Mere shabd meri pahchan - 13 in Hindi Poems by Shruti Sharma books and stories PDF | मेरे शब्द मेरी पहचान - 13

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मेरे शब्द मेरी पहचान - 13

तो साल की आखरी शाम उन सभी जवानों के नाम जो इस देश की और हम सभी की हिफाज़त के लिए हर दम सीमा पर तैनात हैं । चाहे धूप हो , बारिश हो , आँधी हो , तूफान हो और चाहे कक्कपाती सर्दी हो वे हर पल हमारी सुरक्षा के लिए तत्पर है बिना अपनी जान की परवाह किए । अपनी खुशियों में उन्हे शामिल करना ना भूलना मेरे यारों क्योंकि ये जो जिंदगी तुम हस्ते , मुस्कुराते जी रहे हो ना वो उन्ही की देन है । और अगर ना विश्वास हो तो एक कल्पना कर सकते हो अपनी जिंदगी की बिना उन फौजियों की बदौलत ।
आशा है मेरी ये कविता आपको बेहद पसंद आएगी ।

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---- अमर शहीद कप्तान विक्रम बत्रा ----

*जिंदगी की हर चुनौती से मैं डटकर टकराऊँगा ,
की अपना कर्तव्य पूरा किए बिना मौत भी आ गई
तो उसे भी उसकी कब्र में दफनाउँगा ,
फौजी हूँ या तो शान से तिरंगे को लेहराऊँगा ,
या फिर उसी तिरंगे की शान से नवाज़ा जाऊँगा ।

*जब आऊँगा तो या तो तू मुझे या फिर मैं तुझे गले लगाऊँगा ,
अगर जो तूने लगाया गले तो मैं याद बन जाऊँगा ,
दिलों में ही सही मगर आबाद बन जाऊँगा ,
जब याद आऊँ मैं तो होना खड़े आईने के सामने क्षणों में ही तेरे सामने आऊँगा ,
कभी खयालों तो ख्वाबों में आकर तेरी यादों को सजाऊँगा ।

*ना निभा सका जो बेटे भाई और पति का धर्म वो अगले जन्म में निभाऊँगा ,
मगर हर बार देश धर्म को ही सबसे ऊँचा बतलाऊँगा ,
मेरे आने की उम्मीद ना छोड़ना मेरे भाई ,
इस बार नहीं तो अगली बार सही
मगर ये वादा रहा
मैं लौट कर ज़रूर आऊँगा । ।
मैं लौट कर ज़रूर आऊँगा । ।


*एक फौजी के रुतबे से बड़ा और कोई रुतबा कहीं नहीं ,
मेरे जाने के गम में ही डूबे रहो ये तो सही नहीं ,
मैनें कहा ना मैं आऊँगा ,
इसलिए याद रखना
देश के लिए ना बहाया लहू का एसा कोई कतरा नहीं ,
अगर जो ना आऊँ लौट के तुमसे मिलने
तो मैं भी विक्रम बत्रा नहीं ।।
मैं भी विक्रम बत्रा नहीं ।।

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---- कोई हो जो सच हो भी झूठ से देखे ----

*कोई तो हो जो मेरे सच को भी झूठ से देखे,
मनाऊँगी उसे या नहीं ये जानने के लिये वो मुझसे रूठ से देखे,
जान रख दूँ हथेली पर दोस्त के लिए
मगर कोई तो हो
जो दिल से बस एक बार मेरा हाल पूछ के देखे।।
कोई तो हो जो मेरे सच को भी झूठ से देखे।।


*बात छिपाऊँ कोई तो तिरछी नजरों में यूँ शक से देखे,
कोई हो अपना जो मुझे भी अपने दोस्त के हक से देखे,
माना की मैं इतना घुल्ती मिलती नहीं
मगर कोई हो
जो मेरी खमोशी की पहेलियाँ बूझ के देखे।।
कोई तो हो जो मेरे सच को भी झूठ से देखे।।


*की ठीक हूँ सुनकर अच्छा तो सभी कहते हैं,
मगर कोई हो जो हकीकत की गहराई भांप के देखे,
मेरे मन में चल रहे तूफान के कहर को कोई नाप के देखे,
मैं दोस्त के लिए बिखरने को तैयार हूँ
मगर कोई हो
जो मुझे जोड़ने के लिए खुद टूट के देखे।।
लुटा कर प्यार मुझपे मेरा दिल लूट के देखे।।
कोई तो हो जो मेरे सच को भी झूठ से देखे।।


✍🏻✍🏻--श्रुति शर्मा


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