए, वो शायद मैं भूल जाता... लेकिन उन्होंने इस शहर को जो जख्म दिए हैं, उन्हें भरना जरूरी है।"
सनाया उसके पास जाकर खड़ी हो गई। "तुम्हें क्या लगता है, तुम अकेले सब बदल दोगे?"
"अकेला नहीं हूँ, सच मेरे साथ है," पृथ्वी ने उसकी तरफ मुड़कर देखा। दोनों की नजरें मिलीं। नफरत के उस समंदर के नीचे कहीं न कहीं वो बचपन का प्यार अभी भी दबा हुआ था।
तभी अचानक झाड़ियों में कुछ हलचल हुई। भानु प्रताप के कुछ वफादार गुंडे, जो नहीं चाहते थे कि उनकी मालकिन दुश्मन से बात करे, उन्होंने पृथ्वी पर निशाना साधा।
"पृथ्वी! हटो!" सनाया चिल्लाई और उसने पृथ्वी को धक्का दिया। गोली पृथ्वी के कंधे को छूती हुई निकल गई।
पृथ्वी जमीन पर गिरा, और सनाया उसके पास घुटनों के बल बैठ गई। उसे खून बहता देख सनाया के हाथ कांपने लगे। बिल्कुल वैसे ही, जैसे बचपन में सनाया को चोट लगने पर पृथ्वी के हाथ कांपे थे।
"तुम्हें... तुम्हें गोली लग गई," सनाया की आवाज़ भर्रा गई।
पृथ्वी ने दर्द में भी मुस्कुराते हुए कहा, "बोला था ना... इतना तेज मत भागो, चोट लग जाएगी।"
सनाया को समझ नहीं आया कि वो उसे बचाए या उस पर चिल्लाए। वहीं से इस नफरत भरी कहानी में प्यार की पहली बूंद गिरी।