बाबा भाग 2
सुबह के पाँच बज चुके थे। शहर धीरे-धीरे जाग रहा था। आसमान में हल्की लालिमा थी, जैसे सूरज ने पर्दे के पीछे से झांककर दुनिया को पुकारा हो।
गली के कोने पर चायवाले की केतली से उठती भाप, सड़क पर सफाई कर्मचारी की झाड़ू की खट-खट, और दूधवाले की घंटी — जीवन शुरू हो चुका था।
लेकिन राहुल के बेडरूम में अब भी अंधेरा पसरा था। नींद, थकान और जिम्मेदारियों के बोझ से उसका शरीर मानो बिस्तर से चिपका हुआ था।
क्लॉक 6:30 दिखा रही थी, तभी ट्रिन-ट्रिन-ट्रिन — अलार्म जोर से बजा।
राहुल ने करवट बदली और फोन बंद किया। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे, चेहरा थका हुआ लेकिन मन में एक ही ख्याल —
"आज फिर वही भाग-दौड़ वाला दिन…"
वह उठकर खिड़की की ओर गया। बाहर सड़क पर बच्चे स्कूल बस का इंतजार कर रहे थे — हँसते हुए, बैग झुलाते हुए।
राहुल की आंखें कुछ पल उन बच्चों पर अटक गईं।
"कितनी बेफिक्री है इन में… काश मैं भी यूँ जी पाता।"
उसने धीमी सांस ली।
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घर की हलचल
नैना रसोई में थी। गैस पर पराठे फूल रहे थे, चाय की खुशबू फैल रही थी।
आरव और अन्वी कमरे से बाहर आए — एका-एक चालू दुनिया की सबसे प्यारी दो मुस्कुराहटें।
आरव: "गुड मॉर्निंग पापा!"
अन्वी (मुट्ठी खोलते हुए): "देखो, मेरे हेयर बैंड में आज तितली लगी है!"
राहुल (हल्का मुस्कुराते हुए): "बहुत सुंदर! मेरी गुड़िया आज तो परी लग रही है।"
बच्चों की बातों में वो थकान पलभर के लिए गायब हो गई।
पर नैना ने पीछे से टोका —
"राहुल, जल्दी नहाओ… नौ बजे की मीटिंग है ना?"
राहुल फिर वास्तविकता में लौट आया।
"हाँ… बस पाँच मिनट।"
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डाइनिंग टेबल का दृश्य
टेबल पर चार प्लेटें सजी थीं।
नैना बच्चों को पराठे देती है, खुद अंतिम में बैठती है —
जैसे हर भारतीय माँ, सबसे बाद में खाना।
आरव: "पापा, आज स्कूल में स्पोर्ट्स का प्रैक्टिस है।"
अन्वी: "और आज टीचर ने कहा है कि पेंटिंग बनानी है।"
राहुल: "अच्छा? बढ़िया! क्या बनाओगी?"
अन्वी: "गार्डन! वहाँ झूले, स्लाइड और पप्पा साथ खेलेंगे!"
इन शब्दों ने राहुल के अंदर कुछ चुभोया।
वह चुप हो गया।
नैना ने धीमे से कहा,
"राहुल… बच्चे कब से गार्डन जाने को कह रहे हैं।"
राहुल ने बच्चों को देखा — चमकती आंखें, उम्मीदें।
वह झूठी खुशी के साथ बोला,
"आज ऑफिस से जल्दी आ जाऊँगा। शाम को चलते हैं, पक्का वादा।"
बच्चे खुशी से उछल पड़े।
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ऑफिस की भागदौड़
भीड़-भाड़ वाली सड़कों से गुजरते हुए राहुल बाइक चला रहा था।
हवा चेहरे से टकरा रही थी पर मन में सवाल —
"क्या मैं अच्छा पिता हूँ?
या बस पैसे कमाने की मशीन…?"
ऑफिस में बड़े स्क्रीन, फाइलें, शेड्यूल।
सहकर्मी, तनाव, डेडलाइन।
मिस्त्री सर (तेज आवाज में):
"राहुल! ये रिपोर्ट शाम तक चाहिए।
क्लाइंट कॉल है रात को, समझे?"
राहुल (मन मारकर):
"जी सर, कर दूंगा।"
वह कंप्यूटर स्क्रीन पर आंखें गड़ाए काम करता गया।
समय बीतता गया…
सांझ हुई, फिर रात।
मोबाइल स्क्रीन पर बच्चों का मिस्ड कॉल झिलमिला रहा था।
"पापा जल्दी आना… हम तैयार हैं…"
वह संदेश देखता है लेकिन जवाब नहीं दे पाता।
दिल बोझिल। पर जिम्मेदारी की जंजीरें पैरों में भारी।
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देर रात घर वापसी
घर पहुंचा तो 9:30 बज चुके थे।
दरवाजा नैना ने खोला। उसके चेहरे पर चिंता और थोड़ी सी शिकायत थी — पर शब्द नहीं।
टेबल पर खाना ठंडा हो चुका था।
बच्चे सोफे पर बैठे पापा के इंतज़ार में ऊंघ रहे थे।
आरव: "पापा… गार्डन…?"
अन्वी (उंगली मुंह में दबाकर): "आज भी नहीं गए…?"
राहुल थकान से बोला,
"बेटा, काम बहुत था। कल चलेंगे, पक्का।"
बच्चों ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप अपने कमरे में चले गए।
उनकी धीमी पैरों की आवाज़ ने राहुल के दिल पर चोट की।
नैना करीब आई —
"राहुल, मैं समझती हूँ। तुम मेहनत करते हो हमारे लिए।
लेकिन बच्चे… यादें चाहते हैं, चीज़ें नहीं।"
राहुल कुछ कह नहीं पाया।
नींद ने जल्द ही उसे घेर लिया।
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फ्लैशबैक — सपना
अचानक दृश्य बदल गया।
वह एक खूबसूरत गार्डन में था।
हरी घास, ताज़ी हवा, बच्चों की हँसी।
आरव झूले पर बैठा चिल्ला रहा था —
"पापा, मुझे धक्का दो!"
अन्वी स्लाइड पर चढ़ रही थी —
"पापा देखो! मैं ऊपर से उतरूंगी!"
राहुल दोनों को धक्का देता है, हँसता है।
वह इस पल को दिल में भर लेता है —
जैसे खोई हुई चीज़ वापस मिल गई हो।
नैना पास बैठी है।
पत्तों के बीच से सूरज की रोशनी उसके चेहरे पर गिर रही है।
नैना: "राहुल, बच्चों के साथ यह समय कभी वापस नहीं आता।"
राहुल (धीमी आँखें नम): "हाँ… मैं जानता हूँ।"
बच्चे उसके गले लगते हैं।
एक छोटा-सा परिवार — पूरा, खुश, संतुष्ट।
फिर अचानक सब धुंधला होने लगता है।
हँसी की आवाज़ दूर जाती है…
गार्डन फीका पड़ता है…
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जागृति
नैना: "राहुल! उठो… ऑफिस नहीं जाना क्या?"
ट्रिन-ट्रिन अलार्म फिर बजा।
राहुल हड़बड़ाकर उठा।
हाथ माथे पर —
"ये… सपना था?"
वह खिड़की से बाहर देखता है —
वही सड़क, वही बस, वही रूटीन।
आरव बैग लेकर खड़ा है।
अन्वी बोतल टांगे, आँखों में वही मासूम उम्मीद।
राहुल ने उन्हें कसकर गले लगाया।
बच्चे हैरान — उन्होंने पहली बार पापा को यूँ पकड़ते देखा।
नैना किचन से बोली —
"सब ठीक हो राहुल?"
राहुल की आवाज भारी थी,
"हाँ… बस मन भारी है।
मैं बच्चों से लगातार वादा करता हूँ… निभा नहीं पाता।"
नैना मुस्कुरा दी —
"वादा शब्द है राहुल… उसे निभाना याद बना देता है।"
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ऑफिस जाते हुए आत्मसंवाद
राहुल बाइक पर बैठा — इंजन चालू।
बच्चे दरवाजे पर खड़े हैं, उसे हाथ हिलाते हुए।
वह उन्हें देखता है, मुस्कुराता है।
फिर भीतर हल्के से बुदबुदाता है —
"बच्चों… मुझे माफ कर दो।
मैं घड़ी के कांटों से बंधा हुआ हूँ।
पर वादा — एक दिन ये बंधन तोड़कर
मैं तुम्हारा समय बनूंगा।"
वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता है।
घर पीछे छूट रहा है,
पर दिल वहीं अटका…
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अंत — भावनात्मक निष्कर्ष
ज़िंदगी रोज़ दोराहे पर खड़ी मिलती है —
एक तरफ़ कमाने की मजबूरी,
दूसरी तरफ़ परिवार की प्यासी नज़रें।
राहुल चल रहा है,
पर आज उसकी चाल में सोच है,
दिल में टीस है,
और एक संकल्प —
"मैं काम करूँगा, पर अपना अस्तित्व पिता के रूप में भी जियूँगा।
क्योंकि खिलौने टूट जाते हैं…
पर पापा के साथ बिताए पल दिल में हमेशा रहते हैं।"
कहानी समाप्त —
लेकिन राहुल के जीवन में एक नई शुरुआत की रेखा खिंच चुकी है।