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ऋषभ विश्वकर्मा - Rishabh Vishwakarma
क्रान्तिकारीओं को नमन ऋषभ करत शत कोटि नमामी | स्वाधीन हेतु वीरतु जामी ॥ सकल नमन क्रान्ति वलिदानी । प्राणों तज स्वाधीन दानी ॥१॥ सन् सत्तावन लक्ष्मी बाई । सतालीस में गाँधी आई ॥ तिनहिँ बीच सब क्रान्तिकारी । स्वाधीन दे देश उपकारी ॥२॥ मङ्गल पाण्डे लक्ष्मीबाई । नाना तात्या खूब लड़ाई ॥ बेगम हज बहादूर साहा । नमन करूँ इन्ह शीश नाहा ॥३॥ कुँवर सिंह बहादुर खाना । फिरोज और सब वीर नाना ॥ रण करिके गोरन्ह भगाई । नमन करूँ देश की भलाई ॥४॥ भगत राजगुरू सुखदेव नमन । गङ्गाधर खुदीराम बिपइन ॥ उधम सिंह सावरकर बिस्मिल । भीमराव नमन अशफाकुलिल ॥५॥ राजपत रा शेखर सुभाषा । युद्ध विजय पा संयम राखा ॥ नेहरू पटेल अबुकलामा । नमन निज निज कर देश थामा ॥६॥ महात्मा गांधी बुद्धिवाना । किए समर आन्दोलन नाना ॥ नमन करूँ दुष्टन से तारी । निज निज बलन शत्रु संघारी ॥७॥ नमन करूँ सब क्रान्तिकारी । शत्रु मार भारत उद्धारी ॥ याद रखेङ्गे सब बलिदाना । बलिदान दे भू ऋण चुकाना ॥८॥ - -ऋषभ विश्वकर्मा
ऋषभ परिचय जाहि कृपा पिपीलिका पार जाई । महान समुन्द्र का थाह लगाई ॥ जाहि कृपा नापा धरती आकाशा । होवे पूरा सब मन अभिलाषा ॥१॥ जाहि कृपा जन्म जन्म तक ज्ञान । देई दर्शन सदैव भगवान ॥ मुरझाया सुमन खिल जाता है । गरल महाअमृत हो जाता है ॥२॥ जाहि कृपा भक्त सब ब्रह्माण्ड की । थाह लगा पातें धाम ईश्वर की ॥ दुःख कष्ट पीड़ा पाप दूर जाई । तीनऊँ ताप कबहूँ न सताई ॥३॥ जाहि कृपा मोह माया दूर जाई । भक्तन्ह पर बनी राम कृपाई ॥ ऐश्वर्य समृद्धि सुख शान्ति पाई । मुक्ति पाई रघुपति धाम जाई ॥४॥ जाहि कृपा दुष्ट सन्त मुक्ति पाई । कर्म रूपी जीवन से तर जाई ॥ जाहि सेवक करत सेवकाई । उत्तम पुण्य उत्तम फल पाई ॥५॥ धर्म कर्म काम मोक्ष राम दास । मैं ऋषभ विश्वकर्मा ताहि दास ॥ राम भजन कीर्तन गुण गान । कीन्ह मोहि जग नामी भगवान ॥६॥ राम की सेवा कर दास कहाई । सेवा से ऋषभदास नाम पाई ॥ उत्तम दीक्षा शिक्षा पिता नें दिया । भा गुरु मोर सर्व सम्पन्न किया ॥७॥ माता पिता प्रथम भगवान हैं । वही मोरे हेतु उत्तम गुरु हैं ॥ जनक का नाम राधेश्याम मोरे । जननी का नाम बाला देवी मोरे ॥८॥ कुल विश्वकर्मा ब्राह्मण वर्ण है । शाण्डिल्य गोत्र लौहकार कर्म है ॥ आराध्य देव प्रभु विश्वकर्मा हैं । विश्वकर्मा पुत्र मनु से जन्मे हैं ॥९॥ भक्ति रस का मैं कवि कहलाता । परमेश्वर की महिमा को गाता ॥ शारदा कृपा से रचना करता । महिमा गाकर पाप उतारता ॥१०॥ ब्रह्माण्ड वसुधालोक जम्बूद्वीपं । भरतखण्ड आर्यावर्त भारतं ॥ प्रसिद्ध आर्यमगढ़ नगरी है । अद्भुत सुन्दर ग्राम लहुआँ है ॥११॥ शङ्करपुर का गृहसमूह है । लौहकार वंश का लोहरान है ॥ जयराम नामक एक गृह है । राम कृपा से वही मेरा धाम है ॥१२॥ लहुआँ माटी से तिलक लगाता । लहुआँ की माटी का पुत्र कहाता ॥ लहुआँ की माटी में जन्म लिया हूँ । ता में राम गुण गाता मैं पला हूँ ॥१३॥ कवि - ऋषभ विश्वकर्मा (ऋषभदास)
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