DASTAN-E-KARB भ्रम से परे क्या है? in Hindi Drama by Azoorey books and stories PDF | DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 4

The Author
Featured Books
Categories
Share

DASTAN-E-KARB - भ्रम से परे क्या है? - Chapter 4 Scene 4

"शेख़ बाबा हम्ज़ा की बहन आरामगाह में लाईं जा चुकीं है।" रुक्मणि ने उनके कमरे के दरवाज़े पर से उन्हें ख़बर दिया। 
हम्ज़ा की गुज़ारिश के मुताबिक़ इन्होंने मुंशीजी के ज़रिए शरबती के साथ उसे महल में लाने का हुक्म दिया था जो पूरा हो गया

"वो अम्मा साहब से मिलना चाहतीं हैं।" रुक्मिणी ने आगे बताया

शेख़ बाबा रुक्मिणी के साथ आरामगाह जाने के लिए रवाना हो गए। उन्हें इस रास्ते के बीच महल में ना कोई शक्स दिखाई दिया न ही उन्हें किसी तरह की कोई आवाज़ सुनाई दी। दिन की रौशनी में महल अंदर से रात की तरह गहरी शांति में था।

हम्ज़ा की बहन शेख़ बाबा को देखकर ताज़ीम में फ़ौरन खड़ी हो गई। ये पहली दफ़ा उसके क़दम किसी महल के अंदर आए थे। हया मीरास महल के बारे में जानती थी और ये भी की उसका भाई महल में बतौर ख़ास डाक्टर आता है। लेकिन आज से पहले उसने कभी भी किसी भी महल में क़दम नहीं रखा था क्योंकि उसकी नज़र में महल किसी अज़ाब से कम नहीं होते। 

उसकी उठी नजरें शेख़ बाबा की तरफ़ पहुंच गईं, उन छोटी छोटी नीली चमकीली आंखों में अब अपने सवालात करने के लिए इंतज़ार के पल ख़त्म हो गए। उसके चमकते चेहरे पर घबराहट की बूंदें थीं। शॉल से ढकी हुई, अपने थरथराते हाथों को वो अपने क़ाबू में करने की कोशिश में उलझी दिखी। शेख़ बाबा उसके सामने आ खड़े हुए।

"मुझे क्यों बुलवाया गया है, कोई मुझसे कुछ नही कहता। मुझे आप बताएं, मुझसे कुछ भी मत छुपाईए।" उसकी घबराई आवाज़ कांपते उदास लहजे में सुनकर शेख़ बाबा थोड़ा उलझ गए लेकिन उसके बाद उन्होंने उसका जवाब उन्हीं अल्फाजों में दिया जिसे उन्होंने महल के अंदर सबके ज़हन में पिरोया था

"आपने शायद इस मामले का ग़लत अंदाज़ा लगाया है। महल की तरफ़ से डॉकटर हम्ज़ा को दूसरे कस्बों की तरफ़ रवाना करवाया गया है उनके इलाज के सिलसिले में।"

"क्या आप मुझसे सच कह रहे है, क्या वाक़ई यही वजह है?" उसने शक की निगाह से बाबा को देखकर नरमी से कहा

"उसूलों के तहत आप मीरास महल की ज़िम्मेदारी है जबतक आपका भाई सही सलामत लौट नही आता।"

"मैं इन महलों से और इसकी आबोहवा से बख़ूबी वाक़िफ हूं। मैं जानती हूं मेरे भाई से कोई ख़ता हो गई है, उससे कोई जुर्म हुआ है जिसकी सज़ा के पाबंद वो बन चुके हैं।" उनसे सही जवाब न मिलने पर आंखो में नमी लेकर उसने ख़ुद वो बात कह दी जिससे शेख़ बाबा ने उसे दूर रखना चाहा "बताइए मुझे...ये सच नहीं है क्या?" 

"तुम्हे ऐसे ख़्याल क्यों आ रहे है?" शेख़ बाबा ने उसकी बातों पर सांस खींचकर पूछा

"उनसे अक्सर ऐसा होता है, उन्हें यक़ीन बहुत जल्दी हो जाता है। आख़िरकार न चाहते हुए भी उनसे ग़लतियां हो जाती है जिसका उन्हें अंदाजा नहीं होता। और इस वजह से आज सुबह उन्हें मीरास महल लाया गया था।" उसने कहा फिर पूछा "आप मुझसे उनके सिलसिले में कुछ भी मत छुपाएं।"

"मुझे नहीं मालूम ये अंदाज़ा तुम्हे कैसे हुआ। उसकी गुज़ारिश थी तुम्हें ब हिफ्ज़ो अमान इस मामले से दूर रखा जाए।" 

"दरअसल यही हक़ीक़त है।" उसने ख़ुद को बताया। आंसू की बूंदों ने अब उसकी आंखो का साथ छोड़ दिया "मैं उनकी बराबर की हिस्सेदार हूं, मैं इसे सुधार नहीं सकती मगर मैं भी सज़ा की हक़दार हूं।"

"गुलाब को पामाल करने वालों के पैरों में काटें धंसना तो लाज़मी है, वो उस सज़ा का हक़दार था जो उसे मिली लेकिन इन सब में तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है इसलिए तुम्हे माफ़ी तलब करने की ज़रूरत नही है।"

"मैं अपने आप की जवाबदार ख़ुद हूं, मैं महल के साथ साथ अपने भाई की भी गुनहगार हूं इसलिए हक़दार मैं भी हूं।" 

"उसने अपने आप को सज़ा का हक़दार पाते हुए तुम्हारे लिए यही तम्मन्ना किया है ताकि वो आज़माइशो के बिस्तर पर सुकून के दिन गुज़ार सके।" 

"क्या ऐसा भाई चाहतें है?"

"इसके आगे फ़ैसला तुम्हारा होगा और हम उसपर राज़ी हो जाएंगे।" शेख़ बाबा की बात पर वो ख़ामोश हो गई, कुछ देर बाद उसने फिर पूछा

"क्या आप और ये महल मुझसे खफ़ा नहीं है?" शेख़ बाबा ने नज़र उठाकर उसकी तरफ़ देखा "मैने सुना है गुनहगार के साथ उसका खानदान भी गुनहगार बन जाता है और उनका तो मेरे अलावा कोई और है भी नहीं।" उसने कहा 

सर से लेकर पैर तक उसका वजूद इस वक़्त महल से भी ज़्यादा वज़नी लग रहा था, फिर उसका भाई हम्ज़ा जैसा कैसे? शेख़ बाबा के मन में भी इसी तरह का सवाल उठ रहा था

"अगर ऐसा ही होता तो ग़लत और सही की पहचान कर के इंसाफ़ किस तरह होता। इंसाफ़ में गुनहगार वाहिद वही है जिसने गुनाह किया।" 2 पल खामोश रहकर उन्होंने कहा "हमारी ख़ादिमा आपके साथ जायेगी, आप चाहें अपने घर लौट जाएं या सामान के साथ महल आ जाएं फ़ैसला आपका होगा।" 

बाबा उसे रुक्मणि के हवाले करके मुड़कर जाने लगे मगर उसकी आवाज़ ने उन्हें रोक लिया "हया...।"  

शेख़ बाबा पलट गए, उसके गुलाबी चेहरे पर नर्म मुस्कुराहट सजी थी "मेरा नाम हया है।" उसके फ़ैसले से शेख़ बाबा को सुकून मिला। हया के फ़ैसले पर उन्हें लगा उनका भारी दिल हल्का हो गया।

वो समझ रहे थे की उनसे हुई चूक की भरपाई वो हया के ज़रिए कर सकते है इसलिए वो हया की हिफाज़त चाहते थे। मगर दरअसल ये ग़लती तो उनकी थी ही नहीं। दरअसल इस मंज़र के पीछे कोई और ही था जो इन मंसूबों का बानी है, अस्ल में कोई और है जो छिपा हुआ है, जिसके बारे में मालूम तो है पर अंदाज़ा नही है।