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मेरी उड़ान में भी थोड़ा नूर है, पर तेरी नज़र में सब दूर है। मेरे लिए एक आसमान है तुझे अपनी छत पर गुरूर है मैं राख भी हो जाऊँ तो क्या, तेरे नाम का धुआँ मशहूर है। मैं टूट के भी तुझसा रहता हूँ, ये इश्क़ बड़ा ही मजबूर है। मैं रातों को चाँद से बोलूँ, तेरी खिड़की पे पर्दा ही दूर है। मैं हस्ते हुए भी टूटता हूँ, तेरे चेहरे पे क्यों इतना नूर है? मेरे लफ़्ज़ तेरे नाम से भीगे, तेरे दिल में मेरा क्या कसूर है? तू चुप है तो बर्छियाँ चलतीं, मेरी ख़ामोशी में भी सुरूर है। मैं जज़्बों की आग में पिघला, तेरे सीने में ठंडा सा हूर है। तू सोचता है मैं झुक जाऊँ, मेरी मिट्टी में ख़ुद का दस्तूर है। तेरी यादों के साये चलते, मेरी रग–रग में तेरा शोर है। तू शोहरत की चादर ओढ़े हुए, मेरे हिस्से में बस धूप–दूर है मैं चाँद को हाथ में थामकर भी, कह दूँ कि ये बस एक हूर है। तू छत पर खड़ा है ऐ ‘रोनी’, मेरा दिल तो तिरे ही हुज़ूर है।
एक देशभक्त चाहिए ए भगत सिंह तेरे जैसा मेरे जैसा उसके जैसा या तेरे जैसा भगत सिंह तेरे खून में एक अलग ही बात थी आज के नौजवानों में खून नहीं मिलता तेरे जैसा मैं ढूंढता फिर रहा हूं इस दुनिया में मुझे कोई नहीं मिला आज तक तेरे जैसा और क्या ही था जादू इन्कलाब कि बोली में हर कोई चाहत रखता है बनने को तेरे जैसा तेरे जैसा बनना चाहते हैं सभी रोनी पर कौन बन पाया है तेरे जैसा मैं ढूंढ ढूंढ कर थक गया हूं रोनी पूरे जहां में कोई नहीं है तेरे जैसा और मुझे बता मैं क्या करूं क्योंकि मुझे बनना है तेरे जैसा मुझे बताया ही नहीं तुमने और कौन है तेरे जैसा
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