बांसुरी को धुन भाग :+09 in Hindi Moral Stories by prem chand hembram books and stories PDF | बांसुरी की धुन - भाग 9

Featured Books
Categories
Share

बांसुरी की धुन - भाग 9


भाग : 09
धर्म किसका है?
सिनाराम मुर्मू कुछ क्षण तक बिल्कुल मौन खड़े रहे।
बरामदे में बैठे लोगों की निगाहें अब उन्हीं पर टिकी थीं।
बाहर मंदिर की घंटी की अंतिम ध्वनि भी धीरे-धीरे वातावरण में विलीन हो चुकी थी। पेड़ों के बीच से आती हवा पत्तियों को हिला रही थी, लेकिन बरामदे के भीतर जैसे समय ठहर गया था।
सिनाराम ने गहरी साँस ली।
फिर बोले—
सिनाराम: “रावण, तुम्हारा प्रश्न सुनने में सरल है, लेकिन उसके पीछे बहुत बड़ी बात छिपी है। मनुष्य अपने पूर्वजों की परंपरा को छोड़कर किसी दूसरे रास्ते पर चले, तो समाज की पहचान का क्या होगा?”
रावण दा शांत रहे।
सिनाराम ने आगे कहा—
सिनाराम: “हम संताल हैं। हमारी अपनी परंपरा है, अपने रीति-रिवाज हैं। पीढ़ियों से हमारे पूर्वज जिस मार्ग पर चलते आए हैं, क्या हम उसे यूँ ही छोड़ दें?”
रावण दा ने कुछ क्षण उन्हें देखा।
फिर धीरे से बोले—
रावण: “सिनाराम, मैं संताल समाज का हितैषी हूँ—यह तभी सार्थक माना जाएगा, जब मैं वास्तव में यह समझने का प्रयास करूँ कि हमारे लोग गरीब और पीड़ित क्यों हैं।”
वह थोड़ा रुके।
फिर प्रश्न किया—
रावण: “क्या उनके पास पैसे नहीं हैं? क्या उनके पास जमीन नहीं है? क्या उनके पास जंगल नहीं है? क्या उनके पास मेहनत करने वाले हाथ नहीं हैं?”
सिनाराम चुप रहे।
रावण दा की आवाज में अब गंभीरता थी।
रावण: “फिर प्रश्न यह होना चाहिए कि इन सबके बावजूद वे पीछे क्यों हैं? उनके जीवन में वह समृद्धि क्यों नहीं आई जिसकी संभावना उनकी धरती में है?”
उन्होंने बरामदे में बैठे लोगों की ओर देखा।
रावण: “सिर्फ किसी धर्म का नाम बदल देने से समाज नहीं बदलता। केवल पूजा-पद्धति बदलने से भी गरीबी दूर नहीं होती। समाज तब बदलता है, जब मनुष्य की सोच बदलती है।”
उन्होंने कुछ क्षण रुककर कहा—
रावण: “एक वैचारिक क्रांति ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को बदल सकती है।”
यह सुनकर लाल दा, जो अब तक चुपचाप बैठे थे, थोड़ा आगे खिसक आए।
रावण दा ने उनकी ओर देखा और कहा—
रावण: “लाल दा, अगर आप सबको मेरा बीच में बोलना बुरा न लगे, तो मैं सिर्फ एक शब्द जोड़ना चाहता हूँ।”
लाल दा मुस्कुराए।
लाल दा: “कहिए रावण दा। आज शब्दों को रोकने का समय नहीं है।”
रावण दा ने बरामदे के बाहर देखा।
ओस की कुछ बूँदें अभी भी घास की पत्तियों पर चमक रही थीं।
उन्होंने हाथ से बाहर की ओर संकेत किया।
रावण: “देखिए... ये ओस की बूँदें... यह मीठा पानी... यह हवा... क्या किसी जाति, संप्रदाय या वर्ण की है?”
कोई उत्तर नहीं आया।
रावण: “सूरज की रोशनी किसकी है? जंगल की हवा किसकी है? धरती किसकी है?”
उन्होंने धीरे से कहा—
रावण: “ठीक उसी तरह परमपुरुष को किसी देश, काल, पात्र, जाति या वर्ण की सीमा में बाँधा नहीं जा सकता।”
बरामदे में एक गहरी शांति उतर आई।
रावण दा की आवाज अब पहले से अधिक मृदु थी।
रावण: “लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि मनुष्य अपनी जड़ों को छोड़ दे। परमपुरुष को धारण करने का अर्थ तो यह है कि मनुष्य जिस कुल और वंश में जन्मा है, उसी का सच्चा हितैषी बनकर उठे।”
उन्होंने रामलाल की ओर देखा।
रावण: “यदि कोई मुसलमान है, तो उसके भीतर ईमान और मानवता और गहरी हो।”
फिर उनकी दृष्टि सिनाराम की ओर गई।
रावण: “यदि कोई संताल है, तो वह प्रकृति के और निकट आए—उसकी रक्षा करे, उसका संवर्धन करे और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए जंगल, जमीन, जल और संस्कृति को सुरक्षित रखे।”
उन्होंने कहा—
रावण: “यही वैचारिक क्रांति है।”
लाल दा अब तक ध्यान से सुन रहे थे। उन्होंने बैठे-बैठे ही कहा—
लाल दा: “रावण दा, शायद असली प्रश्न यही है कि हम धर्म को केवल पहचान समझते हैं या जीवन को बेहतर बनाने की साधना।”
रावण दा ने उनकी ओर देखा।
रावण: “बिल्कुल लाल दा। धर्म यदि मनुष्य को भीतर से बेहतर नहीं बनाता, तो केवल उसका नाम धारण कर लेने से क्या लाभ?”
सिनाराम अब पहले की तरह उत्तेजित नहीं थे।
उन्होंने पूछा—
सिनाराम: “लेकिन तुम यह कैसे कह सकते हो कि तुम्हारा मार्ग ही सत्य है?”
रावण दा ने तुरंत उत्तर दिया—
रावण: “मैंने कब कहा कि मेरा मार्ग ही सत्य है?”
सिनाराम कुछ क्षण उन्हें देखते रहे।
रावण दा ने कहा—
रावण: “मैं केवल इतना कह रहा हूँ कि मुझे जिस मार्ग पर सत्य की झलक दिखाई देती है, उस मार्ग पर चलने का अधिकार मुझे होना चाहिए। और आपको जिस मार्ग में सत्य दिखाई देता है, उस पर चलने का अधिकार आपको होना चाहिए।”
फिर उन्होंने रुककर कहा—
रावण: “लेकिन एक शर्त के साथ।”
सभी चौंककर उनकी ओर देखने लगे।
अभय: “क्या शर्त?”
रावण दा की आवाज गंभीर हो गई।
रावण: “हमारा मार्ग हमें मनुष्य से घृणा करना न सिखाए।”
बरामदे में फिर मौन छा गया।
रावण: “हमारा धर्म हमें दूसरे मनुष्य को छोटा समझना न सिखाए। हमारी पूजा हमें अहंकारी न बनाए। हमारी परंपरा हमें सत्य की खोज से न रोके। और हमारी आस्था हमें किसी दूसरे के विवेक को कैद करने का अधिकार न दे।”
सिनाराम की आँखें अब नीचे झुक गई थीं।
रावण दा ने धीरे से कहा—
रावण: “यदि कोई धर्म मनुष्य को प्रेम, सत्य, संयम, करुणा और सदाचार की ओर ले जाता है, तो उसके नाम पर झगड़ा क्यों?”
कुछ क्षण बाद सिनाराम ने पूछा—
सिनाराम: “और यदि तुम्हारे कारण हमारे लोग अपनी परंपरा भूल गए तो?”
रावण दा ने उत्तर दिया—
रावण: “तो मुझे दोष दीजिए। लेकिन पहले यह देखिए कि वे स्वयं क्या खोज रहे हैं।”
उन्होंने रामलाल और उसके परिवार की ओर देखा।
माही, आदोरी और सागुम शांत बैठे थे।
सलमा की आँखें अपने पति पर टिकी थीं।
रामलाल ने धीरे से कहा—
रामलाल: “मैं अपनी परंपरा का अपमान नहीं करना चाहता। मैं केवल अपने बच्चों को ऐसा जीवन देना चाहता हूँ जिसमें वे सत्य, अनुशासन और अच्छे कर्म सीखें।”
सिनाराम ने पहली बार रामलाल की बात बिना टोके सुनी।
कुछ देर तक वह उसे देखते रहे।
फिर उनकी दृष्टि ठाकुर आसन की ओर चली गई।
दीपक की लौ स्थिर थी।
बाहर सूर्य अब काफी ऊपर आ चुका था।
सिनाराम ने धीरे से पूछा—
सिनाराम: “रावण... यदि भगवान सबके हैं, तो क्या किसी को भगवान तक पहुँचने के लिए किसी विशेष जाति में जन्म लेना आवश्यक है?”
रावण दा ने उनकी ओर देखा।
उनके चेहरे पर हल्की मुस्कान आई।
रावण: “यही तो मैं आपसे पूछ रहा था, दा।”
सिनाराम कुछ नहीं बोले।
पहली बार ऐसा लगा जैसे प्रश्न रावण दा से हटकर उनके अपने भीतर उतर गया हो।
कुछ क्षण बाद उन्होंने अपने साथ आए लोगों की ओर देखा।
गणेश और अभय भी शांत थे।
सिनाराम ने कहा—
सिनाराम: “आज दीक्षा रोकने की बात लेकर आया था... लेकिन अब लगता है पहले हमें इस विषय को समझना होगा।”
अभय ने आश्चर्य से उनकी ओर देखा।
अभय: “तो क्या हम चले जाएँ?”
सिनाराम ने कुछ क्षण सोचा।
फिर बोले—
सिनाराम: “नहीं।”
उन्होंने रावण दा की ओर देखा।
सिनाराम: “आज कोई दीक्षा नहीं होगी।”
रामलाल का चेहरा उतर गया।
लेकिन सिनाराम ने अगला वाक्य कहा—
सिनाराम: “और न ही आज किसी को रोका जाएगा।”
सब लोग स्तब्ध रह गए।
सिनाराम ने आगे कहा—
“पहले हम सुनेंगे। समझेंगे। फिर निर्णय करेंगे कि हमें किस बात का विरोध करना है और किस बात का नहीं।”
रावण दा ने सिर झुका दिया।
उनके चेहरे पर विजय का भाव नहीं था।
मानो वे जानते थे—
किसी मनुष्य को पराजित करना आसान है, लेकिन उसके भीतर एक प्रश्न जगा देना कहीं अधिक बड़ा कार्य है।
तापस दा ने अपनी बेटी से कहा—
तापस: “बेटी, सबके लिए फिर से चाय बना ला।”
बरामदे में हल्की मुस्कान फैल गई।
सुबह की वह सभा, जो कुछ देर पहले टूटने की कगार पर थी, अब एक नए संवाद की शुरुआत बन चुकी थी।
लेकिन किसी को पता नहीं था कि इस संवाद के बाद संताल समाज के भीतर उठने वाला तूफान अभी बाकी था।
दूर गाँव के रास्ते पर एक अनजान आदमी खड़ा होकर तापस दा के घर की ओर देख रहा था।
उसने कुछ देर तक बरामदे में बैठे लोगों को देखा।
फिर धीरे से मुड़ा और जंगल की ओर चला गया।
उसके हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज था।
कागज पर केवल एक पंक्ति लिखी थी—
“रावण हेंब्रम यहाँ पहुँच चुका है।”
और उसके नीचे एक नाम था—
“देवघर।”

क्रमशः....