Chiththi ka Intzaar - 1 in Hindi Fiction Stories by Deepak Bundela Arymoulik books and stories PDF | चिट्ठी का इंतजार - भाग 1

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चिट्ठी का इंतजार - भाग 1

"चिठ्ठी का इंतजार"

एक ज़माना था…
जब समय घड़ी की सुइयों से नहीं, इंतज़ार की धड़कनों से मापा जाता था।

उस छोटे से कस्बे की सुबह बड़ी सादी होती थी। सूरज निकलता, चूल्हों में आग जलती, और गलियों में झाड़ू की आवाज़ गूंजती।
पर जिस आवाज़ का सबको बेसब्री से इंतज़ार रहता, वह होती थी — डाकिया की साइकिल की घंटी।

रामदीन के घर में यह इंतज़ार जैसे रोज़ की पूजा थी। आँगन में पीपल के पत्तों की छाया पड़ती थी। बीच में एक पुरानी चौकी रखी रहती, जिसके चारों पाये ज़मीन में धँस चुके थे। उसी पर बैठी रहती थीं अम्मा — आँचल सिर पर, आँखें गली के मोड़ पर टिकी हुई।

“आज आएगी क्या?”
यह सवाल अम्मा रोज़ खुद से करतीं।

बाबूजी अख़बार लेकर बाहर बैठते, पर पढ़ते कम थे। हर थोड़ी देर में चश्मा उतारकर गली की तरफ देखते और फिर अख़बार में नज़र गड़ा देते, जैसे खुद को समझा रहे हों —
नहीं आई तो क्या हुआ, कल आ जाएगी।

हम बच्चे उस इंतज़ार को नहीं समझते थे
हमें तो बस डाकिया चाचा की जेब में रखी टॉफ़ी और उनकी साइकिल की घंटी से मतलब था।

डाकिया चाचा… पूरा कस्बा उन्हें इसी नाम से जानता था उम्र पचास के पार, दुबला शरीर, सफ़ेद खादी का कुरता और कंधे पर लटका भारी थैला।

वह थैला सिर्फ चिट्ठियों से भरा नहीं होता था,
वह ज़िंदगियों से भरा होता था किसी घर में हँसी बाँटने वाली खबर तो किसी घर में मातम।

डाकिया चाचा यह बात जानते थे
इसीलिए जब वह साइकिल चलाते थे, तो चेहरे पर एक अजीब-सी गंभीर शांति रहती थी उस दिन भी दोपहर ढलने लगी थी
धूप आँगन से खिसक कर दीवार पर चढ़ गई थी अम्मा की आँखें थकने लगी थीं।

तभी…

ट्रिन… ट्रिन… गली के मोड़ से साइकिल की घंटी सुनाई दी।

“आ गया! डाकिया आ गया!” हम बच्चे उछल पड़े।

अम्मा का दिल ज़ोर से धड़का बाबूजी चुपचाप खड़े हो गए।

डाकिया चाचा ने साइकिल रोकी थैले में हाथ डाला कुछ पल रुके, यह रुकना…सबसे भारी होता था, फिर उन्होंने एक लिफ़ाफ़ा निकाला।

अम्मा की साँस अटक गई।

“मोहन की चिट्ठी है,” डाकिया चाचा ने धीमे से कहा।

उस पल, जैसे पूरे घर में रोशनी भर गई।

अम्मा ने चिट्ठी ली और माथे से लगा ली
उनकी आँखें नम थीं पर होठों पर मुस्कान।

“देखा, मैंने कहा था आएगी,” उन्होंने बाबूजी से कहा। सब आँगन में इकट्ठा हो गए चिट्ठी खोलने से पहले अम्मा ने दीया जलाया
यह उनकी आदत थी — खुशी भी ईश्वर के सामने।

बाबूजी ने चिट्ठी पढ़नी शुरू की।

“प्रिय बाबूजी और अम्मा,
मैं यहाँ ठीक हूँ…”

हर शब्द के साथ घर का बोझ हल्का होता गया।

हम बच्चे शब्द नहीं समझते थे,
पर आवाज़ का उतार-चढ़ाव समझ जाते थे।

जब बाबूजी की आवाज़ स्थिर रहती,
तो समझ जाते — सब ठीक है।

चिट्ठी पढ़कर अम्मा देर तक चुप रहीं फिर बोलीं, “शहर बड़ा निर्दयी होता है… पर मेरा बेटा मज़बूत है।”

उस शाम घर में सादा खाना बना,
पर स्वाद ऐसा था जैसे कोई त्यौहार हो।

रात को अम्मा ने चिट्ठी संदूक में रख दी
उसी संदूक में जहाँ बीते बीस सालों की चिट्ठियाँ सजी थीं हर चिट्ठी एक कहानी थी
हर कहानी एक इंतज़ार उसी रात अम्मा ने दीये के सामने बैठकर जवाब लिखा।

“बेटा, हम सब कुशल हैं।
तेरी चिट्ठी से मन भर आया।
तू अपना ध्यान रखना…”

स्याही सूखने तक, उनकी आँखें नहीं सूखी थीं, यह था वह ज़माना… जब शब्द धीरे चलते थे, पर दिल तक सीधे पहुँचते थे।

और यही था रामदीन के घर का जीवन —
इंतज़ार में बंधा हुआ। हर रोज का कल...

क्रमशः-2