The Download Link has been successfully sent to your Mobile Number. Please Download the App.
Continue log in with
By clicking Log In, you agree to Matrubharti "Terms of Use" and "Privacy Policy"
Verification
Download App
Get a link to download app
तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर, तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं। हमपे नाराज़गी, इतनी तारी रही, बैठ कर पहलू में मुस्कुराए नहीं। तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर, तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं। नींद आई नहीं, हमको कल रात को, क्या कहे,कैसे समझाया, जज़्बात को, मेरे शिकवों पर तुम रूठ ऐसे गए, आज सुबह भी खिड़की पे आए नहीं। तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर, तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं। आज छत सामने वाली खाली दिखी, थोड़ा गुमसुम सी वो नखरे वाली दिखी, जब से देख तेरा, गमजदा चेहरा, या खुदा आज तक भूल पाए नहीं। तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर, तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं। तू दुआ दे, दवा दे, जहर आज दे, हैं क़ुबूल मुझे, तू बस आवाज दे, साथ हैं चाहते उम्र भर का तेरा, आके मंजिल पे तू छोड़ जाए नहीं। तुमको आते नज़र, हम मगर सितमगर, तुमने आंगन के परदे उठाए नहीं। प्रिया अरविंद।
ले, मै डूब गया, चुल्लू भर पानी में, उतर कर उस पार तू, अपनी बेगुनाही की सफाई ना दे। प्रिया अरविंद। - p
तुम नदी के उस किनारे,हम फंसे मझधार में। चाहते हो और क्या अब इम्तिहा ऐतबार में। तुम सबक हो जिंदगी का, उम्र भूलेगी नहीं, अब न बहकेंगे कदम देख लेना प्यार में। हम बड़े मासूम ठहरे,तेरी सादगी पर रीझ बैठे, और हमको बेच बैठा, तू भरे बाजार में। जानता हूं ये दिए, जलते जलते,बुझ चलेंगे, पर इनके सहारे कट सकेगी ये रात इंतजार में। अब किसी शिकवा शिकायत, की जगह बचती नहीं, पहले जैसी अब मुहब्बत, है कहां तकरार में। कश्तियां उसपार कैसे,जा सकेंगी सोच लो, जो छेद करके बैठे हो नाव की पतवार में। प्रिया अरविंद
जिस शमा को हवा के थपेड़ों से, बचाया गया, रौशनी के लिए। यकीन मानिए जनाब, उन्हीं चिरागों ने हमारी हथेली जला डाली। प्रिया अरविन्द।
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved | Powered by Custom Web Development Company India.
Copyright © 2026, Matrubharti Technologies Pvt. Ltd. All Rights Reserved.
Please enable javascript on your browser