PURANI HAVELI KA RAAZ - 2 in Hindi Horror Stories by smita books and stories PDF | पुरानी हवेली का राज - 2

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पुरानी हवेली का राज - 2

आरव भागता हुआ अपने कमरे तक पहुँचा। उसकी रूह में एक अजीब-सी ठंडक उतर गई थी। कुछ देर तक वह अपने कमरे में यूँ ही चुपचाप बैठा रहा और बीती हुई सारी घटनाओं को याद कर सोचता रहा—  “आख़िर वह सब क्या था? ऐसा क्यों हो रहा था?”  तभी उसे उस डायरी की याद आई। उसने मन ही मन सोचा,  “शायद मेरे सभी सवालों के जवाब उसी डायरी के भीतर हों।”  यह सोचते ही जैसे ही आरव ने डायरी खोली, उसके पन्ने अपने-आप लिखने लगे—  “तुम अब हमारे साथ हो...”  पहले तो आरव को लगा कि यह सब उसका वहम है। उसने अपनी आँखें मलीं और ध्यान से डायरी को देखने की कोशिश की, लेकिन जैसे ही उसने और गौर से देखा, कमरे में सड़ी-गली-सी गंध, पुरानी मिट्टी की खुशबू और ठंडी हवा भर गई। आरव डर गया और चुपचाप अपने बिस्तर पर जाकर लेट गया।  रात के एक बजे, आरव को महसूस हुआ कि उसके कमरे का लैम्प अपने-आप जल और बुझ रहा है। उसने उसे ठीक करने की कोशिश की, लेकिन लैम्प ठीक नहीं हुआ। तभी डायरी के एक पन्ने से आवाज़ आई—  “आरव, दरवाज़ा खोलो...”  आरव का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा, फिर भी उसने हिम्मत जुटाकर दरवाज़ा खोल दिया। बाहर सन्नाटा था, लेकिन तभी उसके पीछे से ठंडी हवा का एक झोंका आया। उसने देखा कि डायरी का एक पन्ना अपने-आप लिख रहा था—  “हवेली बुला रही है, वापस आओ...”  आरव को कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसने सोचा शायद यह सब डर और थकान की वजह से हो रहा है। तभी डायरी से एक पुरानी, पीली-सी तस्वीर नीचे गिर पड़ी। उस तस्वीर में एक हवेली थी और उसके अंदर कुछ परछाइयाँ दिखाई दे रही थीं—मानो इंसानों की परछाइयाँ हों। आरव घबरा गया और उसने फैसला किया—  “मुझे दोबारा हवेली के भीतर जाकर यह सब समझना होगा।”  अगले दिन बारिश थम चुकी थी। सूरज की किरणें शहर की छोटी-छोटी गलियों पर पड़ रही थीं। आरव फिर से उस पुरानी हवेली के बाहर खड़ा था। उसके हाथ में वही डायरी थी, जो उसे हवेली के भीतर मिली थी। हवेली बाहर से बेहद शांत लग रही थी, लेकिन उसके मन में एक आवाज़ गूँज रही थी—  “यह शांति सिर्फ बाहर की है, भीतर सब ज़िंदा है...”  आरव का दिल तेज़ी से धड़क रहा था। उसे डर लग रहा था, फिर भी उसने अपनी साँसों को संभाला और हवेली के अंदर कदम रखा। जैसे ही वह भीतर गया, सीढ़ियों की ओर से तेज़ लाल रोशनी आ रही थी। एक पल के लिए उसकी साँसें मानो थम-सी गईं, लेकिन फिर हिम्मत जुटाकर वह उस रोशनी की ओर बढ़ा।  वहाँ एक कमरा था, और वहीँ से वह रोशनी आ रही थी। जब आरव कमरे के अंदर पहुँचा, तो उसकी आँखें फैल गईं। कमरे के बीचों-बीच ज़मीन पर लाल रंग से एक अजीब-सा चिन्ह बना हुआ था—एक गोल घेरा, जिसके भीतर कुछ अनजानी आकृतियाँ बनी हुई थीं। वही लाल रोशनी उसी चिन्ह से निकल रही थी। कमरे की दीवारों पर पुराने काले धब्बे थे, मानो किसी ने वहाँ चीखते-चीखते अपनी साँसें छोड़ दी हों।  तभी अचानक दरवाज़ा ज़ोर से अपने-आप बंद हो गया।  धड़ाम!  आरव घबरा गया। उसने दरवाज़ा खोलने की कोशिश की, लेकिन वह टस से मस नहीं हुआ। तभी उसके पीछे से धीमी-सी फुसफुसाहट आई—  “इतनी जल्दी क्यों आए हो, आरव…?”  आरव ने कांपते हुए पलटकर देखा। कमरे के एक कोने में कोई आकृति खड़ी थी—न पूरी तरह इंसान, न पूरी तरह साया। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरा धुंध में डूबा हुआ था।  आरव की आवाज़ गले में अटक गई।  “त… तुम कौन हो?”  वह आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी और बोली—  “जिसे तुम ढूँढ रहे हो… वही।”  तभी आरव के हाथ में पकड़ी डायरी ज़ोर-ज़ोर से काँपने लगी। उसके पन्ने पलटने लगे और उस पर शब्द उभर आए—  “यह हवेली सिर्फ़ इमारत नहीं है… यह एक क़ैदख़ाना है।”  आरव की साँसें तेज़ हो गईं। डायरी में आगे लिखा था—  “सालों पहले, इस हवेली में कुछ लोगों ने अमर होने की चाह में एक अनुष्ठान किया था। उन्होंने ज़िंदा इंसानों की बलि दी… लेकिन अनुष्ठान अधूरा रह गया। क्योंकि अनुष्ठान को पूरा करने के लिए एक बच्चे के खून की बलि चढ़ाना था.....“आरव, तुम संयोग से यहाँ नहीं आए हो… तुम्हारा जन्म इसी हवेली से जुड़ा है।”  आरव के दिमाग़ में अचानक टूटी-फूटी यादें आने लगीं—उसके बचपन के सपने, एक जलती हुई हवेली, किसी औरत की चीख, और एक बच्चा…