bansi in Hindi Philosophy by Poonam Singh books and stories PDF | बंसी

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बंसी

"बंसी"

"कृष्णा,,,!! कृष्णा......!!ओ....कृष्णा, कहाँ गया।" माँ के बारम्बार पुकारने पर भी कृष्णा कहीं नज़र नहीं आया।
"पता नहीं ये लड़का कहाँ चला जाता है बिना बताए...?" माँ बुदबुदा रही थी। माँ फिर निष्ठा के कमरे में गई। वो अपने कमरे में स्टडी टेबल पर बैठी पढ़ाई कर रही थी।
"निष्ठा तूने कृष्णा को कहीं देखा क्या?" माँ ने चिंतित स्वर में पूछा...!
""नहीं माँ..!यहीं कहीं होगा...आ जाएगा। ..तू चिंता मत कर।"
माँ को चिंतित देख कर निष्ठा ने कहा -; "अच्छा ठीक है माँ,मै देखती हूँ।"
निष्ठा कमरे से निकलकर बाहर आई और भाई को आवाज़ दे कर पुकारने लगी .....कृष्णा....कान्हु....ओ कान्हु भईया कहाँ हो...आ जाओ...!
"दीदी मैं यहाँ हूँ छत पर"। कृष्णा की आवाज़ आई। एक निष्ठा की ही आवाज़ थी जिसे सुन कर कृष्णा कहीं भी छुपा हो तुरंत सामने आ जाता था।

माँ और बहन दोनों ने छत की तरफ देखा तो कृष्णा छत के किनारे पर खड़ा था।कृष्णा का घर था तो पक्के का,पर इतना भी नहीं...क्योंकि छत पर जाने कि सीढ़ियां आज भी कच्ची लकड़ी की ही थी।
कृष्णा भी समझता था,माँ को राज़ी करने का इससे अच्छा तरीका नहीं था।माँ और बहन के लिए ये कच्ची सीढ़ियाँ चढ़ना उतना सरल नहीं होगा...पर आठ साल के कृष्णा के लिए ये सीढ़ियाँ चढ़ना मानो माखन के समान था।

यूं छत के किनारे पे कृष्णा को खड़ा देख कर माँ का तो जैसे डर के मारे कलेजा मुँह कोआ गया।
माँ बिगड़ने लगी "तू ऊपर छत पर गया क्यों?चल नीचे आ!" कृष्णा ने कहा-;"मैं नीचे ज़रूर आऊँगा पर पहले तू वादा कर की तू मुझे बंसी के घर ले कर जाएगी ।"

माँ भी मन ही मन पछता रही थी कि कल मंदिर में क्यों मैंने इसका हाथ छोड़ दिया था और ये भाग कर मंदिर के बाहर भीख मांग रहे बच्चे को अपने दान पात्र में डालने वाले पैसे उसे दे दिए।तब भी कोई बात नहीं,दान वाले पैसे किसी अच्छी जगह पहुँच जाएँ अच्छी बात है...पर उस बच्चे कि हिम्मत थी अदभुत..! ना जाने कृष्णा को देख कर उसे क्या सूझा,उसने तुरंत कृष्णा की ओर अपना हाथ बढ़ाते हुए बोला "मुझसे दोस्ती करोगे?!"कृष्णा ने भी झट अपना हाथ बढ़ा कर कह दिया "हाँ करूँगा"।
वो तो मैंने समय पर पहुँच कर उसका हाथ पकड़ लिया,अन्यथा वो बंसी के साथ उसके घर ही चला जाता।माँ मन ही मन बोल रही थी...! कल से ही रट लगा रखी है कि बंसी के घर ले चलो...ले चलो..!।समझता ही नहीं की उस गंदी बस्ती में ले कर कैसे जाऊँ!
माँ कृष्णा के हठी स्वभाव से परिचित थी।उसके पास 'हाँ' कहने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था।
माँ ने कृष्णा से कहा "अच्छा ठीक है नीचे आ जा हम चलेंगे बंसी के घर।" कृष्णा झट से सीढ़ियाँ पकड़ के नीचे उतर आया।
"अब चलो..!" कृष्णा ने माँ की उंगली पकड़ कर कहा!! तभी निष्ठा ने कहा "माँ मैं ले कर जाऊँ? "माँ ने निष्ठा की ओर देख कर कहा "हाँ ठीक है ले जा,पर एक पल के लिए भी उसकी उंगली मत छोड़ना।"

कृष्णा शुरू से ही कुछ अलग विचारों वाला बालक था।माँ जब भी बाज़ार में बच्चों के लिए कुछ लेने जाती तो दोनों बच्चों को साथ ले कर जाती।रास्ते में दिखने वाले हर भिखारी बच्चे उसके कोमल मन को आघात पहुँचाते थे और माँ से बार बार उन्हें कुछ पैसे देने को कहता, पर माँ हर बार एक ही बात कहती "भीख को बढ़ावा नहीं देना चाहिए।" पर कृष्णा शांत बैठने वाला कहाँ था,वो भी पूछता "फिर माँ क्या करना चाहिए?"माँ अधिक विस्तार में ना जा कर यही कह देती "पढ़- लिख कर स्वयं को सुदृढ करना चाहिए।"
बाज़ार पहुँचकर कृष्णा कभी भी माँ की खरीददारी में शामिल नहीं होता था।वो बाहर ही बैठने कि जिद्द करता,माँ को कहता, "माँ तू अपनी खरीददारी कर ले, मै बाहर में ही तेरा इंतज़ार करता हूं।" माँ भी कृष्णा के चैतन्य मन से भली भांति परिचित थी। माँ थी कैसे ना समझती...!! कृष्णा अपने हमउम्र वाले बच्चों को भीख मांगते...कूड़ा के ढेर पर से कूड़ा चुनते या फिर बाल मजदूरी करते देखता तो उसके करुण, निष्कलुश मन को तकलीफ पहुँचती थी।उनकी तरफ बहुत सकरूण, संवेदित दृष्टि से घंटो निहारता रहता..! कभी - कभी ना जाने क्या सोचकर उपर आसमान की ओर देखता, शायद माँ ने कभी कहा होगा कि भगवान उपर रहते है।
माँ कृष्णा को निष्ठा के सुपुर्द कर उसका ध्यान रखने की हिदायत दे देती।
निष्ठा की बारह साल की छोटी उम्र और आठ साल के कृष्णा को कितना संभाल पाती, पर एक बड़ी बहन होने के दायित्व का बोध था, और फिर भाई को प्रेम भी तो बहुत करती थी। उसने माँ को कृष्णा के सुरक्षित देखभाल का विश्वास दिलाया और कहा "ठीक है माँ मै कृष्णा का ध्यान रखूँगी।"

कृष्णा ने उस छोटी उम्र में ही मन ही मन अपने रास्ते का चुनाव कर लिया था।

"कृष्णा...ओ कृष्णा भईया.. रुको तो सही..! इतनी जल्दी जल्दी कहा भागे चले जा रहे हो..?! बहुत दिन से मिले नहीं..?!..पीछे से बंसी की आवाज़ आई...!
ये वही बंसी है,कृष्णा के बचपन का मित्र.!
कृष्णा और बंसी दोनों अपने बचपन की दहलीज पार कर तरुनाई को प्राप्त हो चुके थे।
कृष्णा थोड़ी देर रुक कर मुस्कुराता हुआ बंसी की ओर देख कर कहने लगा,"बंसी भाई आज थोड़ी जल्दी में हूं,मेरे संस्था "नचिकेता" से अभी खबर आया था कि वहाँ पे पढ़ने वाले तीन विद्यार्थियों को विदेश की अच्छी यूनिवर्सिटी में आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति स्वीकृत हो गई है।उसी संदर्भ में औपचारिकता पूरा करने के लिए जल्दी पहुँचना है।"
"वो तो सब ठीक है कृष्णा भईया पर उनके विदेश गमन का खर्चा भी काफी महँगा होगा।वो कैसे करोगे?" चिंतित स्वर में बंसी बोला...!
कृष्णा ने मुस्कराते हुए कहा "अरे तू चिंता क्यों करता है...अभी तक सारा काम जैसे ऊपर वाले ने संभाला है,आगे भी वही रास्ता निकालेगा और फिर तू भी तो है।"..कृष्णा फिर ऊपर आसमान की ओर देखता है बचपन में माँ द्वारा कहीं गई बात अभी तक उसके जहन में बैठी हुई थी।
"अरे कृष्णा भईया ये कहकर मुझे शर्मिंदा ना करो,मै तो तुम्हारे लिए पूर्ण रूपेण समर्पित हूँ । तुमने बचपन में अपनी माँ से हठ करके मेरी पढ़ाई का भार वहन ना किया होता तो मै आज भी उसी भिखारी की बस्ती में".....इतना कहते हुए बंसी की आँखें नम हो गई, "आज तुम्हारे सहयोग से थोड़ी बहुत विद्या अर्जन कर मैंने एक लघु गृह उद्योग खोला है और उसमें कुछ लोगों को रोजगार भी दिया है।" बंसी कृष्णा का हाथ थामते हुए कहने लगा "मेरे हिस्से की पूरी आमदनी तुम्हें समर्पित है।"
बंसी की बात सुन कर कृष्णा का मन भाव विभोर हो गया।और बंसी की ओर प्रसन्नचित मुद्रा में देख के बोला;"चल ठीक है दोस्त मैं तुझसे मिलता हूँ। बंसी के मन को भी बहुत अच्छा लगा और जाते जाते पूछने लगा" माँ और दीदी कैसे हैं?" "दोनों अच्छे हैं।दीदी इसी संस्था में काम करती है।"इतना कह कर कृष्णा तेज कदमों से अपने संस्था की और निकाल पड़ा।

कृष्णा भली भांति समझता था कि अगर "किसी का बचपन सुधार गया तो समझो उसका पूरा जीवन सुधार गया।

पूनम सिंह
स्वरचित / मौलिक