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“प्रकृति की पुकार” 🌿 मैं प्रकृति हूँ, मुझमें पर टिकी है दुनिया सारी। मेरे ही बच्चे मुझे देते कष्ट भारी, विधाता से यही है आस, कभी तो करवाए मेरे बच्चों को उनकी गलती का एहसास। मैं विनाश की ओर चली, मानवता की बलि चढ़ी। मानव सोच रहा—यह क्या हुआ? मेरे ही हाथों मेरा विनाश निश्चित हुआ। भयंकर गर्मी है—ना? क्या सोच रहे हो? सूर्य देवता नाराज़ हैं, उनसे क्या पूछते हो? चारों तरफ सड़क ही सड़क है, पेड़ों का निशान कहीं नहीं। इमारतों पर लगे ऐसे कूलर हैं, क्या पेड़ों का स्थान कहीं? जंगलों को काट रहे, अपना स्वार्थ साध रहे। जितनी तुम्हारी तादाद है, अब उतने पेड़ भी बचे नहीं, जमीन बन गई बंजर। पेड़ों को तो बचाया नहीं, जानवरों को ही छोड़ देते। जगह-जगह पॉलिथीन डालकर, क्यों उन्हें मार देते? सोचो, क्या यह पॉलिथीन इतना ज़रूरी है? मानव ने क्या खेल रचाया, प्रदूषण हर ओर फैलाया। नदियों में अब जहरीला पानी है, फैक्ट्री की गैस प्राण-वायु पर भी भारी है। बहते पानी को जैसे रोक दिया, इतना कचरा उसमें झोंक दिया। खुद भी नहाए, जानवरों को भी नहलाया, अपने कपड़े भी धुलवाया। जल की ऐसी हालत देखकर जलचर भी घबराए, जलचर भी घबराए। मोबाइल ने जन-जन को घेरा है, और टावर से निकली तरंगों ने पक्षियों को घेरा है। जिंदा पक्षियों को लाश बना दिया, इंसानों का तो दिमाग भी घुमा दिया। मानव डरा हुआ है, सहमा है, सोच रहा—मेरा क्या होना है l अभी देर नहीं हुई है, जागो प्यारे, जागो। अब जल्दी तुम पेड़ लगाने भागो, अब जल्दी तुम पेड़ लगाने भागो।
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