भाग पाँच
चिट्ठी का इंतजार
घर में भीड़ थी पर शोर नहीं था, आँगन में लोग बैठे थे, पर किसी की आँखें एक-दूसरे से नहीं मिल रही थीं।
रामदीन के घर में पहली बार चुप्पी ने जगह घेर ली थी।
मोहन के जाने की ख़बर किसी ने ज़ोर से नहीं कही, बस इतना कहा गया — “अब नहीं रहा।”
अम्मा ने सिर हिलाया, जैसे वे यह वाक्य
कई दिनों से सुनने की तैयारी कर रही थीं।
उन्होंने न रोया, न चीखी, न बेहोश हुईं, वे बस चौकी पर बैठ गईं, जैसे इंतज़ार की आदत अब भी गई नहीं हो।
लोग कहते, जब माँ रोती नहीं, तो सबसे ज़्यादा डर लगता है, अम्मा पूरे दिन कुछ नहीं बोलीं, किसी ने पानी दिया, उन्होंने नहीं लिया, किसी ने दिलासा दी उन्होंने नहीं सुना,
वो बार-बार आँगन के कोने में रखे संदूक की ओर देखती रहीं जिसमे मोहन की चिट्ठियाँ थीं।
शाम ढल रही थी, तभी डाकिया चाचा आए,
वे अकेले नहीं आए थे उनके साथ कस्बे का एक बाबू था,डाकिया चाचा के हाथ में एक पोस्ट कार्ड था पीला पोस्ट कार्ड जिसका कोना फटा था, अम्मा ने पहली बार आँख उठाकर देखा।
“अब क्या है?” उनकी आवाज़ सूखी थी।
डाकिया चाचा बोले- “यह… मोहन की चिट्ठी है।”
सभी चौंक पड़े, बाबूजी ने पोस्ट कार्ड लिया।
कभी-कभी सबसे मुश्किल काम होता है
अंतिम शब्द पढ़ना।
बाबूजी ने पोस्ट कार्ड लिया उस पर लिखावट पहचान में आ रही थी जो बहुत हल्की थी,
जैसे लिखते-लिखते हाथ थक गया हो।
उन्होंने पढ़ना शुरू किया, बाबूजी ने पढना शुरू किया उनकी आवाज़ काँपने लगी।
“अम्मा, बाबूजी…
अगर यह चिट्ठी आपको मिले, तो समझ लेना कि मैं घर नहीं लौट पाया, मैंने बहुत कोशिश की पर देह ने साथ नहीं दिया, मुझे माफ़ करना कि मैं आपकी सेवा नहीं कर सका।
अम्मा, आपकी लिखी हर चिट्ठी मेरे सिरहाने रखी रही, जब दर्द बढ़ता था तो मैं आपकी लिखावट देख लेता था और मुझे लगता था
आप पास बैठी हो, बाबूजी आपने जो सिखाया मैं वही करता रहा कभी गलत रास्ता नहीं चुना, अगर संभव हो तो मेरी पुरानी कमीज़ कभी पहन लेना मुझे लगेगा
मैं आपके पास घर में हूँ,मैं जा रहा हूँ… पर आप लोगों के बीच ही रहूँगा।
आपका
मोहन”
चिट्ठी खत्म होते ही बाबूजी की आवाज़ टूट गई पोस्ट कार्ड हाथ से गिर पड़ा अम्मा उठीं
उन्होंने पोस्ट कार्ड को उठाया और धीरे-धीरे पढ़ने लगी, हर शब्द के साथ उनका चेहरा सख़्त होता गया, अंत में उन्होंने चिट्ठी को सीने से लगा लिया और तब… पहली बार
उनकी आवाज़ निकली- “ओ... मेरा बेटा तूँ आ गया।” यह रोना नहीं था यह पहचान थी माँ के विलाप की अम्मा ज़मीन पर बैठ गईं और अपनी छाती पीटते हुए कहती रही।
“मैं बुलाती रही… तू नहीं आया और अब
तू चिट्ठी बनकर आ गया।”
घर में रोने की आवाज़ उठी पर अम्मा का रोना सबसे अलग था।
डाकिया चाचा बाहर खड़े थे उनकी भी आँखों से आँसू गिर रहे थे उन्होंने इतने साल चिट्ठियाँ बाँटी थीं पर आज पहली बार मोहन की इस चिट्ठी ने उन्हें तोड़ दिया था।
उन्होंने खुद से कहा- “काश ये चिट्ठी पहले पहुँच जाती।”
रात गहराने लगी थी लोग चले गए घर में सिर्फ अम्मा और बाबूजी थे अम्मा ने चिट्ठी संदूक में नहीं रखी वे उसे अपने तकिए के नीचे रखकर लेटी रही।
आधी रात को अम्मा उठीं उन्होंने बाबूजी से कहा — “वह गया नहीं है।”
बाबूजी चुप रहे।
अम्मा बोलीं- “जब तक उसकी लिखावट है तब तक वह यहीं है हमारे पास।” रात भर अम्मा बाबूजी से कहती रही.
सुबह हुई तो आज पहली बार अम्मा चौकी पर नहीं बैठीं उनकी नजरे दरवाजे पर ही टिकी रही आदतें मौत से जल्दी नहीं जातीं।
अब उस घर में इंतज़ार नहीं था…बस चिट्ठीयों में स्मृति थी।
समाप्त