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Prithvi Nokwal

Prithvi Nokwal

@prithvinokwal403810
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माँ, तू अब नहीं है मेरे सामने,
पर तेरी सीखें और दुआएँ हैं मेरे साथ।
तेरी यादें बन गई हैं मेरी ताकत,
तेरी ममता की छाया रहेगी सदा मेरे जीवन में।

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नाना-नानी का घर बहुत बड़ा नहीं था, पर उसमें दिल भर देने वाली जगह थी। कच्चा आँगन, मिट्टी की खुशबू और सुबह-सुबह चूल्हे का धुआँ। मामा-मामी का अपनापन, नानी की मीठी डाँट, नाना की शांत मुस्कान— सब कुछ सादा, पर सच्चा। वो गाँव, वो गलियाँ, जहाँ शोर नहीं, सुकून रहता था। आज भी यादों में वही छोटा सा घर सबसे बड़ा लगता है।
- Prithvi Nokwal

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कुछ इसलिए भी खास था नानी का घर क्योंकि वहां,
मेरी मां को भी मां का प्यार मिलता था...❤️

पता नहीं जीवन मे ऐसा क्यों लग रहा है जितना भी मैं जिया हूं पूर्ण रूप से गलत ही जिया हूं! पता नहीं क्यों?

माँ तेरे जानें के बाद खुद को असुरक्षित सा महसूस कर रहा हूं, ऐसा लगता है मेरा सुरक्षा कवच टूट गया हो!
- Prithvi Nokwal

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इतने साल हो गये इन बातों को , ये कह देने से कोई बात खत्म नहीं हो जाती !

अहंकार को साथ लेकर चलता मैं वह शख्स हूं जिसने जीवन में सब कुछ गवा दिया
- Prithvi Nokwal

अपने जीवन की कहानी का पिछला पन्ना पलटकर जब भी देखता हु तोह इस बात का दुख रहता कि जीवन में अब तक कुछ खास नहीं किया !

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क्या कांग्रेस 2029 का चुनाव इस बात पर लड़ेगी की राहुल गांधी अम्बानी के घर शादी में नहीं गया ?

अठारह दिनों के महायुद्ध ने द्रौपदी को अस्सी वर्ष की स्त्री-सी थका दिया था—
न केवल शरीर से, बल्कि आत्मा और चेतना से भी।
चारों ओर विधवाओं की भीड़ थी।
पुरुष गिने-चुने दिखाई देते थे।
अनाथ बच्चे दिशाहीन भटक रहे थे।
और उन सबके बीच—
हस्तिनापुर के राजमहल में,
महारानी द्रौपदी
निश्चेष्ट बैठी
शून्य को निहार रही थी।
तभी…
श्रीकृष्ण कक्ष में प्रवेश करते हैं।
कृष्ण को देखते ही द्रौपदी संयम खो बैठती है।
वह दौड़कर उनसे लिपट जाती है।
कृष्ण उसके सिर पर हाथ फेरते रहते हैं—
कुछ कहते नहीं,
उसे रो लेने देते हैं।
कुछ क्षणों बाद
वे उसे अपने से अलग कर
पास के पलंग पर बैठा देते हैं।
द्रौपदी (कातर स्वर में):
“यह क्या हो गया, सखा?
मैंने तो ऐसा अंत कभी नहीं सोचा था…”
कृष्ण (गंभीर शांति से):
“नियति अत्यंत क्रूर होती है, पांचाली।
वह हमारे विचारों के अनुसार नहीं चलती।
वह केवल हमारे कर्मों को
परिणामों में बदल देती है।
तुम प्रतिशोध चाहती थीं—
और तुम सफल हुईं, द्रौपदी।
केवल दुर्योधन और दुःशासन ही नहीं,
सम्पूर्ण कौरव वंश समाप्त हो गया।
तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए।”
द्रौपदी (पीड़ा से):
“सखा,
क्या तुम मेरे घावों पर मरहम रखने आए हो
या उन पर नमक छिड़कने?”
कृष्ण:
“नहीं द्रौपदी,
मैं तुम्हें सत्य से परिचित कराने आया हूँ।
हम अपने कर्मों के दूरगामी परिणाम
पहले नहीं देख पाते…
और जब वे सामने आते हैं,
तब उन्हें रोकने का कोई उपाय नहीं रहता।”
द्रौपदी (कंपित स्वर में):
“तो क्या इस युद्ध की
पूर्ण उत्तरदायित्व केवल मेरा है, कृष्ण?”
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कृष्ण:
“नहीं, द्रौपदी।
स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो।
किन्तु यह सत्य है—
यदि तुम अपने कर्मों में
थोड़ी-सी भी दूरदर्शिता रखती,
तो स्वयं इतना कष्ट न पाती।”
द्रौपदी:
“मैं क्या कर सकती थी, सखा?”
कृष्ण (धीमे किंतु स्पष्ट स्वर में):
“तुम बहुत कुछ कर सकती थीं।
जब तुम्हारा स्वयंवर हुआ था—
तब यदि तुम कर्ण का अपमान न करतीं
और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का अवसर देतीं,
तो संभव है परिणाम भिन्न होते।
जब कुंती ने तुम्हें
पाँच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया—
यदि तुम उसे अस्वीकार करतीं,
तो परिस्थितियाँ कुछ और दिशा ले सकती थीं।
और फिर—
अपने महल में
दुर्योधन से यह कहना
कि ‘अंधों के पुत्र अंधे होते हैं’—
यदि वह वाक्य न कहा गया होता,
तो चीरहरण की वह विभीषिका
संभवतः घटित न होती।”
कृष्ण क्षण भर रुकते हैं,
फिर कहते हैं—
“द्रौपदी,
हमारे शब्द भी हमारे कर्म होते हैं।
और हर शब्द को बोलने से पहले
उसे तौलना अनिवार्य है।
क्योंकि शब्दों के दुष्परिणाम
केवल बोलने वाले को ही नहीं,
पूरे परिवेश को
दुख और विनाश में झोंक देते हैं।”
वे दृष्टि उठाकर कहते हैं—
“इस संसार में
केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है
जिसका ज़हर उसके दाँतों में नहीं,
उसके शब्दों में होता है।
इसलिए—
शब्दों का प्रयोग
सदैव सोच-समझकर करो।”

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